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जनसत्ता विशेष: कैंसर पीड़ित बच्चों को मिले पढ़ाई-जीविका का सहारा

एम्स के बाल रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ एके देवरारी ने बताया कि कैंसर के कुल मरीजों में से पांच फीसद मरीज बच्चे होते हैं। उन्होने बताया कि बच्चों में होने वाले कैंसर में से 50 फीसद कैंसर अस्थिमज्जा से जुड़ा यानी खून या लिंफनोड में होने वाला कैंसर होता है।

कैंसर पीड़ित बच्चों का रखें खास ख्याल (फाइल फोटो)

बच्चों में होने वाले कैंसर का अब पूरी तरह से इलाज संभव है। बशर्ते इसका समय पर इलाज शुरू हो और नियमित रूप से मरीज डाक्टरों के संपर्क में रहे। इसमें इलाज के खर्च के अलावा मरीज के परिजनों की अस्पताल तक पहुंच व आवाजाही में होने वाले खर्चे सहित बच्चे के पोषण व हाइजिन पर होने वाला भारी भरकम खर्च है आज बड़ी चुनौती है। इसके साथ ही नियमित निगरानी व कैंसर के बचे मरीजों के आगे के जीवन को बेहतर बनाने के लिए भी नीतिगत फैसले की दरकार है। एम्स के बाल रोग विभाग की ओर से सरकार से यह पैरवी करने की तैयारी भी है कि इन बच्चों को पढ़ाई व जीविका में विकलांग बच्चों की तरह वरीयता देने का प्रावधान किया जाए।

एम्स के बाल रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ एके देवरारी ने बताया कि कैंसर के कुल मरीजों में से पांच फीसद मरीज बच्चे होते हैं। उन्होने बताया कि बच्चों में होने वाले कैंसर में से 50 फीसद कैंसर अस्थिमज्जा से जुड़ा यानी खून या लिंफनोड में होने वाला कैंसर होता है। वहीं 50 फीसद कैंसर ट्यूमर के रूप में होता है। उन्होने बताया कि जहां बड़ों में होने वाले कैंसर में बचाव के उपाय करने से कमी लाई जा सकती है वहीं बच्चों के कैंसर को होने से रोकना अभी तक नामुमकिन है। बच्चे के विकास के साथ ही इसके लक्षण उभरने लगते हैं। उन्होने बताया कि आज 30 साल पहले तक खून में होने वाले कैंसर से बच्चे की मौत निश्चित थी, वहीं आज 30 फीसद बच्चे पूरी तरह से बचाए जा सकते हैं। 10 साल में यहऔर बेहतर नतीजे देगा।

डॉ देवरारी ने कहा कि बच्चों में होने वाले कैंसर के सफल इलाज जहां सुकून देता है वहीं इलाज के साइड इफेक्ट के तौर पर पंैक्रियाज की खराबी से मधुमेह या हार्मोन संबंधी गड़बड़ी ,बच्चों के जननांगो के विकास पर असर या स्टेराइड का बच्चों की हड्डी के विकास पर असर आने का खतरा रहता है। इसके अलावा एन्थ््राासाइकलिंस नामक दवाओं से हृदय संबंधी दिक्कते आ सकती हंै। रेडियोथेरेपी का भी गुर्दे सहित तमाम अंगों पर असर बना रह सकता है।

डॉ देवरारी ने कहा कि आयुष्मान भारत व राष्ट्रीय आरोग्य निधि से इलाज के लिए तो मदद मिल भी जाती है लेकिन बाकी खर्चे परिजनों को उठाने पड़ते है जो काफी महंगा पड़ता है। वे विभाग की ओर से सरकार के पास प्रस्ताव भेजने वाले हैं कि ऐसे बच्चों के इलाज के दौरान मुफ्त रहने, पोषण, बड़े होने पर पढ़ाई व नौकरी में दिव्यांगों की तरह वरीयता देने का नीतिगत प्रावधान करें ताकि बीमारी से बचे बच्चे जीविका के संघर्ष में हार न जाएं।

बाल कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ रचना सेठ ने कहा कि इन मरीजों में होने वाले कैंसर का पहले 30 फीसद मामलों में पूरी तरह इलाज हो पाता था। लेकिन अब इसकी सफलता दर में इजाफा हुआ है। नई तकनीक व इलाज में और बेहतरी आने के बाद उम्मीद है कि हम ऐसे 60 फीसद मरीजों को बचा सकेंगे। बाल कैंसर रोग दिवस के मौके पर हुए एक कार्यक्रम में कैंसर का सफल इलाज करा चुके बच्चों ने सांस्कृ तिक कार्यक्रम पेश किया। इन बच्चों में शामिल रितु (10)ने बताया कि उनका एक तरह के लिम्फोमा का 2017 में इलाज पूरा हुआ। अब वह पूरी तरह ठीक हैं लेकिन इलाज के कारण अभी तक ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाई हैं। कैंसर से जीत चुकीं चारू (12) ने बताया कि वह पुलिस सेवा में जाना चाहती है। जबकि कैंसर को मात दे चुकी अंजलि शिक्षक बनने का सपना पाले हैं। वहीं 12 साल के अमन सफल इलाज के बाद समाज सेवा को अपना लक्ष्य बनाए हैं।

कैन किड्स की सुमन आनंद ने बताया कि नियमित तौर पर बड़े शहर के बड़े अस्पताल में पहुंचने व रुकने पर भारी भरकम खर्च आता है। इलाज पर आने वाला खर्च तो सरकार की ओर से मिल जाता है लेकिन रुकने वे खानपान का आने जाने का कोई इंतजाम नहीं होने से मरीज बीच में निगरानी छोड़ देते है।

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