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राजनीति: नए शीत युद्ध की आहट

दरअसल, कर्च स्ट्रेट के पुल के नीचे समुद्री परिवहन को नियंत्रित कर रूस यूक्रेन के अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है। इस महीने के शुरू में यूरोपीय यूनियन ने भी रूस को यूक्रेन जहाजों की निगरानी के खिलाफ चेताया था। यूरोपीय यूनियन का कहना है कि रूस का यह कदम स्वतंत्र नौ परिवहन का उल्लंघन है। इन्हीं विवादों के बाद रूस और यूक्रेन के बीच तनाव बढ़ा।

Author December 8, 2018 5:38 AM
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन। (फाइल फोटो)

राहुल लाल

रूस और यूक्रेन के ताजा टकराव ने वैश्विक ताकतों के बीच एक बार फिर तनाव पैदा कर दिया है। इसे नए शीत युद्ध की आहट के रूप में देखा जा रहा है। रूस और यूक्रेन के बीच तनाव इस हद तक बढ़ गया है कि दोनों देशों ने युद्ध की तैयारियां शुरू कर दी हैं। यूक्रेन ने जर्मनी व सहयोगी देशों से भी काला सागर में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ाने को कहा है। यूक्रेन ने अपनी आरक्षित सेना के डेढ़ हजार से ज्यादा जवानों को युद्धाभ्यास के लिए बुलाया है। वहीं दूसरी ओर रूस ने भी सुपरसोनिक मिग-31 की तैनाती कर दी है। पिछले हफ्ते यूक्रेन के तीन नौसैनिक जहाजों पर हमले के बाद रूस और यूक्रेन के बीच तनाव फिर से चरम पर पहुंच गया। रूस ने क्रीमियाई प्रायद्वीप के पास यूक्रेन के तीन जहाजों पर हमला कर उन्हें अपने कब्जे में ले लिया। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के बीच जी-20 के अर्जेंटीना बैठक में बहुचर्चित पुतिन और ट्रंप की मुलाकात भी रद्द हो गई। जी-20 के बैठक में भी यूक्रेन का मामला छाया रहा। पुतिन ने ट्रंप द्वारा वार्ता रद्द करने पर गहरा आक्रोश प्रकट करते हुए कहा कि वे अब कभी ट्रंप से नहीं मिलेंगे।

स्पष्ट है कि इस विवाद ने पहले से ही खराब चल रहे अमेरिका और रूस के संबंधों को और भी खराब कर दिया। यूक्रेन के राष्ट्रपति पेट्रो पोरोशेन्को की पहल पर यूक्रेन की संसद ने सीमावर्ती इलाकों में मार्शल लॉ लगाने की मंजूरी दी है। मार्शल लॉ लगने के बाद वहां सुरक्षाकर्मियों की शक्तियों में अप्रत्याशित वृद्धि हो गई है। साथ ही मार्शल लॉ के बाद सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए गए हैं। दोनों देशों के बीच जंग को लेकर रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि यूक्रेन में जब तक पोरोशेन्को की सरकार सत्ता में रहेगी, तब तक रूस युद्ध जारी रखेगा। रूसी राष्ट्रपति का यह रुख इस आशंका को जन्म देता है कि पश्चिमी देश और रूस के बीच युद्ध का आगाज कभी भी हो सकता है।

रूस और यूक्रेन के बीच क्रीमिया को लेकर तनाव चलता आ रहा है। वर्ष 2003 में हुई की संधि के मुताबिक रूस और यूक्रेन के बीच कर्च जलमार्ग और ओजोव सागर के बीच जल सीमाएं बंटी हुई हैं। रूस और यूक्रेन के ताजा विवाद ने क्रीमिया संकट और गहरा बना दिया है। यूक्रेन में 2014 में जब क्रांति हुई थी और रूस समर्थक राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को पद छोड़ना पड़ा था, तब रूस ने यूक्रेन में दखल देकर क्रीमिया में रूसी सेना भेजी और उसे अपने कब्जे में लिया। इसके पीछे रूस ने तर्क दिया था कि वहां रूसी मूल के लोग बहुतायत में हैं, जिनके हितों की रक्षा करना रूस की जिम्मेदारी है। क्रीमिया में सबसे ज्यादा संख्या रूसियों की है। इसके अलावा वहां यूक्रेनी, तातर, आर्मेनियाई, पोलिश और मोल्दावियाई लोग भी हैं। छह मार्च, 2014 को क्रीमियाई संसद ने रूसी संघ का हिस्सा बनने के पक्ष में मतदान किया था। इसी जनमत संग्रह के परिणामों को आधार बना कर 18 मार्च, 2018 को क्रीमिया का रूस में विलय हो गया। यूक्रेन सहित संपूर्ण पश्चिमी देशों ने इस पर गभीर आपत्ति जताई थी। उल्लेखनीय है कि क्रीमिया सत्रहवीं सदी से रूस का हिस्सा रहा है, लेकिन 1954 में तत्कालीन सोवियत संघ के राष्ट्रपति ख्रुश्चेव ने यूक्रेन को भेंट के तौर पर क्रीमिया को दिया था।

