उत्तर प्रदेश में बिजली के स्मार्ट मीटर आम लोगों के लिए परेशानी का कारण बन गए हैं। बिना सूचना के बिजली कट रही है, रिचार्ज के बाद भी निगेटिव बैलेंस के संदेश आ रहे हैं और भुगतान करने के बावजूद कई दिनों तक बिजली आपूर्ति सुचारू नहीं हो पा रही है। गाजियाबाद जिले में भी हजारों उपभोक्ता इन स्मार्ट मीटरों के आगे बेबस नजर आ रहे हैं। उनका दावा है कि स्मार्ट मीटर की वजह से न सिर्फ बिजली कट रही है बल्कि कुछ मामलों में पहले की तुलना में बिल भी ज्यादा आने लगा है।
जनसत्ता ने स्मार्ट मीटर की इस समस्या को समझने के लिए गाजियाबाद के उपभोक्ताओं से सीधी बात की। कुछ अधिकारियों से भी सवाल-जवाब किए। समझने का प्रयास है कि जमीनी हकीकत क्या है, लोगों की परेशानियां क्या हैं, सिस्टम की खामियां क्या रही हैं।
गाजियाबाद में 24 मार्च को अचानक से हजारों लोगों की बिजली कट गई थी। जांच में पता चला कि स्मार्ट मीटर को बिना बताए ही पोस्टपेड से प्रीपेड कर दिया गया, इस वजह से कई उपभोक्ताओं का बैलेंस निगेटिव में चला गया। हैरानी की बात यह रही कि कई मामलों में कोई मैसेज या रिमाइंडर नहीं मिला, सीधे बिजली काट दी गई। नेहरू नगर निवासी विनय गुप्ता ने जनसत्ता से बात करते हुए कहा कि मैंने 16 मार्च को ही अपना बिजली बिल भरा था, लेकिन 24 मार्च को मुझे एक मैसेज आया कि मेरा बैलेंस निगेटिव है। इससे पहले मैं फिर कुछ कर पाता, बिजली जा चुकी थी।
मैंने 16 मार्च को ही अपना बिजली बिल भरा था, लेकिन 24 मार्च को मुझे एक मैसेज आया कि मेरा बैलेंस निगेटिव है। इससे पहले मैं फिर कुछ कर पाता, बिजली जा चुकी थी। दोपहर 12 बजे गई बिजली रात को आठ बजे तक आ पाई।
विनय गुप्ता, स्थानीय निवासी
विनय गुप्ता के मुताबिक उन्होंने बिजली कटने के तुरंत बाद फिर पैसे डाल रीचार्ज किया था, लेकिन बिजली वापस नहीं आई। दोपहर 12 बजे गई बिजली रात को आठ बजे तक आ पाई। गाजियाबाद निवासी राजेश भी ऐसी ही शिकायत करते हैं। उनकी सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि पहले बिजली विभाग ने कहा था कि उपभोक्ताओं को विकल्प दिया जाएगा कि उन्हें प्रीपेड सिस्टम चाहिए या फिर पोस्टपेड। लेकिन बाद में बिना किसी सूचना के स्मार्ट मीटर को प्रीपेड कर दिया गया और बैलेंस निगेटिव में चला गया।
राजेश शिकायत करते हैं कि देश में कितने लोगों के करोड़ों रुपये बकाया होंगे और यहां 200-300 रुपये के लिए बिजली काट दी जाती है। राजेश कहते हैं कि उन्होंने हमेशा समय पर ही बिजली का बिल दिया है, कई सालों से वे गाजियाबाद में रह रहे हैं। लेकिन यह पहली बार है जब इस तरह से बिजली काट दी गई हो।
पहले बिजली विभाग ने कहा था कि उपभोक्ताओं को विकल्प दिया जाएगा कि उन्हें प्रीपेड सिस्टम चाहिए या फिर पोस्टपेड। लेकिन बाद में बिना किसी सूचना के स्मार्ट मीटर को प्रीपेड कर दिया गया और बैलेंस निगेटिव में चला गया। देश में कितने लोगों के करोड़ों रुपये बकाया होंगे और यहां 200-300 रुपये के लिए बिजली काट दी जाती है।
राजेश गुप्ता, स्थानीय निवासी
जनसत्ता ने अपनी पड़ताल में कुछ महिलाओं से भी बात की जिन्हें इस स्मार्ट मीटर की वजह से अपने बजट बिगड़ते दिख रहे थे। गाजियाबाद निवासी अमृता बताती हैं कि जब से उनके घर पर स्मार्ट मीटर लगा है, बिल पहले से ज्यादा आता है। उन्हें इस बात की ज्यादा नाराजगी है कि बिजली कटने के बाद शिकायत का कहीं निवारण नहीं होता है। वे कहती हैं कि मेरे घर की भी बिजली अचानक से चली गई थी। हम सीधे अपने कविनगर वाले बिजली विभाग के पास गए थे। वहां के अधिकारियों के पास कोई जवाब नहीं था, बस इतना कह रहे थे कि सबकुछ लखनऊ से ऑपरेट हो रहा है।
