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तीन तलाक बिल सुधार की पहल में क्या है पेच

तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) विधेयक या मुसलिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक को लेकर संसद के शीतकालीन सत्र में राजनीति सरगर्म है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सरकार ने विधेयक का मसौदा तैयार कराया। बीते साल दिसंबर से लेकर अब तक दो बार यह विधेयक संसद में लाया जा चुका है।

Author Published on: January 1, 2019 5:23 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) विधेयक या मुसलिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक को लेकर संसद के शीतकालीन सत्र में राजनीति सरगर्म है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सरकार ने विधेयक का मसौदा तैयार कराया। बीते साल दिसंबर से लेकर अब तक दो बार यह विधेयक संसद में लाया जा चुका है। विपक्ष की मांग पर मूल मसविदे में संशोधन भी किए गए। दरअसल, राजनीतिक-सामाजिक वजहों से तीन तलाक विधेयक देश में बहस का बड़ा मुद्दा बना गया है।

विभिन्न मुसलिम संगठनों ने इसे धार्मिक आस्था का सवाल बताया है। सरकार का कहना है कि इसे प्रतिबंधित करने के लिए कानून बनाने के मकसद से लाया गया विधेयक किसी समुदाय विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के अधिकारों और न्याय के बारे में है। विपक्ष का तर्क है कि इस मुद्दे पर सरकार ने पर्याप्त बहस नहीं कराई है और विपक्ष को विश्वास में नहीं लिया है। संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में विधेयक पारित हो गया, लेकिन राज्यसभा में विपक्ष इसे पहले प्रवर समिति में भेजने की मांग पर अड़ा हुआ है।

विधेयक की जरूरत क्यों आई
अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) की 1400 साल पुरानी प्रथा को असंवैधानिक करार दिया था और सरकार से कानून बनाने को कहा था। सरकार ने दिसंबर 2017 में लोकसभा से मुसलिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक पारित कराया ,लेकिन राज्यसभा में यह बिल अटक गया, जहां सरकार के पास पर्याप्त संख्या बल नहीं है। विपक्ष ने मांग की थी कि तीन तलाक के आरोपी के लिए जमानत का प्रावधान भी हो। उसी साल अगस्त में विधेयक में संशोधन किए गए, लेकिन यह फिर राज्यसभा में अटक गया। इसके बाद सरकार सितंबर 2018 में अध्यादेश लेकर आई। इसमें विपक्ष की मांग को ध्यान में रखते हुए जमानत का प्रावधान जोड़ा गया। अध्यादेश में कहा गया कि तीन तलाक देने पर तीन साल की जेल होगी।

विधेयक में क्या है
विधेयक के मुताबिक जुबानी, लिखित या किसी इलेक्ट्रॉनिक (वॉट्सएप, ईमेल, एसएमएस) तरीके से एकसाथ तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) देना गैरकानूनी और गैर जमानती होगा। इसमें महिला अपने नाबालिग बच्चों की कस्टडी और गुजारा भत्ते का दावा भी कर सकेगी।

विधेयक के मूल स्वरूप में क्या बदलाव
अध्यादेश के आधार पर तैयार किए गए नए बिल के मुताबिक, आरोपी को पुलिस जमानत नहीं दे सकेगी। मजिस्ट्रेट पीड़ित पत्नी का पक्ष सुनने के बाद वाजिब वजहों के आधार पर जमानत दे सकते हैं। उन्हें पति-पत्नी के बीच सुलह कराकर शादी बरकरार रखने का भी अधिकार होगा। विधेयक के मुताबिक, मुकदमे का फैसला होने तक बच्चा मां के संरक्षण में ही रहेगा। आरोपी को उसका भी गुजारा देना होगा।
कब दर्ज होगा मुकदमा

तीन तलाक का अपराध सिर्फ तभी संज्ञेय होगा, जब पीड़ित पत्नी या उसके परिवार (मायके या ससुराल) के सदस्य प्राथमिकी दर्ज कराएं। महिलाओं के लिए भरण-पोषण के साथ अगर चाहें तो समझौते का विकल्प भी इसमें खुला रखा गया है। इसके साथ ही खून या शादी के रिश्ते वाले सदस्यों के पास भी केस दर्ज करने का अधिकार रहेगा। पड़ोसी या कोई अनजान शख्स इस मामले में केस दर्ज नहीं कर सकता है।

क्या हैं देश में तीन तलाक के आंकड़े
भारत में कुल तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं का आंकड़ा 23.3 फीसद है। भारत में तलाकशुदा महिलाओं में 68 फीसद हिंदू और 23.3 फीसद मुसलिम हैं। सरकार ने अध्यादेश पर जानकारी के साथ ही सुप्रीम कोर्ट को तीन तलाक के आंकड़े भी दिए थे। जनवरी 2017 से 13 सितंबर 2018 तक 430 तीन तलाक के मामले सामने आए। इनमें से 229 सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले के थे। 201 फैसले के बाद के। तीन तलाक के सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश में आए।
उत्तर प्रदेश में जनवरी 17 से पहले 126 केस आए। फैसले के बाद 120 केस सामने आए।

दुनिया के बाकी देशों में क्या है स्थिति
मिस्र में तीन बार तलाक कहना, तलाक की शुरुआती प्रक्रिया है। इसे सिर्फ एक गिना जाएगा। 90 दिन का इंतजार करना होगा। ट्यूनीशिया में जज से मशविरा किए बिना पति तलाक नहीं दे सकता। जज को कारण समझाना होगा। पूरी प्रक्रिया अदालत के सामने होगी। अदालत अगर तालमेल बैठाने का निर्देश दे तो वह अनिवार्य होगा। पाकिस्तान में पति को सरकारी संस्था को तलाक की इच्छा के बारे में जानकारी देनी होगी। नोटिस के बाद परामर्शदाता तालमेल बैठाने के लिए 30 दिन का समय देगी। तालमेल न होने और नोटिस के 90 दिन बाद तलाक वैध होगा। इराक में तीन तलाक कहने को एक ही चरण गिना जाएगा। पत्नी भी तलाक की मांग कर सकती है। ईरान में तलाक आपसी सहमति से होना चाहिए। इसके अलावा तुर्की, साइप्रस, बांग्लादेश, अल्जीरिया और मलेशिया ने ट्यूनीशिया और मिस्र के नियमों को आधार बनाया है, जहां सिर्फ तीन तलाक कहकर शादी खत्म नहीं की जा सकती।

क्या कहते हैं जानकार
यह विधेयक महिलाओं के खिलाफ है। इसका हम पुरजोर विरोध करेंगे। अगर शौहर बीवी को रखना नहीं चाहता तो यह हमारी इज्जत है। इस्लाम किसी को भी जबर्दस्ती बीवी बनकर रहने को नहीं कहता और तलाक के तीन महीने बाद दूसरी शादी हो सकती है।
– डॉ आसमां जाहरा, ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड की महिला विंग की प्रमुख

इस कानून के अभाव में हमने मुसलिम महिलाओं को परेशान होते हुए देखा है। महिला आयोग के हस्ताक्षर अभियान में 10 हजार महिलाओं ने विधेयक को जल्द पारित करने का समर्थन किया था।
– रेखा शर्मा, अध्यक्ष,राष्ट्रीय महिला आयोग

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