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रेरा ने बढ़ाई खरीदारों की उम्मीद, आशियाने का सपना हो रहा सच

रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम 2016 यानी रेरा को राज्य सभा ने 10 मार्च 2016 और लोकसभा ने 15 मार्च 2016 को पारित किया था। एक मई 2016 से यह अधिनियम लागू हुआ। शुरुआत में केवल 13 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों ने इसे अनिधिसूचित किया। वर्तमान में यह कानून देश के ज्यादातर हिस्से में लागू है।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

हर किसी का सपना एक आशियाने का होता है,लेकिन कभी-कभी झांसे में आकर वे अपनी जिंदगी भर की कमाई गवां बैठते हैं। धोखाधड़ी के ऐसे ही मामलों से निपटने के लिए केंद्रीय कानून रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम 2016, रेरा लाया गया। इसमें खरीदार के साथ-साथ बेचने वाले बिल्डर भी अपना पक्ष रख सकते हैं। सुलभ और मामलों के जल्द निस्तारित होने की वजह से इसे खरीदारों के हितों का सबसे अच्छा मंच माना जा रहा है। क्या है रेरा: रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम 2016 यानी रेरा को राज्य सभा ने 10 मार्च 2016 और लोकसभा ने 15 मार्च 2016 को पारित किया था। एक मई 2016 से यह अधिनियम लागू हुआ। शुरुआत में केवल 13 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों ने इसे अनिधिसूचित किया। वर्तमान में यह कानून देश के ज्यादातर हिस्से में लागू है। खरीदारों और बिल्डरों से संबंधित नियम 1 मई 2017 से पूरी तरह से प्रभावी हुए। इसके तहत राज्य सरकारों को रेरा प्राधिकरण और अपीलीय न्यायाधिकरण बनाने का प्रावधान किया गया है।

राज्यों में क्या है व्यवस्था?
राज्यों के पास रेरा प्राधिकरण और रेरा ट्रिब्यूनल बनाकर उसकी कार्य प्रणाली के नियम बनाने का अधिकार है। दिल्ली में विकास भवन में रेरा बेंच है। यूपी में पहले रेरा की एक बेंच लखनऊ में थी। अब पश्चिमी उप्र के के लिए ग्रेटर नोएडा में दो बेंच गठित की गई हैं। हरियाणा में पंचकुला और गुड़गांव में रेरा बेंच है। गुजरात राज्य में रेरा की एक बेंच है। सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में रेरा की 10 बेंच हैं।

क्या है सुनवाई का तरीका?
खरीदारों और बिल्डर के बीच विवाद होने पर कोई भी पक्ष रेरा बेंच के समक्ष मामला रखता है। रेरा बेंच का फैसला आने के बाद दूसरे पक्ष को उसका पालन करना होता है। संतुष्ट नहीं होने पर आदेश के खिलाफ दूसरा पक्ष अपीलीय न्यायाधिकरण (अपीलिएट ट्रिब्यूनल) जा सकता है। उप्र, दिल्ली, हरियाणा आदि राज्यों में अलग से रेरा के अपीलीय न्यायाधिकरण का गठन नहीं हुआ है। उत्तर प्रदेश में उप्र राज्य परिवहन अपीलीय प्राधिकरण यह काम कर रहा है। अपीलीय प्राधिकरण की राय के खिलाफ संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय और फिर सुप्रीम कोर्ट तक अपील की जा सकती है। रेरा के तहत केस पंजीकृत होने के 60 दिनों में निस्तारण किए जाने का प्रावधान है। फैसले के खिलाफ आदेश आने के 60 दिनों के भीतर अपील की जा सकती है। रेरा उल्लंघनकर्ता बिल्डर पर परियोजना लागत का पांच फीसद तक का जुर्माना लगा सकता है।

अपार्टमेंट एक्ट में क्या थे प्रावधान?
रेरा से पहले अपार्टमेंट एक्ट लागू था। देश में सबसे पहले महाराष्ट्र में 1963 में फ्लैट खरीदारों के लिए कानून बनाए थे। उप्र ने 2010 में अपार्टमेंट एक्ट बनाया था।

