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जानें-समझें: गरीबों को आरक्षण, कितने दूर कितने पास

आर्थिक आधार पर आरक्षण के प्रस्ताव पर एक हफ्ते से भी कम समय में राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। गुजरात ने इसे लागू करने का एलान भी कर दिया है। इस कवायद के संवैधानिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभावों को लेकर बहस चल निकली है। कई सवाल उठ रहे हैं। केंद्र सरकार के इस कदम के दूरगामी परिणाम माने जा रहे हैं।

Author Published on: January 15, 2019 5:27 AM
प्रतीकात्मक फोटो। (Photo-Reuters)

आर्थिक आधार पर आरक्षण के प्रस्ताव पर एक हफ्ते से भी कम समय में राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। गुजरात ने इसे लागू करने का एलान भी कर दिया है। इस कवायद के संवैधानिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभावों को लेकर बहस चल निकली है। कई सवाल उठ रहे हैं। केंद्र सरकार के इस कदम के दूरगामी परिणाम माने जा रहे हैं।

संविधान और सरकार की कवायद
प्रस्तावित आरक्षण का कोटा मौजूदा कोटे से अलग होगा। अभी देश में कुल 49.5 फीसद आरक्षण है। संविधान की धारा 15 में 15.6 जोड़ा गया है, जिसके अनुसार राज्य और भारत सरकार को इस संबंध में कानून बनाने से नहीं रोका जा सकेगा। इसके अनुसार, आर्थिक रूप से दुर्बल सामान्य वर्ग को 10 फीसद आरक्षण का प्रस्ताव किया गया है। संविधान की धारा 16 में एक बिंदु जोड़ने का प्रस्ताव है, जिसके अनुसार राज्य सरकार और केंद्र सरकार 10 फीसद आरक्षण दे सकते हैं। प्रस्तावित 10 फीसद आरक्षण मौजूदा 50 फीसद की सीमा से अलग होगा।

आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था
आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था के तहत देश में अनुसूचित जाति के लिए 15 फीसद, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 फीसद, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फीसद आरक्षण है। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के मुताबिक, 50 फीसद से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता।
लेकिन सरकार के ताजा फैसले और सुप्रीम कोर्ट के (इंदिरा साहनी फैसले, 1992) की 50 फीसद सीमा के बीच कहीं कोई टकराव नहीं है। क्योंकि 50 फीसद की सीमा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के मामले में है। यह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण देने में नहीं है। आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान की विस्तृत व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 16 (4) में आरक्षण का प्रावधान समुदाय के लिए है, न कि व्यक्ति के लिए आरक्षण का आधार आय और संपत्ति को नहीं माना जा सकता।

क्रीमी लेयर का प्रावधान
1992 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ओबीसी को आरक्षण मिलता तो सही है लेकिन क्रीमी लेयर के साथ मिलना चाहिए। मतलब जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं उनको आरक्षण न मिले। 1993 में एक लाख से ऊपर सालाना आमदनी वाले क्रीमी लेयर में माने गए। अभी आठ लाख से ऊपर की सालाना आमदनी वाले ओबीसी को आरक्षण नहीं मिलता।

किसकी सिफारिश पर लिया गया फैसला
संसद में 21 बार ‘प्राइवेट मेंबर’ विधेयक लाकर अनारक्षित वर्ग के लिए आरक्षण की मांग की गई। मंडल आयोग ने भी इसकी अनुशंसा की थी। नरसिंह राव सरकार ने 1992 में एक प्रावधान किया था, पर संविधान संशोधन नहीं होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया। मेजर जनरल (रिटायर्ड) एसआर सिन्हो की अगुवाई में गठित सिन्हो आयोग (कमीशन टू एग्जामिन सब-कैटेगोराइजेशन आॅफ ओबीसी) ने 2004 से 2010 तक इस बारे में काम किया और 2010 में तत्कालीन सरकार को प्रतिवेदन दिया। मोदी सरकार ने इसी आयोग की सिफारिश पर संविधान संशोधन विधेयक तैयार किया है।

राज्यों में कहां- कितना आरक्षण
आंध्र प्रदेश में कुल 50 फीसद आरक्षण दिया जाता है। इसमें महिलाओं को 33.33 फीसद अतिरिक्त आरक्षण है। पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम में अनुसूचित जनजाति के लिए 80 फीसद आरक्षण है। अन्य राज्यों में सबसे ज्यादा आरक्षण हरियाणा में दिया जाता है। यहां कुल 70 फीसद आरक्षण है, जबकि तमिलनाडु में 68, महाराष्ट्र में 68 और झारखंड में 60 फीसद आरक्षण है। राजस्थान में कुल 54 फीसद, उत्तर प्रदेश में 50, बिहार में 50, मध्य प्रदेश में भी 50 और पश्चिम बंगाल में 35 फीसद आरक्षण है।

क्या कहते हैं जानकार

सरकार को हमने चार टर्म आॅफ रेफरेंस सुझाए थे- सामान्य वर्ग में कौन गरीब है, और वह क्यों गरीब है, उनकी पहचान कैसे की जाएगी, उसके मानदंड क्या होंगे। इन सवालों पर राज्य सरकार के साथ संपर्क करके आयोग को इस पर फैसला लेना चाहिए। उसमें यह भी कहा गया था कि राज्य सरकारें यह बताएंगी कि वे सांविधानिक रूप से और सिद्धांतत: सहमत हैं या नहीं और रोजगार एवं शिक्षा में आरक्षण की मात्रा कितनी होगी।
– मेजर जनरल (रिटायर) एसआर सिन्हो, आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग पर बने राष्ट्रीय आयोग के प्रमुख

हमारे संविधान में धारा 14, धारा 15(1), धारा 16(1) के प्रसंग हैं, जो कहते हैं कि किसी भी नागरिक के खिलाफ भेदभाव नहीं होना चाहिए। हालांकि, अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण और सामाजिक न्याय की दूसरी प्रक्रियाओं के लिए कुछ विशेष प्रावधान रखे गए।
– पीएस कृष्णन, मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू होने के समय समाज कल्याण मंत्रालय में सचिव

केशवानंद भारती के वाद में सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की संवैधानिक पीठ ने व्यवस्था की कि संविधान के आधारभूत ढांचे में बदलाव नहीं हो सकता। मौजूदा बदलाव में यह हो रहा है। हालिया विधेयक को निश्चित समानता का अधिकार के प्रावधान का उल्लंघन माना जाएगा। कई और आधार हैं, जिन पर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो सकती है।
-इंदिरा साहनी, मंडल आयोग की सिफारिशों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता

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