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दुनिया मेरे आगे: बोझ तले मासूम

इस सबके बीच मनुष्य की सबसे बड़ी इच्छा रही है कि वह अमर हो जाए, लेकिन सामान्य ज्ञान वाला व्यक्ति भी जानता है कि यह असंभव है। फिर भी लोग इसे संभव करने में लगे रहते हैं। जो लोग यह नहीं कर पाते हैं, वे इसका रास्ता खोजते हैं अपने बेटे में। बेटे से वंश चलने की बेमानी धारणा सदियों से जारी है। परिवार में मां-बाप का समूचा ध्यान बेटे पर रहता है। इस चिंतन में बेटी की जगह नहीं है।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फोटो सोर्स- pixabay)

समाज, परिवार और व्यक्ति से मिल कर देश बनता है। इस सबके बीच मनुष्य की सबसे बड़ी इच्छा रही है कि वह अमर हो जाए, लेकिन सामान्य ज्ञान वाला व्यक्ति भी जानता है कि यह असंभव है। फिर भी लोग इसे संभव करने में लगे रहते हैं। जो लोग यह नहीं कर पाते हैं, वे इसका रास्ता खोजते हैं अपने बेटे में। बेटे से वंश चलने की बेमानी धारणा सदियों से जारी है। परिवार में मां-बाप का समूचा ध्यान बेटे पर रहता है। इस चिंतन में बेटी की जगह नहीं है। हर मां-बाप बेटे पर अपनी इच्छाएं थोपने से बाज नहीं आते हैं। बच्चा क्या है और क्या होना चाहता है, बिना इस पर विचार किए या इसे जाने, बच्चे पर अपने विचार थोप दिए जाते हैं। स्त्रियों, समाज के दूसरे वर्गों-जातियों के प्रति दृष्टि और मानस भी इसी बुनियाद से निर्धारित हो जाते हैं।

आधुनिक मूल्य-बोध और लोकतांत्रिकता इस विचार का खंडन करती है। सभी को अपनी तरह से बनने और जीने का अधिकार है। लेकिन भारतीय संस्कार बेटे को बुढ़ापे की लाठी कह कर उसे वज्र की तरह मजबूत बनाना चाहते हैं। जबकि बच्चा अपने पंखों से अपनी उड़ान भरना चाहता है। बालमन पर भारी-भरकम महत्त्वाकांक्षाओं का वजन डाल दिया जाता है। खेलने के दिनों में वह स्कूल, प्ले स्कूल, वीडियो गेम, मोबाइल आदि में रास्ता खोज रहा होता है। आज बच्चे के चलने के लिए हजारों रास्ते ही नहीं, तेज रफ्तार वाली फोर-लेन सड़कें हैं। वह पिछली पीढ़ी से कई मायनों में काफी आगे है। ऐसे में मां-बाप द्वारा परछाई बनना उसे सीमित करना ही नहीं, उसके पंख काटना है।

पंछी को अगर पंख है, तो वह उड़ेगा ही। बच्चा है तो एक दिन वह परिपक्व व्यक्ति बनेगा ही। इससे रोकने वाले मां-पिता नहीं जानते हैं कि बड़े होकर भी वे उसके लिए कितना छोटा काम कर रहे हैं। इस बात का अंदाजा मुझे उस समय हुआ, जब वर्षों बाद एक दोस्त के घर जाना हुआ। दोस्त ने महानगर में रहने और बच्चे को पाल-पोस कर बड़ा करने में की जाने वाली अपनी मेहनत के बारे में बताया। मैं मझोले शहर में रहने वाला हूं, तो यह सुनता रहा कि मेरे साथी ने बच्चे को कैसे बनाया है। वहां से लौटने के बाद मैं दोस्त के तरीके पर सोचता रहा तो मुझे लगा कि वह बच्चे के स्वाभाविक विकास में अवरोध खड़ा कर रहा है।
करीब बीस साल पहले की घटना याद आती है। मेरे पड़ोसी के घर में एक व्यक्ति को अपनी वृद्धावस्था करीब आने पर पुत्र हुआ। मां-बाप के लिए इकलौता लाड़ला रहा, सो हर चीज हाथ हाथ में दी जाती। बड़े लाड़-प्यार से पाला गया। चार-पांच साल होने तक भी उसे अंगुली पकड़ कर चलाते रहे। साये की तरह उसके साथ रहते। वह आत्मनिर्भर होने से महरूम रह गया। उसका स्वाभाविक विकास नहीं हो सका। आज भी वह कदम-कदम पर बड़ों पर आश्रित होकर रह रहा है।

मेरे मित्र बेटे को पढ़ने के बेहतर अवसर दे रहे हैं। सारे अवरोध हटा दिये गए हैं। घर में टीवी बंद कर दिया गया है। उसे स्मार्टफोन से दूर रखा जा रहा है और महंगी कोचिंग संस्थान में पढ़ाया जा रहा है। लेकिन स्कूल का सवाल गायब है। यह कौन-सी शिक्षा है, जिसमें स्कूल के शिक्षक और कक्षा की बात भी नहीं हो रही है? बच्चे को आत्मनिर्भर करने की सोच सिरे से गायब हो रही है। क्या स्कूल का विकल्प कोचिंग बन सकते हैं? क्या कोचिंग चलाने वालों का उद्देश्य शिक्षा देना है? अगर सरकार का दायित्व शिक्षा देना रहा है तो फिर निजीकरण के पीछे क्या मकसद है? लोकतंत्र में शिक्षा सर्व-सुलभ होना आवश्यक है। शिक्षा का परिवेश दबाव से मुक्त होना जरूरी है। कोचिंग संस्थानों में विद्यार्थी नहीं, प्रतियोगी होते हैं।

लेकिन स्कूल के ढांचे को गिराने के उपक्रम लगातार जारी है। स्कूल में नामांकन जरूर कराया जाता है, पर बच्चे कोचिंग में हाजिर होते हैं। पहले निजी स्कूल स्टेट्स सिंबल या प्रतिष्ठा का प्रश्न हुआ, अब कोचिंग ने स्कूलों का स्थान ले लिया है। सवाल है कि बच्चे स्कूल से क्यों गायब हो रहे हैं? इसके लिए सरकारों की ढुलमुल नीतियां जिम्मेदार हैं। शिक्षा का व्यावसायीकरण हो चला है। मध्यवर्ग इसे अपने हित में पाता है, लेकिन यह समग्र और हाशिये के समाज के हर तरह से विरोध में है।

दरअसल, कोचिंग शुद्ध व्यवसाय पर आधारित समाज विरोधी संस्था है। राजस्थान के कोटा में आत्महत्या करती पीढ़ी को देख कर समझा जा सकता है कि बच्चों पर उनके माता-पिता ने कैसा बोझ डाल दिया है! ज्यादातर बच्चे आज भी अप्रत्यक्ष रूप से पिता की अंगुली पकड़े हुए हैं। सवाल है कि हर वक्त किसी न किसी रूप में बच्चे की अंगुली पकड़ कर रखना, अतिरिक्त सुरक्षा का भाव क्या उसे असुरक्षित नहीं बना रहा है? बेशक यह साथ भावनापूर्ण है, सुरक्षा की दृष्टि से उचित भी लगता है, लेकिन बच्चे की परछाई बन जाना आखिर उसे कमजोर करना है।

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