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राजनीति: शिक्षा की गुणवत्ता और सवाल

परिवार से जो प्रेरणा हर बच्चे को मिलती है, वह अपने आप में जीवन के सार तत्त्वों का निचोड़ होती है, पीढ़ियों के खट्टे-मीठे अनुभव से पगी होती है। बच्चे कभी यदि एकांत में बैठ कर चिंतन करें तो उन्हें स्वयं आभास होगा कि माता-पिता-परिवार से जो सीख, मार्ग-निर्देशन उन्हें सहज ही मिलता रहता है, उसमें कितना प्यार और उनके जीवन को अच्छे से अच्छा बनाने की तीव्र इच्छा और अपेक्षा निहित होती है।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

उत्कृष्टता की आकांक्षा किसी भी व्यक्ति के अंदर की प्रतिभा को जागृत करती है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने बहुत पहले ही यह पहचान लिया था कि मानव जाति में हर बच्चे को प्रकृति से जो अद्भुत वरदान मिला है, वह विचारों की शक्ति और कल्पना की ताकत है। यह अन्य सभी जीवधारियों से मनुष्य को अलग करता है। इसी से दो नई प्रवृत्तियां भी उभरती हैं- जिज्ञासा और सर्जनात्मकता! ये चारों के चार किस बालक या अध्यापक के पास प्रचुर मात्रा में नहीं होते हैं! इनका खजाना कभी खाली नहीं होता है, जितना चाहें उपयोग करें, भंडार भरा ही रहेगा। इन्हें पंख देने के लिए ही अध्यापक को अपनी ‘साथी, सहयोगी, सहकर्मी और सहायक’ की भूमिका का निर्धारण करना होता है। गुरु शब्द का अर्थ यही है रास्ता दिखाना; जो अंधकार या अनिश्चय के सामने बच्चे को दिखाई दे, उसे प्रकाशित कर आगे बढ़ने की प्रेरणा दे। ऊपर लिखे चार वरदानों- विचार, कल्पना, जिज्ञासा और सर्जनात्मकता- के आपसी संबंध को आत्मसात करने के बाद ही हर अध्यापक और विद्यार्थी अपने-अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह कर सकते हैं, यानी वे जिस दिशा में भी आगे बढ़ने का निश्चय करेंगे, उसमें उत्कृष्टता प्राप्त करने में सफल होंगे। हम सभी ऐसे लोगों के नामों और कामों से परिचित हैं जिन्होंने जीवन में जो लक्ष्य रखे, उन्हें सफलतापूर्वक प्राप्त किया। इनमें से लगभग सभी ने कहीं न कहीं अपने माता-पिता, परिवार और अध्यापकों से प्रेरणा प्राप्त की।

सबसे पहले गांधीजी के जीवन से कुछ प्रकरण याद करें। जब वे विदेश गए तो मां को जो वचन देकर गए थे कि मांस नहीं खाएंगे, उसका सदा सम्मान करते रहे। प्रश्न सही या गलत का नहीं है, प्रश्न उस श्रद्धा का है जो व्यक्ति को अनुशासन प्रदान करती है, उसे अपने आप को समझने में सहायता देती है, अन्य के प्रति आदर और सम्मान के भाव को आकार देती है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है। गांधीजी ने एक पत्र में यूनेस्को को लिखा था कि उनकी ‘अनपढ़ किंतु समझदार मां’ ने उन्हें सिखाया था कि ‘यदि हर व्यक्ति अपना कर्तव्य करे तो किसी के अधिकारों का हनन नहीं होगा।’ इस एक वाक्य में वह निहित है जिस पर अनगिनत किताबें लिखी गई हैं, आंदोलन हुए हैं, होते रहते हैं, मगर मानव अधिकारों के हनन की समस्या बनी ही नहीं, बिगड़ती भी जा रही है। लाखों लोग असुरक्षा, भुखमरी, हिंसा और आतंक के कारण देश से विदेश विस्थापित हो रहे हैं, अपने देश में ही घृणा, द्वेष, अहंकार के कारण शरणार्थी कहलाने लगे हैं, उन्हें यह अपमान सहते पीढ़ियां गुजर गर्इं, लेकिन समस्या वहीं की वहीं है।

परिवार से जो प्रेरणा हर बच्चे को मिलती है, वह अपने आप में जीवन के सार तत्त्वों का निचोड़ होती है, पीढ़ियों के खट्टे-मीठे अनुभव से पगी होती है। बच्चे कभी यदि एकांत में बैठ कर चिंतन करें तो उन्हें स्वयं आभास होगा कि उनके माता-पिता-परिवार से जो सीख, मार्ग-निर्देशन उन्हें सहज ही मिलता रहता है, उसमें कितना प्यार और उनके जीवन को अच्छे से अच्छा बनाने की तीव्र इच्छा और अपेक्षा निहित होती है। गांधीजी की मां ने उन्हें यह भी बताया था कि यदि तुम किसी एक का जीवन संवार सकते हो, या बचा सकते हो, तो तुम्हारा जीवन सफल माना जाएगा। ऐसा कर सकने की स्थिति तो तभी आएगी जब व्यक्ति अपने को गुणवत्ता और उत्कृष्टता के मार्ग का पथिक बना ले, हर पक्ष में अच्छे से अच्छा कर सकने का लक्ष्य रखे। गांधीजी पर मां के इस वाक्य का जीवन-व्यापी प्रभाव पड़ा। उन्होंने समझा कि ऐसा तो लोग तभी कर पाएंगे जब वे दूसरे के सुख-दुख को अपना मानें, उनकी सहायता के लिए तत्पर रहें। ‘सर्वभूत हिते रत:’ का अर्थ आत्मसात करें! ‘परहित सरिस धरम नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई’ का केवल शब्दार्थ नहीं, व्यावहारिक क्रियान्वयन भी जानें और उसके उपयोग से मानवीय मूल्यों के निर्वहन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।

