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जानें-समझें राम मंदिर मुद्दा: अदालत में इंतजार या अध्यादेश की दरकार

राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील और अदालत में लंबे समय से अटके अयोध्या भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट की चार जनवरी की सुनवाई टल गई। अदालत ने एक मिनट से भी कम समय में इस मामले की सुनवाई के लिए अगली तारीख दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अयोध्या जमीन विवाद मामले पर 2010 के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई नई पीठ करेगी।

Author January 8, 2019 9:43 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील और अदालत में लंबे समय से अटके अयोध्या भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट की चार जनवरी की सुनवाई टल गई। अदालत ने एक मिनट से भी कम समय में इस मामले की सुनवाई के लिए अगली तारीख दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अयोध्या जमीन विवाद मामले पर 2010 के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई नई पीठ करेगी। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और जस्टिस संजय कृष्ण कौल की पीठ ने कहा कि अगले आदेश 10 जनवरी को गठित होने वाली बेंच जारी करेगी। दूसरी ओर, विश्व हिंदू परिषद, संत समाज और इस मामले में मंदिर निर्माण के तमाम पैरोकार सरकार से अध्यादेश लाकर रामलला मंदिर की राह निकालने की मांग कर रहे हैं। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करेगी।

क्या है अयोध्या विवाद सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश के अयोध्या में 2.77 एकड़ जमीन के मालिकाना हक का विवाद चल रहा है। इस जमीन को राम जन्मभूमि स्थली मानने वाले पैरोकार यहां राम लला का मंदिर बनाने की मांग उठाते रहे हैं। जबकि, इस मामले के पक्षकार मुसलिम संगठनों का तर्क है कि यहां बाबरी मसजिद हुआ करती थी, इसलिए वहां मसजिद बननी चाहिए। वहां मंदिर बनाम मसजिद के विवाद में 1853 से लेकर अब तक कई बड़े पड़ाव गुजरे हैं। राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिहाज से देश के लिए बड़ा पड़ाव 1992 का बाबरी ढांचा ध्वंस और उसके बाद के दंगों का अध्याय रहा। केंद्र द्वारा गठित कई आयोगों, इलाहाबाद हाई कोर्ट से होते हुए अब यह सवाल सुप्रीम कोर्ट में है।

क्या कहना है संघ परिवार व सरकार का
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साक्षात्कार में कहा कि मामला कोर्ट में लंबित रहने तक अयोध्या मामले पर अध्यादेश नहीं लाया जाएगा। दूसरी ओर, संघ परिवार और साधू समाज सुनवाई में हो रही देरी के आधार पर अयोध्या में मंदिर बनवाने के लिए अध्यादेश लाने की मांग पर अड़ा है। संत समाज ने ऐलान किया है कि प्रयागराज में कुंभ में 31 जनवरी और एक फरवरी को धर्म संसद का आयोजन किया जाएगा, जिसमें देश भर के लाखों संत उपस्थित होंगे। वहां मंदिर निर्माण की तिथि घोषित की जाएगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी पहली बार इसमें शामिल होने जा रहे हैं। अयोध्या मामले में दूसरी ओर से पैरोकार इकबाल अंसारी ने प्रधानमंत्री मोदी के बयान का स्वागत किया है और कहा है कि इस मामले में कोर्ट का हर फैसला उन्हें मंजूर होगा।

क्या है अध्यादेश पर अतीत की नजीर
अयोध्या में राम मंदिर बनाए जाने के लिए अध्यादेश लाना कोई नई बात नहीं है। करीब 25 साल पहले कांग्रेस सरकार अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए अध्यादेश ला चुकी है। यह जनवरी, 1993 में हुआ था। वहां बाबरी मसजिद गिराए जाने की घटना के एक महीने बाद। उस वक्त पीवी नरसिंह राव देश के प्रधानमंत्री थे। सात जनवरी, 1993 को राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे मंजूरी भी दे दी थी। बाद में तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने इस बिल को मंजूरी के लिए लोकसभा के सामने रखा था। पारित होने के बाद इसे अयोध्या अधिनियम कहा गया था। राव सरकार ने इस अधिनियम के जरिए 2.77 एकड़ की विवादित भूमि ही नहीं, बल्कि इसके चारों ओर की 60.70 एकड़ जमीन भी अधिग्रहीत किया था। इस पर केंद्र सरकार राम मंदिर, एक मसजिद, म्यूजियम और अन्य सुविधाओं का निर्माण करना चाहती थी। भाजपा के तत्कालीन उपाध्यक्ष एसएस भंडारी ने इस कानून को पक्षपातपूर्ण, तुच्छ और प्रतिकूल बताते हुए खारिज कर दिया था। मुसलिम संगठनों ने भी इस कानून का विरोध किया था। तब सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहित जमीन पर एक राम मंदिर, एक मसजिद और लाइब्रेरी और दूसरी सुविधाओं के इंतजाम की बात का समर्थन किया था, लेकिन इस आदेश को राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं बताया था, जिसके चलते अयोध्या अधिनियम लटक गया और व्यर्थ हो गया।

क्या है मामले की ताजा स्थिति
सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा पीठ के समक्ष राम जन्मभूमि विवाद से जुड़ी कुल 15 याचिकाएं लगी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने चार जनवरी को इन याचिकाओं पर सुनवाई के लिए बेंच का गठन, प्रक्रिया और तारीखों को तय करने का मामला टाल दिया। अदालत के सामने एक याचिका यह भी है, जिसमें मांग की गई है कि अगर तय समय में सुनवाई नहीं हो सकती तो अदालत अपने आदेश में कारण बताए कि एक तय समय में सुनवाई क्यों नहीं हो सकती। इसके अलावा रोजाना सुनवाई की मांग कोर्ट ने खारिज कर दी है। अयोध्या भूमि विवाद को लेकर साल 2011 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को अयोध्या राम जन्मभूमि मामले में फैसला सुनाते हुए जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था।

क्या कहते हैं जानकार
केंद्र सरकार के पास किसी भी मुद्दे पर कानून बनाने या अध्यादेश लाने का अधिकार सुरक्षित है और इसे चुनौती नहीं दी जा सकती।
– आलोक कुमार, विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष एवं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील

लोग चाहते हैं कि जमीन के मालिकाना हक (टाइटल सूट) से जुड़ी याचिका का जल्द से जल्द निपटारा हो। केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करेगी।
-रविशंकर प्रसाद, केंद्रीय मंत्री

सरकार द्वारा ऐसे समय में अध्यादेश लाना उचित नहीं होगा, जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। अगर सरकार यह कदम उठाती है तो उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकेगी, जहां इसके खारिज होने की पूरी संभावना है।
– प्रशांत भूषण, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील

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