ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: उत्सवधर्मिता की तलाश में

व्यष्टि की जगह समष्टि चिंतन का विचार आज लगभग बेमानी हो चुका है। यह शुद्ध बाजारी ताकतों का प्रभाव है। बाजार आज हमारे शयन कक्ष तक में प्रवेश कर चुका है। यहां तक कि वह आपकी सोच और प्राथमिकताओं को भी बदल रहा है। हमें परस्पर ईर्ष्या और अंधी दौड़ की ओर धकेल रहा है।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

उत्सव शब्द में उत्स का भाव जुड़ा हुआ है, लेकिन समय के साथ हम देख रहे हैं कि यह उत्साह का भाव ही लुप्त होता जा रहा है। जो थोड़ी-बहुत चहल-पहल त्योहारों पर आपको दिखाई देती है, उसके मूल में आंतरिक उल्लास और उमंग कम, बाहरी दिखावा और प्रदर्शन की भावना अधिक है। आज त्योहारों का रूप धूम-धड़ाका और तड़क-भड़क से सीधा जुड़ गया है। इन मौकों पर सबके साथ उठने-बैठने की परंपरा लगभग समाप्त हो गई है। जब हम समूह के रूप में अपने परिजनों, शुभचिंतकों और मोहल्ले के लोगों के साथ संवाद ही नहीं कर रहे, तो उत्सव का अर्थ ही क्या हुआ! ये त्योहार कभी समाज के विभिन्न तबकों को एक साथ जोड़ने और सुख-दुख में उनके सहभागी होने के भी प्रतीक थे। जो संपन्न और समर्थ लोग थे, वे अपने से कम आर्थिक हैसियत वाले तबके और अपने पर आश्रित लोगों की सहायता करते थे। अब लोग खुद में सिमटते गए हैं। इस एकाकी और उपभोक्तावादी चिंतन ने हमारे समाज की समन्वयवादी अवधारणा को ठेस पहुंचाई है। त्योहारों के व्यापक अर्थ संकीर्ण हो गए हैं। मनुष्य खुद और अपने परिवार के आगे सोच ही नहीं पा रहा है।

व्यष्टि की जगह समष्टि चिंतन का विचार आज लगभग बेमानी हो चुका है। यह शुद्ध बाजारी ताकतों का प्रभाव है। बाजार आज हमारे शयन कक्ष तक में प्रवेश कर चुका है। यहां तक कि वह आपकी सोच और प्राथमिकताओं को भी बदल रहा है। हमें परस्पर ईर्ष्या और अंधी दौड़ की ओर धकेल रहा है। हम आवश्यक वस्तुओं की जगह समाज में अपनी झूठी शानो-शौकत के चलते विलासिता की और गैर जरूरी चीजें खरीद लाते हैं। फिर घरेलू अर्थव्यवस्था के बिगड़ते ही कर्ज के मायाजाल में फंसते चले जाते हैं। दरअसल, त्योहारों का आनंद तब है, जब हम उनमें कहीं न कहीं क्रियात्मक रूप से जुड़े हों। लेकिन बदलते हुए हालात में समय की सबके पास भारी कमी है। संतानें आजीविका या कैरियर के चलते बाहर हैं। घर के सभी लोग अपने-अपने व्यवसायों और नौकरी में व्यस्त हैं। ऐसे में सब कुछ बाजार के भरोसे है। मीठे का पर्याय चॉकलेट हो चुकी है। कभी गेरू और चावल पीस कर, घर में रंगों से लगाए जाने वाले मांडणे भी अब बने-बनाए प्लास्टिक के बाजार में मिलते हैं।

यानी हमारी कलात्मक अभिव्यक्ति को भी विराम मिल गया है और हमारे लिए अब कुछ करने-धरने की गुंजाइश नहीं बची है। ऐसे में जब हम कर्म रूप में किसी उत्सव या आयोजन से नहीं जुड़ते हैं तो आनंद की सच्ची अनुभूति तलाशना व्यर्थ है। फिर लोग यह शिकायत करते पाए जाते हैं कि अब त्योहारों पर पहले जैसा आनंद नहीं रहा। हमें खुद से पूछना चाहिए कि हममें पहले जैसी सक्रियता और श्रम करने की सामर्थ्य बची है क्या? त्योहार मात्र इसलिए अपना उत्सवी रंग या प्रभाव नहीं खोते जा रहे कि अर्थव्यवस्था की चुनौतियों ने उसे परास्त कर दिया है। बल्कि इसलिए भी कि वे अपना समग्र प्रभाव खो रहे हैं। मनुष्य के अंदर की उदारता का स्थान कृपणता ने ले लिया है। हम उन्हीं के घर आना-जाना पसंद करते हैं, जिनसे या तो हमारी गहरी आत्मीयता है या स्वार्थ भविष्य में सधने वाले होते हैं। महंगे तोहफों के कुटिल तंत्र के पीछे भी यही दूरगामी स्वार्थी चिंतन छिपा हुआ है।

नतीजा यह है कि उत्सव के अंदर की सादगी और उसका सौंधापन गायब हो रहा है। मैं कितना समृद्ध हूं, मैं कितने महंगे परिधान पहन सकता हूं और कितने महंगे वाहन खरीद सकता हूं… हमारी सोच इसी में कैद हो गई है। इन सबकी सेल्फी खींच कर सोशल मीडिया पर डाल कर ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ बटोरने के शुद्ध दिखावे तक हमारा उत्सवी भाव सीमित रह गया है। कहते हैं श्रद्धा जब कर्म में परिणत होती है, तब अपना प्रभाव छोड़ती है। यही सत्य उत्सवों और त्योहारों पर भी लागू होता है। जब तक हम मानसिक और शारीरिक रूप से उससे संबद्ध नहीं होंगे, हमें आनंद और उल्लास का अनुभव नहीं होगा।

महंगी वस्तुओं को खरीद कर हम क्षणिक सुख की अनुभूति और मित्रों की प्रशंसा तो बटोर सकते हैं, लेकिन दीर्घकालीन आत्मिक प्रसन्नता का अनुभव तो तभी होगा जब हम समग्र चिंतन की दिशा में आगे बढ़ेंगे और समाज के पिछड़े और कमजोर तबके के साथ मिल-जुल कर अपने त्योहारों को मनाएंगे। बहुत कम मेहनताने पर अपने घर के काम को संभालने वाली महिला, हमारे ड्राइवर और घरेलू सहायकों को भी अपनी खुशी में सहभागिता का अनुभव कराएंगे। धन का बेहूदा और फूहड़ प्रदर्शन सिर्फ भेद और वैमनस्य की खाई को ही चौड़ा करेगा। बाजार संचालित इस समय में अपने अंदर की संवेदनाओं को बचा कर रखना और प्रदर्शन के इस युग में अपनी सहजता को बरकरार रखना सबसे बड़ी चुनौती है। बेहतर हो कि उत्सवों की फीकी होती चमक के सूत्र हम अपने अंदर ही तलाशें।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App