क्रीमिया संकट के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और यूरोपीय यूनियन (ईयू) के देशों ने रूस पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। लेकिन रूस पर उसका कुछ ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा। ऐसे में अब पुन: रूस ने क्रीमियाई प्रायद्वीप में आक्रामकता प्रदर्शित की है। रूस इस वक्त खुद को वैश्विक शक्ति के तौर पर स्थापित कर रहा है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन का कहना है कि वे रूस को फिर से सोवियत संघ की तरह शक्तिशाली भूमिका में देखना चाहते हैं। रूस ने क्रीमिया के बाद सीरिया संकट में अपनी ताकत दिखाई। इसी का नतीजा है कि अमेरिका और तमाम पश्चिमी देशों के एकजुट होने के बावजूद सीरिया में रूसी अभियान जारी है। इससे रूस का मनोबल बढ़ा है। यही कारण है कि वैश्विक चेतावनियों के बावजूद क्रीमियाई क्षेत्र में रूसी आक्रमकता लगातार बढ़ रही है।

रूस, क्रीमिया से पहले केवल जलमार्ग के जरिए ही जुड़ा था। ऐसे में क्रीमिया में अपनी पहुंच बनाने के लिए रूस ने स्ट्रेट पर एक पुल बनाया है। रूस इस पुल के माध्यम से ही कर्च स्ट्रेट पर यूक्रेन के बंदरगाहों से आ रहे जहाजों की निगरानी कर रहा है। यूक्रेन इसी का विरोध कर रहा है। रूस, यूक्रेनी जहाजों की जांच को सुरक्षा कारणों से आवश्यक मानता है, क्योंकि यूक्रेन के कट्टरपंथियों से पुल को खतरा हो सकता है। अजोव सागर क्रीमिया के पूर्व में और यूक्रेन के दक्षिण में है। इसके उत्तरी किनारों पर यूक्रेन के दो बंदरगाह हैं- बडर्यांस्क और मेरीपॉल। ये बंदरगाह यूक्रेन की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। दरअसल, कर्च स्ट्रेट के पुल के नीचे समुद्री परिवहन को नियंत्रित कर रूस यूक्रेन के अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है। इस महीने के शुरू में यूरोपीय यूनियन ने भी रूस को यूक्रेन जहाजों की निगरानी के खिलाफ चेताया था। यूरोपीय यूनियन का कहना है कि रूस का यह कदम स्वतंत्र नौ परिवहन का उल्लंघन है। इन्हीं विवादों के बाद रूस और यूक्रेन के बीच तनाव बढ़ा।

सीरिया संकट के बाद रूस का पलड़ा पश्चिमी देशों पर भारी है। लेकिन इसके बावजूद रूस और पश्चिमी देशों के बीच शक्तियों का एक बेहद अलग संतुलन है। रूस ने अब सीधे-सीधे पश्चिमी देशों को चुनौती दी है। लेकिन पुराने शीत युद्ध और नए शीत युद्ध में विचारधारा संबंधित बड़ा अंतर है। आज जो प्रतिस्पर्धा है, वह किसी विचारधारा के कारण नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन और रणनीतियों के कारण है। इसके अतिरिक्त पुराने शीत युद्ध के दौर में यूरोप में शांति थी, जबकि असली युद्ध अंगोला, क्यूबा से लेकर मध्य पूर्व तक लड़ा जा रहा था। लेकिन आज युद्ध की जमीन जॉर्जिया और यूक्रेन में तैयार है और ये रूस के बेहद करीब हैं।

क्रीमियाई क्षेत्र में रूस ने यूक्रेन से टकरा कर नाटो के समक्ष चुनौती पेश की है। इसके अलावा कालासागर और अजोव सागर में रूसी की ताकत बढ़ी है। क्रीमियाई क्षेत्र में रूसी आक्रामकता ने विश्व पटल पर अमेरिकी सैन्य शक्ति अवधारणा को मनोवैज्ञानिक तौर पर तोड़ा है। यहां ध्यान देना चाहिए कि इस क्षेत्र में अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों ने रूस को नियंत्रित करने के लिए परमाणु मिसाइलें तक तैनाती कर रखी हैं। इस नए शीत युद्ध में रूस को चीन का घोषित समर्थन हासिल है। चीन का भी मनोबल बढ़ा है। रूस-चीन गठबंधन का और भी मजबूत होना स्वाभाविक है। वर्तमान में अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध जारी है। इसमें चीन को नुकसान ज्यादा हो रहा है, साथ ही वह अमेरिका से वार्ता को तैयार है। लेकिन अमेरिका सख्त मुद्रा में है।

यूक्रेन विवाद के बाद बदलते वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अमेरिका वार्ता के लिए झुक सकता है। अगर ऐसा होता है तो यह भारत सहित संपूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक होगा। अगर अमेरिका कठोर रुख कायम रखते हुए नाटो देशों को पुन: एकजुट कर रूस पर दबाव बनाने का प्रयास करता है तो दुनिया को व्यापार युद्ध के बाद नए शीत युद्ध का भी सामना करना पड़ सकता है। जॉर्जिया और यूक्रेन की स्थिति एक नए शीत युद्ध की पटकथा तैयार कर चुकी है।

 

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