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शोध-अनुसंधान: बीमारियों से बचेगा चना, बढ़ेगी पैदावार

राष्ट्रीय पादप जीनोम अनुसंधान संस्थान (एनआइपीजीआर), दिल्ली के विज्ञानियों ने चने के उन जीन की पहचान की है जिनसे चने की फसल को फंगस (कवक) से होने वाली बीमारियों से बचाया जा सकेगा। इससे देश में चने की पैदावार में 20 फीसद तक की वृद्धि होने की संभावना है।

Author Published on: December 25, 2018 5:01 AM
डॉ कमल कुमार और डॉ प्रवीण वर्मा

राष्ट्रीय पादप जीनोम अनुसंधान संस्थान (एनआइपीजीआर), दिल्ली के विज्ञानियों ने चने के उन जीन की पहचान की है जिनसे चने की फसल को फंगस (कवक) से होने वाली बीमारियों से बचाया जा सकेगा। इससे देश में चने की पैदावार में 20 फीसद तक की वृद्धि होने की संभावना है। इस जीन पर आधारित चने की नई किस्म जल्द ही किसानों को उपलब्ध कराई जाएगी। शोध का नेतृत्व करने वाले एनआइपीजीआर के विज्ञानी डॉक्टर प्रवीण वर्मा ने बताया कि हमने कुछ विदेशी चने की किस्मों में ऐसे जीन की पहचान की है जो फंगस से होने वाली बीमारियों को रोकने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने बताया कि हम मॉलीक्यूलर ब्रिडिंग तकनीक के माध्यम से इस जीन को भारत में होने वाले चने में डालने सफल हुए हैं। इससे हम चने की नई किस्म विकसित करने में सफल रहे हैं, जिसमें झुलसा और गलन जैसी बीमारियां नहीं होंगी। उन्होंने बताया कि मॉलीक्यूली ब्रिडिंग तकनीक भारत में नई है जिसका कुछ ही जगह पर उपयोग होता है।

यह शोध हाल ही में प्लांट, सेल एंड एंवॉयरमेंट जर्नल में छपा है। इस शोध के लिए एनआइपीजीआर ने इस शोध को 2017-18 का सर्वश्रेष्ठ शोध घोषित किया है। सह शोधकर्ता डॉ कमल कुमार ने बताया कि जब आपके शोध से समाज को लाभ होता है तो उससे बहुत खुशी मिलती है। डॉक्टर वर्मा ने बताया कि भारत दुनिया में चना उगाने वाला सबसे बड़ा देश है। हमारे यहां दुनिया की उपज का 68 फीसद चना पैदा होता है और इसके बावजूद हम दुनिया में सबसे अधिक चना आयात भी करते हैं। साल 2026-17 में भारत सरकार ने 4.21 लाख टन चने का आयात किया गया था। उन्होंने बताया कि भारतीय लोगों के खान-पान में चना विभिन्न तरीकों से शामिल है। इसका इस्तेमाल चने, दाल और बेसन के रूप में पकौड़ों से लेकर लड्डुओं को बनाने में होता है।

इसके अलावा देश के हर प्रांत में चने या बेसन से बने व्यंजनों को खूब पसंद किया जाता है। यही वजह है कि भारत में चने का भाव हमेशा ऊंचा ही रहता है। देश में 86 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि पर यह पैदा किया जाता है और 53 लाख टन से ज्यादा चने की हर साल पैदावार होती है। बीमारियों के कारण 7.5 लाख टन उपज का हर साल नुकसान होता है। डॉक्टर वर्मा ने बताया कि वर्तमान में इन बीमारियों से बचने के लिए किसान फसलों पर कवकनाशी का छिड़काव करते हैं। ये पर्यावरण के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। इसके अलावा यह बहुत महंगा होता है और इससे किसान की लागत बढ़ जाती है। डॉक्टर वर्मा भारतीय कृषि शोध संस्थान (आइएआरआइ) के कृषि विज्ञानी डॉक्टर सी भारद्वाज के साथ मिलकर नए जीन के इस्तेमाल से चने की नई किस्म विकसित करने में लगे हैं जो कवक से होने वाली बीमारियों से मुक्त रहे। इनके शुरुआती परिक्षण कामयाब रहे हैं और 2021 तक चने की इस नई किस्म के बीज किसानों को उपलब्ध करा दिए जाएंगे।

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