अब जनसत्ता को उपभोक्ताओं से बात कर पता चला कि मुख्य रूप में स्मार्ट मीटर को लेकर तीन शिकायतें प्रबल रहीं। पहली यह कि सरकार ने जनता को स्मार्ट मीटर को लेकर जागरूक नहीं किया। दूसरी शिकायत यह कि तीन दिन के इमरजेंसी क्रेडिट के बाद भी तुरंत बिजली कैसे काट दी गई। तीसरी शिकायत यह कि 30 दिन के ग्रेस पीरियड वाले वादे से मुंह क्यों फेरा गया।
जनता की इन्हीं शिकायतों को लंबे समय से उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा उठा रहे हैं। स्मार्ट मीटर के मुद्दे पर भी वे सबसे मुखर आवाज रहे हैं। जनसत्ता ने जब उनसे संपर्क साधा तो उन्होंने सिलसिलेवार तरीके से ना सिर्फ इस मुद्दे को समझाया बल्कि सरकार की लापरवाही, बड़ी कंपनियों की मिलीभगत और जनता के अधिकारों के बारे में विस्तार से बात की।
विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5) के तहत उपभोक्ताओं को प्रीपेड और पोस्टपेड मीटर का विकल्प उपलब्ध है। ये बात हमने भी मिनिस्ट्री ऑफ पावर की एक मीटिंग में कही थी। हमने कहा था कि एक्ट में जब यह प्रावधान है तो फिर उपभोक्ता को कैसे इससे वंचित रखा जा सकता है। उत्तर प्रदेश में 70 लाख बिजली कनेक्शन को बिना पूछे ही प्रीपेड मॉडल में कर दिया गया।
अवधेश कुमार, उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष
अवधेश कुमार जोर देकर कहते हैं कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट एक राष्ट्रीय कानून है जिसे कोई भी अधिसूचना नहीं बदल सकती है। अगर कोई अधिसूचना को लेकर आता है तो पहले इलेक्ट्रिसिटी एक्ट में बदलाव की जरूरत है। उनके मुताबिक अगर उपभोक्ता चाहेगा तभी प्रीपेड मीटर लग सकता है। ये बात राष्ट्रीय कानून में लिखी हुई है, ऐसे में अगर इसमें कोई बदलाव ही नहीं किया गया तो फिर उपभोक्ताओं को कैसे इसके लिए बाध्य किया जा सकता है।
जनसत्ता से बातचीत के दौरान कई उपभोक्ताओं ने इस बात की शिकायत की कि उन्हें बिना जागरूक करे स्मार्ट मीटर्स को प्रीपेड बनाया गया था, उन्हें इस प्रकार की जल्दबाजी का कोई कारण समझ नहीं आया। इस बारे में जब अवधेश कुमार से पूछा गया तो उन्होंने टेंडर का एक अलग ही खेल समझाया। अवधेश कुमार ने बोला कि कई निजी घराने थे जिन्हें पांच-पांच हजार करोड़ का ठेका दिया गया था, उसमें क्लॉज था कि जब ये प्रीपेड मीटर चलने लगेंगे तो पेयमेंट भी आनी शुरू हो जाएगी। इसी वजह से इन निजी घरानों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया और इसी वजह से उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन लिमिटेड ने भी जल्दबाजी में ही बिना तैयारी के स्मार्ट मीटर्स को प्रीपेड में कनवर्ट कर दिया।
एक और पहलू पर रोशनी डालते हुए अवधेश कुमार बताते हैं कि यूपी को स्मार्ट मीटर प्रोजेक्ट के लिए भारत सरकार से 18885 करोड़ का बजट मिला था, लेकिन प्रदेश में 27,342 करोड़ रुपये का टेंडर जारी कर दिया गया। हमने तब भी सवाल उठाया था कि यह अत्यधिक राशि कहां से आएगी, हमने सीबीआई जांच की भी मांग की थी। इसी दबाव में सब हड़बड़ी हुई और हर्जाना पूरे प्रदेश को भुगतना पड़ा।
उत्तर प्रेदश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने इस बात पर भी नाराजगी व्यक्त की है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद उपभोक्ताओं का बिजली का बिल कम आया या ज्यादा, इसे लेकर कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं दिया जा रहा है। दावा तो यह हुआ है कि कई उपभोक्ताओं के बिल पहले की तुलना में ज्यादा आने लगे हैं, इस वजह से भी इस प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। इस बारे में अवधेश कुमार कहते हैं कि परिषद ने तो सामने से डेटा मांगा था, उससे पता चला कि 36 फीसदी तक बिल में इजाफा हुआ।
अब इस लापरवाही और जनता की परेशानी को देखते हुए अवधेश कुमार जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ एक्शन चाहते हैं, उनका मानना है कि जनता को यूं परेशान करना राजद्रोह है।
