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हिमालय की ऊंचाइयों पर नए पौधे

हिमालय पर पिछले कुछ वर्षों के दौरान 4150 मीटर से 6000 मीटर के बीच की ऊंचाई पर वनस्पति में प्रभावी परिवर्तन आया है।

हाल में हुए एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने माउंट एवरेस्ट क्षेत्र सहित पूरे हिमालय पर नए पौधों के उगने का दावा किया है।

पिछले कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि के कारण हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने की दर में बढ़ोतरी हुई हैं। वहीं हाल में हुए एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने माउंट एवरेस्ट क्षेत्र सहित पूरे हिमालय पर नए पौधों के उगने का दावा किया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के ग्लेशियर में परिवर्तन के साथ-साथ वहां की वनस्पति भी प्रभावित हो रही है और अब ये पौधे उन ऊंचाइयों पर बढ़ रहे हैं जहां वो पहले नहीं उगते थे।
यह अध्ययन यूनिवर्सिटी आॅफ एक्सेटर के वैज्ञानिकों ने किया है। शोध का परिणाम जर्नल ग्लोबल चेंज बायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। इसके अनुसार माउंट एवरेस्ट और हिमालय के ऊंचाई वाले दूसरे हिस्सों में पनपने वाले घासों और झाड़ियों की संख्या बढ़ गई है। यह शोध नासा के लैंडसैट उपग्रह चित्रों के आधार पर किया गया है जिसमें 4,150 मीटर और 6,000 मीटर ऊंचाइयों को चार भागों में बांटा गया था। इसमें पूर्व में म्यांमार से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान तक हिंदू कुश हिमालय के अलग-अलग स्थानों को लिया गया।

अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने 1993 से 2018 तक ट्री-लाइन और स्नो-लाइन के बीच वनस्पति के विस्तार को मापने के लिए उपग्रह डेटा का उपयोग किया। शोध का मुख्य विषय, सबनाइवल इलाके यानी उपनाइवल मेखला में उगने वाले पेड़ पौधों के बारे में जानकारी इकट्ठा करना था। उपनाइवल मेखला ट्री-लाइन और स्नोलाइन के बीच के इलाके यानी बर्फ से ढकी जगह और पेड़ पौधे उग सकने वाली जगह के बीच की जगह को कहते हैं। इस जगह पर अधिकतर छोटे पौधे और घास ही उगती है। यूनिवर्सिटी आॅफ एक्सेटर स्थित एनवायर्मेंटल एंड सस्टेनेबिलिटी इंस्टिट्यूट की वैज्ञानिक डॉ करेन एंडरसन ने बताया, ‘हिमालय पर पिछले कुछ वर्षों के दौरान 4150 मीटर से 6000 मीटर के बीच की ऊंचाई पर वनस्पति में प्रभावी परिवर्तन आया है। सबसे अधिक अंतर 5000 से 5500 मीटर की ऊंचाई के बीच देखा गया था। अधिक ऊंचाई पर, चपटे क्षेत्रों में पौधों का विस्तार अधिक था जबकि निचले स्तरों पर यह ढलान वाले जगहों पर अधिक था।’

अध्ययन में हिमालय क्षेत्र के सभी ऊंचाई श्रेणियों में वनस्पति में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। नीदरलैंड में उट्रेचट यूनिवर्सिटी में भूविज्ञान संकाय से संबद्ध प्रो. वाल्टर इमर्जील ल ने बताया है कि एक्सेटर यूनवर्सिटी का शोध गर्म और आर्द्र जलवायु में क्या होगा, इसकी संभावनाओं से मेल खाता है।’ उन्होंने बताया, ‘यह एक बहुत ही संवेदनशील ऊंचाई वाला इलाका है जहां पर स्नोलाइन है। इस जोन में उच्च ऊंचाइयों से निकलने वाली स्नोलाइन से वनस्पति को बढ़ने का मौका मिलता है।’

प्रोफेसर इमर्जील ने यह भी कहा कि जल विज्ञान संबंधी निहितार्थों का अध्ययन करना भी दिलचस्प होगा क्योंकि अधिक ऊंचाई पर अधिक वनस्पति का मतलब अल्पाइन कैचमेंट से अधिक वाष्पीकरण है। वाष्पीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें पानी भूमि से वाष्प बनकर वायुमंडल में जाता है। ऐसा तापमान बढ़ने के कारण भी होता है, इसलिए नदी में पानी का प्रवाह भी कम होता है। हालांकि इस शोध में ये नहीं बताया गया है कि ऊंचाइयों में वनस्पतियों के उगने के क्या कारण हैं। प्रोफेसर वाल्टर इमर्जील इस अध्ययन में शामिल नहीं थे।

कई दूसरे शोधों में भी यह पता चला है कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र जलवायु-प्रेरित वनस्पति बदलाव के लिए अत्यधिक संवेदनशील हैं। यही नहीं हिमालय पर नियमित रूप से जाने वाले कुछ वैज्ञानिकों ने वनस्पति विस्तार की पुष्टि भी की है। नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में बॉटनी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर अच्युत तिवारी ने कहा, ‘हमने नेपाल और चीन के तराई क्षेत्रों में तापमान में वृद्धि के साथ ट्री-लाइन का विस्तार पाया है। अगर निचले इलाकों में ये संभव है तो स्पष्ट रूप से उच्च ऊंचाई पर भी तापमान में वृद्धि होने पर पौधों पर प्रतिक्रिया होगी।’ प्रोफेसर अच्युत तिवारी का यह शोध ‘ट्री-लाइन डायनामिक इन द हिमालय’ डेनड्रोक्रोनोलोजिया नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

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