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कंप्यूटर निगरानी: कितना चौकस ताना-बाना!

कम्प्यूटर की निगरानी को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक आदेश को लेकर देश में बहस का दौर चल निकला है। गृह सचिव राजीव गौबा के दस्तखत से जारी इस आदेश में देश की 10 बड़ी जांच, खुफिया, प्रवर्तन एजंसियों एवं राज्यों की पुलिस को अधिकार दिए गए हैं कि वे किसी भी कंप्युटर में झांक सकती हैं, उनका डाटा निकाल सकती हैं, अन्य जानकारियां हासिल कर सकती हैं।

Author Updated: December 25, 2018 5:16 AM
प्रतीकात्मक फोटो

कम्प्यूटर की निगरानी को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक आदेश को लेकर देश में बहस का दौर चल निकला है। गृह सचिव राजीव गौबा के दस्तखत से जारी इस आदेश में देश की 10 बड़ी जांच, खुफिया, प्रवर्तन एजंसियों एवं राज्यों की पुलिस को अधिकार दिए गए हैं कि वे किसी भी कंप्युटर में झांक सकती हैं, उनका डाटा निकाल सकती हैं, अन्य जानकारियां हासिल कर सकती हैं। यूं भी देश में इन एजंसियों के पास इलेक्ट्रॉनिक जासूसी के अधिकार रहे हैं। नए प्रावधानों से सरकार के क्या इरादे झलकते हैं? नए आदेश पर राजनीतिक बहस जारी है। तकनीक एवं डिजिटल सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डेटा इंटरसेप्शन और डीक्रिप्शन के आदेश दरअसल पुराने नियमों (आइटी एक्ट 2000) का विस्तारीकरण हैं, लेकिन लोग इसका मतलब अपने हिसाब से निकालेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों में यह डर बैठ सकता है कि सरकार उनकी निजता में ‘ताक-झांक’ कर रही है।

क्या है आदेश
गृह मंत्रालय के आदेश के अनुसार, अब 10 एजंसियों को अधिकार दिया गया है कि वे किसी भी कंप्यूटर के डाटा की जांच कर सकती हैं। गृह मंत्रालय ने आइटी एक्ट, 2000 के 69 (1) के तहत यह आदेश दिया है, जिसमें कहा गया है कि भारत की एकता और अखंडता के अलावा देश की रक्षा और शासन व्यवस्था बनाए रखने के लिहाज से जरूरी लगे तो केंद्र सरकार किसी एजंसी को जांच के लिए आपके कंप्यूटर को एक्सेस करने की इजाजत दे सकती है। कानून की उपधारा एक के अनुसार, निगरानी के अधिकार किन एजंसियों को दिए जाएंगे, यह सरकार तय करेगी। उपधारा दो के मुताबिक, अगर कोई अधिकार प्राप्त एजंसी किसी को सुरक्षा से जुड़े मामलों में बुलाती है तो उसे एजंसियों को सहयोग करना होगा और सारी जानकारियां देनी होंगी। उपधारा तीन में, अगर बुलाया गया व्यक्ति एजंसियों की मदद नहीं करता है तो वह सजा का अधिकारी होगा। इसमें सात साल तक जेल का भी प्रावधान है।

आलोचना क्यों
विपक्ष समेत नागरिक समाज के एक हिस्से में नए नियमों की कड़ी आलोचना की जा रही है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकार की जांच एवं प्रवर्तन एजंसियों को अधिकारों के दुरुपयोग का एक और हथियार नहीं पकड़ा दिया गया? सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि इस आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का क्या होगा जिसमें निजता को नागरिकों का बुनियादी अधिकार करार दिया गया था? इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन नाम के संगठन ने बयान जारी किया है कि गृह मंत्रालय का आदेश टेलीफोन टैपिंग से कहीं आगे जाता दिखता है। इस आदेश में जो कुछ कहा गया है वह कहीं ज्यादा निजता का उल्लंघन है।

