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दल-बदल विरोधी कानून निकालेगा लोकतंत्र की राह

जनीतिक गलियारों में पूछा जाने लगा है कि क्या राकांपा या कांग्रेस या फिर शिवसेना के विधायक टूटेंगे? अगर टूटे तो क्या कहता है दल-बदल विरोधी कानून?

देश की राजनीति में एक दौर था, जब ‘आया राम और गया राम’ की कहावत खूब सुनी जाती थी।

महाराष्ट्र में जारी नाटकीय घटनाक्रम को लेकर दल-बदल विरोधी कानून की चर्चा खूब हो रही है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के प्रमुख शरद पवार ने अपनी पार्टी के विधायकों को दल-बदल कानून को लेकर चेतावनी दी। दरअसल शरद पवार के भतीजे अजित पवार के नेतृत्व में राकांपा के विधायकों के समर्थन का दावा भाजपा ने किया है। जबकि, शरद पवार ने मुंबई में अपनी बैठक में 50 विधायकों को जुटाकर दावा किया कि उनकी पार्टी का कोई भाजपा के साथ नहीं है।

अजित पवार के अलावा जो तीन विधायक उनकी बैठक में नहीं पहुंचे, उनके बारे में दावा किया गया कि भाजपा जबरन चार्टर्ड हवाई जहाज से दिल्ली ले गई। महाराष्ट्र में भाजपा के 105 विधायक हैं। उसे बहुमत के लिए 145 विधायक चाहिए। राजनीतिक गलियारों में पूछा जाने लगा है कि क्या राकांपा या कांग्रेस या फिर शिवसेना के विधायक टूटेंगे? अगर टूटे तो क्या कहता है दल-बदल विरोधी कानून? लोकतंत्र की कसौटी पर महाराष्ट्र में यह कानून कैसे राह निकालेगा?

क्या हैं प्रावधान: देश की राजनीति में एक दौर था, जब ‘आया राम और गया राम’ की कहावत खूब सुनी जाती थी। 1967 में तो हरियाणा के एक विधायक ने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली। इस मौकापरस्ती की प्रथा को बंद करने के लिए 1985 में 52वां संविधान संशोधन किया गया और संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई, जिससे कि पार्टी छोड़कर भागने की फितरत पर रोक लगाई जा सके। इसमें विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने पर लगाम लगाई गई। इसमें बताया गया कि दल-बदल के कारण जन प्रतिनिधियों सदस्यता भी खत्म हो सकती है। जो प्रावधान किए गए, उनके मुताबिक इन चार स्थितियों में सदस्यता खारिज हो सकती है- 1. अगर कोई विधायक या सांसद खुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है। 2. अगर कोई सदस्य पार्टी लाइन के विरोध में जाता है। 3. अगर कोई सदस्य पार्टी विप के बावजूद मतदान नहीं करता। 4. अगर कोई सदस्य सदन में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करता है। लेकिन इसमें अपवाद भी है। अगर किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहें, तो उनकी सदस्यता खत्म नहीं होगी।

संशोधन कब और क्यों: वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन किया गया। कानून बनने के समय प्रावधान था कि अगर किसी मूल पार्टी में बंटवारा होता है और एक तिहाई विधायक एक नया समूह बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी। लेकिन इसके बाद भी बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा देखा गया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फायदा उठाया जा रहा है। ऐसे में यह प्रावधान खारिज कर दिया गया। इसके बाद संविधान में 91वां संशोधन जोड़ा गया, जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक दल बदल को असंवैधानिक करार दिया गया। सांसद या विधायक कुछ परिस्थितियों में सदस्यता गंवाने से बच सकते हैं। अगर एक पार्टी के दो तिहाई सदस्य मूल पार्टी से अलग होकर दूसरी पार्टी में मिल जाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी। ऐसी स्थिति में न तो दूसरी पार्टी में विलय करने वाले सदस्य और न ही मूल पार्टी में रहने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जा सकते हैं।

महाराष्ट्र के हालात: राकांपा के 54 विधायक हैं। अगर अजित पवार 36 विधायकों का समर्थन हासिल कर लेते हैं, तो दल-बदल कानून उन पर लागू नहीं होगा। अगर वे इतना समर्थन नहीं जुटा सके तो उनकी सदस्यता जा सकती है। संविधान की 10वीं अनुसूची के मुताबिक विधानसभा अध्यक्ष का दल-बदल को लेकर फैसला आखिरी होगा। 1991 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने व्यवस्था दी कि विधानसभा अध्यक्ष के फैसले की समीक्षा की जा सकती है। यदि एक व्यक्ति को दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित कर दिया जाता है तो वह संसद, विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य होने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।

कानून का नफा-नुकसान: फायदे इस प्रकार हैं : पार्टी के प्रति निष्ठा के बदलाव को रोकने से सरकार को स्थिरता प्रदान करता है, पार्टी के समर्थन के साथ और पार्टी के घोषणापत्रों के आधार पर निर्वाचित उम्मीदवारों को पार्टी की नीतियों के प्रति वफादार बनाए रखता है। पार्टी में अनुशासन को बढ़ावा देता है। नुकसान इस प्रकार हैं : सांसदों को रोकने से यह सरकार की संसद और लोगों के प्रति जवाबदेही कम कर देता है। पार्टी की नीतियों के खिलाफ असंतोष को रोकने से सदस्य की बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ हस्तक्षेप करता है।

दीपक रस्तोगी

 

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