कौन से हैं अन्य मंच?
1. रेरा से इतर खरीदारों की शिकायतों के निस्तारण के लिए जिला स्तर पर उपभोक्ता फोरम है। रेरा लागू होने के बाद भी जिला उपभोक्ता फोरम विवाद से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहे हैं। सिविल कोर्ट ऐसे मामलों की सुनवाई नहीं कर रहे हैं। जिला उपभोक्ता फोरम के फैसले के खिलाफ राज्य उपभोक्ता आयोग और फिर केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में अपील की जा सकती है। अधिकांश मामलों में खरीदार दोनों जगहों पर दायर कर रहे हैं।
सुनवाई के दौरान अन्यत्र केस लंबित होने की जानकारी छिपाते हैं। जबकि, रेरा के सेक्शन-71 में यह स्पष्ट किया गया है कि मामले को लेकर यदि किसी अन्य जगह पर सुनवाई हो रही है तो रेरा सुनवाई नहीं करेगा।

2. दिवाला और दिवालियापन कोड 2006 (आइबीसी) के तहत भी बिल्डरों की धोखाधड़ी के खिलाफ मामला चलाया जा सकता है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा इलाके में बिल्डर कंपनी जेपी इंफ्राटेक और आम्रपाली के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में मामला चल रहा है। जेपी और आम्रपाली समूह से जुड़े खरीदारों के मामलों की सुनवाई रेरा की गौतमबुद्ध नगर बेंच नहीं कर रही है। कंपनी कानून के तहत खरीदारों को वित्तीय भुगतानकर्ता (फाइनेंशियल क्रेडिटर) माना गया है। इस वजह से खरीदारों की शिकायत पर एसीएलटी में भी मामलों की सुनवाई की जा रही है।

रेरा के सुखद परिणाम आएंगे और केवल सही काम करने वाले बिल्डरों को ही मौका मिलेगा। रेरा में अब बिल्डर कंपनियां भी अपना पक्ष रखने की तैयारी कर रही हैं, जिससे बिल्डर और खरीदारों, दोनों के हितों की रक्षा होगी।
– प्रशांत तिवारी, अध्यक्ष, क्रेडाई उप्र (पश्चिम)

देशभर में 25-30 हजार मामलों की सुनवाई
रेरा का मंच सरकारी और निजी समेत सभी तरह की आवासीय परियोजनाओं की सुनवाई के लिए है। देशभर में रेरा 25-30 हजार मामलों की सुनवाई कर रहा है। इसमें से 25 फीसद मामले नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना औद्योगिक विकास प्राधिकरण और गाजियाबाद इलाकों के हैं। यूपी रेरा में नौ हजार शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें 1800 का निस्तारण हुआ। हरियाणा रेरा में 700, उत्तराखंड रेरा में 75 और दिल्ली रेरा में 40 मामले दर्ज हैं।

अभी तक रेरा में दर्ज होने वाले ज्यादातर मामले बिल्डरों के खिलाफ हैं। बिल्डर-खरीदार करार के आधार पर रेरा बैंच फैसला ले रही है। आने वाले दिनों में बिल्डर कंपनिया भी रेरा में खरीदारों के खिलाफ जाने की तैयारी में हैं। कंपनियां परियोजना में देरी होने के कारण, जमीन का कब्जा या आबंटन में देरी, निर्माण पर एनजीटी की रोक, फिट आउट पजेशन देने के कारणों के तथ्य प्रस्तुत कर अपना पक्ष रखेंगी।
– डॉ. संजीव कुमार, रेरा विशेषज्ञ और एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट

रेरा कानून से पहले खरीदारों के पक्ष की मजबूत सुनवाई नहीं हो पा रही थी। अब उनकी तय समय में उनके हक को दिलाया जा रहा है। खरीदारों की सुविधा के लिए यूपी में रेरा बिल्डरों की स्टार रेटिंग नीति तैयार की जा रही है।
– बलविंदर कुमार, पूर्व आइएएस एवं सदस्य यूपी रेरा

रेरा कानून लागू होने के करीब डेढ़ साल बाद भी पीड़ित खरीदार वहीं खड़े हैं, जहां वे इसके लागू होने से पहले थे। जिन मामलों में रेरा ने फैसले लिए हैं, उन्हें बिल्डर मान नहीं रहे हैं। खरीदारों को अभी तक इससे कोई
राहत नहीं मिली है। – श्वेता भारती, महासचिव, नोएडा एक्सटेंशन फ्लैट ओनर्स वेलफेयर एसोसिएशन

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