गृह मंत्रालय के अधिकारी मंत्रालय का कहना है कि आदेश इसलिए दिया गया है, ताकि सूचना एवं तकनीकी एक्ट में मौजूद विसंगतियों को दूर करके देश की सुरक्षा के लिए खतरा बने आतंकवादियों के डाटा को एक्सेस किया जा सके। मंत्रालय ने सफाई दी है कि अभी तक हमारे पास इस तरह का कोई अधिकार नहीं था कि हम किसी के सोशल मीडिया डाटा को एक्सेस कर सकें। टेलिग्राफ एक्ट के अंतर्गत इस तरह के प्रावधान थे कि एजंसियां किसी भी संदिग्ध व्यक्ति के फोन को टैप कर सकती थीं, लेकिन आइटी एक्ट के अंतर्गत इस तरह का प्रावधान नहीं है। फोन टैपिंग के लिए गृह सचिव की अनुमित लेनी पड़ती है और गृह सचिव के आदेश की जांच भी कैबिनेट सचिव करते हैं। इसी तरह कंप्यूटर की निगरानी आदेश के लिए पहले यह सिद्ध करना होगा कि देश की सुरक्षा के मद्देनजर कदम उठाया गया है।

किसे है आदेश जारी करने का अधिकार
राज्य और केंद्र- दोनों के सचिवों को ऐसे आदेश देने का अधिकार है कि वे खास मामलों में या जिनमें जरूरत समझी जाए, उसमें निगरानी, जासूसी या डाटा आदि निकालने की इजाजत दे दें। देश की ये प्रमुख सुरक्षा एजंसियां किसी भी व्यक्ति के कंप्यूटर में जेनरेट, ट्रांसमिट, रिसीव और स्टोर किए गए किसी भी दस्तावेज को देख सकती हैं। किसी भी एजंसी को कोई नई शक्तियां नहीं दी गई हैं। हस्तक्षेप, निगरानी, इनक्रिप्शन और डिक्रिप्शन के प्रत्येक मामले को सक्षम प्राधिकारी यानी केंद्रीय गृह सचिव के द्वारा अनुमोदित किया जाना है। खुफिया एजंसियों को यह अधिकार सूचना और प्रौद्योगिकी (आइटी) एक्ट की धारा-69 के तहत दिया गया है।

क्या है निगरानी का इतिहास
तकनीक के जरिए आपराधिक गतिविधियों को अंजाम नहीं दिया जा सके, इसके लिए करीब सौ साल पहले इंडियन टेलिग्राफ एक्ट बनाया गया था। इस एक्ट के तहत सुरक्षा एजंसियां उस समय टेलिफोन पर की गई बातचीत की रिकॉर्डिंग (टैपिंग) करती थीं। संदिग्ध लोगों की बातचीत ही सुरक्षा एजंसियों की निगरानी में होती थी। तकनीक की प्रगति के साथ जब कंप्युटर का चलन बढ़ा और इसके जरिए अपराध किए जाने लगे तो वर्ष 2000 में भारतीय संसद ने आइटी कानून बनाया।

क्या है धारा 69
आइटी की धारा 69 में कहा गया है कि यदि एजंसियों को किसी संस्थान या व्यक्ति पर देशविरोधी गतिविधियों में शामिल होने का शक होता है तो वे उनके कंप्यूटर की जांच कर सकती हैं। गृह सचिव राजीव गौबा के एक विस्तृत आदेश में कहा गया है कि हाल के दिनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें दुश्मन देश हनीट्रैप के जरिए सेना के अधिकारियों और संवेदनशील पदों पर बैठे अधिकारियों से खुफिया जानकारी हासिल करते पाए गए। देश के कई इलाकों से पाकिस्तान को खुफिया जानकारी देते हुए ऐसे कई लोग पकड़े भी गए हैं।

क्या कहते हैं जानकार
पहले जांच एवं प्रवर्तन एजंसियों को इंटरसेप्शन के लिए अदालत से आदेश लेना होता था। अब यह व्यवस्था खत्म कर दी गई है। डाटा जमा करने, इसके इनक्रिप्शन और डीक्रिप्शन को कानूनी जामा पहना दिया गया है।
-रोडनी राइडर, साइबर कानून विशेषज्ञ

इलेक्ट्रॉनिक निगरानी के नए प्रावधान असंवैधानिक, निजता के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन हैं। सरकारी एजंसियां बेजा इस्तेमाल करेंगी।
– इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन, नई दिल्ली की डिजीटल अधिकार संस्था

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