दक्षिण अफ्रीका के पीटर मारित्ज्बर्ग रेलवे स्टेशन पर गांधीजी को प्रथम श्रेणी के डिब्बे से धक्के देकर प्लेटफार्म पर फेंक दिया गया था, जबकि उनके पास टिकट उसी दर्जे का था। ठंडी रात में वे प्लेटफार्म पर ही बैठे रहे। मेरा अपना विचार है कि उस दिन बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी ‘व्यक्ति से व्यक्तित्व’ में परिवर्तित हो गए। एक व्यक्ति के अपमान को उन्होंने बड़े वैश्विक पटल पर देखा। वे अपने को भूल गए, अपमान को नहीं भूले और उनके विचारों का रंगमंच विस्तृत हो गया! काले-गोरे के कृत्रिम और थोपे गए और अत्याचार कितनी पीढ़ियों को अकारण ही सहन करने पड़ रहे थे। उस दिन वहां पर अपमानित युवा मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने व्यक्तित्व में ऐसा निखार लाकर अन्याय के तिमिर को हटाने के लिए एक ऐसा दीप जलाया जिसके प्रकाश में रंगभेद सारे विश्व में अमान्य हो गया। वैचारिक उत्कृष्टता और लगनशीलता का यह एक सटीक उदाहरण है।

नोबेल पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति सम्माननीय होते हैं। वे जो जीवनभर अपने-अपने क्षेत्र में नए सर्जन में ही नहीं, नए लक्ष्यों की प्राप्ति में भी उत्कृष्टता के स्तर पर अनवरत लगे रहते हैं। इनमें से एक बहुत बड़ा नाम रिचर्ड फाइनमैन का है जिन्हें सन 1965 में भौतिकी के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। अपने वैज्ञानिक योगदान के अतिरिक्त प्रतिभा, कर्मठता, भविष्य दृष्टि और लोगों के साथ व्यवहार में सहजता के कारण वे केवल वैज्ञानिकों के नहीं, अन्य लोगों के भी प्रिय और आदर्श बने। जब सोवियत संघ ने अंतरिक्ष में पहुंचने में स्पुतनिक भेजकर अमेरिका को पीछे छोड़ दिया तब वहां इस पर गहन विचार-विमर्श हुआ कि कमी कहां रह गई? सभी एकमत थे कि गुणवत्ता की कमी किसी भी क्षेत्र में क्यों न हो, उसका मूल कारण किसी न किसी ढंग से शिक्षा की गुणवत्ता से अवश्य जुड़ा होगा। इसलिए शिक्षा सुधार पर विशेष ध्यान देना होगा।

हर एक पक्ष देखा गया और एक रिपोर्ट में यह निष्कर्ष स्थापित किया गया कि शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों में आई कमियां तुरंत सुधारी जानी चाहिए। मूल कारण वहीं से प्रस्फुटित होता है। विज्ञान शिक्षण की ओर विशेष ध्यान दिया गया और रिचर्ड फाइनमैन ने अपना उच्च स्तर का शोध तथा प्रयोगशाला छोड़ कर स्नातक-पूर्व कक्षाओं में पढ़ाया। उन्होंने ब्राजील में जाकर स्कूलों में भौतिक विज्ञान पढ़ाया, कैलिफोर्निया में पाठ्यक्रम के मूल्यांकन में भागीदारी की। उनका उद्देश्य था विद्यार्थी और अध्यापक विज्ञान की पाठ्य-पुस्तक और लिखित परीक्षा में पास होने के लक्ष्य में सीमित होकर न रह जाएं। वे पुस्तकों के अंदर दिए गए वर्णन, अर्थ, तथा जानकारी में न सिमट जाएं। वे उन सूत्रों, समीकरणों, सिद्धांतों में निहित गूढ़ार्थ को भी समझें। विज्ञान पढ़ कर परीक्षा पास कर लेना एक तथ्य हो सकता है, मगर उसका अर्थ यह नहीं है कि वह व्यक्ति विज्ञान के मूलार्थ को समझ चुका है। इस अंतर को सबसे पहले अध्यापकों को जानना होगा।

फाइनमैन की पुस्तकों, उनके भाषणों और लेखन का अध्ययन विश्वभर में किया गया। आगे चल कर उनके नाम से जानी जानेवाली ‘फाइनमैन टेक्नीक’ सारे विश्व में न केवल विज्ञान बल्कि हर विषय में उत्कृष्टता प्राप्त करने में, अपनी सहजता और सरलता के कारण, अद्भुत रूप से सहायक मानी जाती है।
इस समय शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने पर चर्चा आवश्यक है। स्थितियां कितनी ही चिंताजनक क्यों न हों, देश को अपनी शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन कर गुणवत्ता और कौशल विकास पर विशेष ध्यान देना ही होगा। यह सभी जानते हैं कि सरकारी स्कूलों में विज्ञान शिक्षा की स्थिति दयनीय है। ऐसे में फिनलैंड जाकर कोई फायदा नहीं होगा। फाइनमैन जैसे अनुकरणीय उदाहरणों को समझ कर विद्वत वर्ग व्यावहारिक परिवर्तन सुझा सकता है।

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