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अमेरिका-चीन का 18 महीने तक चला विवाद खत्म, अब किस करवट बैठेगी अर्थव्यवस्था

पहले चरण के व्यापार समझौते में अमेरिका ने विभिन्न चीनी उत्पादों पर शुल्क में कटौती की है।

दुनिया की दोनों चोटी की अर्थव्यवस्थाओं में तनाव 22 जनवरी 2018 को शुरू हुआ था।

अमेरिका और चीन ने 18 महीनों से चल रहे आपसी विवाद को खत्म करते हुए शुरुआती व्यापारिक संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके तहत चीन अमेरिकी उत्पादों और सेवाओं की खरीद को 200 अरब डॉलर से बढ़ाएगा और बदले में अमेरिका कुछ शुल्कों को वापस लेगा। संधि होते ही दुनिया भर के महत्त्वपूर्ण स्टॉक बाजारों के सूचकांकों में रेकॉर्ड बढ़त हुई, लेकिन बाद में व्यापारिक तनावों पर संधि का दीर्घकालीन असर न होने की चिंताओं को लेकर सभी सूचकांकों में वृद्धि रुक गई। अर्थव्यवस्था के फौरी रुख से स्पष्ट हुआ है कि व्यापार समझौते से अमेरिका और चीन तो अपने नुकसान की भरपाई करने में सफल हो जाएंगे, लेकिन भारत समेत उन देशों को संभलने में वक्त लगेगा, जो इनसे प्रभावित हुए हैं। दुनिया की दोनों चोटी की अर्थव्यवस्थाओं में तनाव 22 जनवरी 2018 को शुरू हुआ था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन में बने सौर पैनलों और वाशिंग मशीनों पर शुल्क लगाने की घोषणा कर दी।

पहले चरण में क्या-क्या

पहले चरण के व्यापार समझौते में अमेरिका ने विभिन्न चीनी उत्पादों पर शुल्क में कटौती की है और चीन ने इसके बदले अमेरिका से उसके उत्पादों और सेवाओं की खरीद का वादा किया है। चीन दो साल में 200 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पादों, सेवाओं की खरीद के साथ 52.4 अरब डॉलर की ऊर्जा और 80 अरब डॉलर के कृषि उत्पादों की खरीद करेगा। चीन ने वादा किया है कि वह नकली अमेरिकी वस्तुओं की बिक्री रोकेगा, अमेरिकी बौद्धिक संपदा अधिकार का सम्मान करेगा और अपनी मुद्रा की विनिमय दरों में कृत्रिम बदलाव नहीं करेगा। चीन ने जबरन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को खत्म करना, अमेरिकी कृषि के अभूतपूर्व विस्तार, अमेरिकी वित्तीय सेवाओं से अवरोध हटाना, अमेरिका-चीन व्यापार संबंधों को पुन: संतुलित और समस्याओं का समाधान निकालने के वादे किए हैं।

दीर्घकालिक असर के आसार

अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध के लंबा खिंचने से दुनिया भर में चिंता थी। दोनों एक दूसरे के उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा रहे थे। अमेरिका ने घरेलू उद्योगों को बचाने के लिए चीनी उत्पादों पर कर बढ़ा दिया और चीन पर आरोप लगाया था कि वह अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों का पालन नहीं कर रहा है। हालांकि जब अमेरिका मंदी की चपेट में आने लगा तो राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन से वार्ता की पेशकश की और दोनों देश थोड़ा-थोड़ा झुके। लेकिन समझौते में हुई देरी से भारत समेत दुनिया के कई बड़े देश- ब्रिटेन, जर्मनी, रूस, सिंगापुर और ब्राजील मंदी की चपेट में आ गए।

भारत पर सीधा असर

अमेरिका और चीन के बीच समझौते से पहले चीन के केंद्रीय बैंक-पीपुल्स बैंक आॅफ चाइना ने ब्याज दरें 0.50 फीसद घटाने का ऐलान किया। इससे भारत की चीन में कारोबार कर रही कंपनियों को सीधा फायदा मिलेगा। खासकर टाटा मोटर्स को, जिसकी कुल बिक्री का 10 फीसद चीन में होता है। भारत अपने सामान को आसानी से अन्य देशों में निर्यात कर पाएगा। निर्यात बढ़ने से अर्थव्यवस्था को सहारा मिलेगा। हालांकि, इससे भारत को उम्मीद से कम लाभ हुआ।

भारत को उम्मीद से कम फायदा क्यों

अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध के कारण भारत को करीब 755 मिलियन डॉलर (करीब 5300 करोड़ रुपए) का फायदा हुआ है। हालांकि उम्मीद की जा रही थी कि इससे भारत को 11 अरब डॉलर (77 हजार करोड़) का फायदा होगा। सबसे ज्यादा फायदा मेक्सिको, कनाडा, यूरोपियन यूनियन और ताइवान जैसे देशों को मिला है। संयुक्त राष्ट्र के यूएनसीटीएडी (यूनाइटेड नेशंस कांफ्रेंस आॅन ट्रेड एंड डेवलपमेंट) रिपोर्ट के मुताबिक, इस ट्रेड वॉर का सबसे ज्यादा फायदा ताइवान को मिला।

उसके बाद मेक्सिको, यूरोपीय समुदाय, वियतनाम, कनाडा और इन सभी से कम भारत को। जब अमेरिका और चीन के संबंध बिगड़े, उसी दौरान व्यापार में विशेष दर्जे को लेकर भारत के संबंध भी अमेरिका से बिगड़े। इसके बाद भारत ने वहां से आयात होने वाले सामान पर ज्यादा शुल्क लगा दिया, इससे भारत को उम्मीद से कम लाभ मिला।

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