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संपादकीय: संचार की सीमा

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि केंद्र सहित गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और फेसबुक सहित इंटरनेट कंपनियां इस बात से सहमत हैं कि बलात्कार और बच्चों के यौन शोषण के वीडियो के साथ-साथ आपत्तिजनक चीजें सार्वजनिक पहुंच से दूर करने की जरूरत है। इससे पहले आपत्तिजनक सामग्रियों की पहुंच पर सवाल तो उठ रहे थे, लेकिन सरकार और इसका माध्यम बनने वाली कंपनियों के बीच कोई सहमति नहीं बन पा रही थी।

Author December 8, 2018 5:33 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

पिछले कुछ सालों के दौरान ऐसे अनेक मौके आए जब बलात्कार, बच्चों के यौन शोषण या फिर किसी घटना का आपत्तिजनक वीडियो बहुत सारे लोगों तक पहुंच गया और उसके बेहद दुखद या फिर त्रासद नतीजे सामने आए। इसलिए कई हलकों से ऐसी मांगें सामने आ रही थीं कि संचार के साधनों के बेलगाम इस्तेमाल या दुरुपयोग की प्रवृत्तियों पर रोक लगाने के लिए जरूरी नियम-कायदे बनाए जाएं। लेकिन इंटरनेट की दुनिया का विस्तार और इसकी पहुंच का सवाल इतना जटिल है कि इस संबंध में रातोंरात कोई कदम नहीं उठाए जा सकते। इसके बावजूद दिनोंदिन पांव फैलाती इस समस्या पर गौर करना और इससे निपटने के उपाय निकालने की जरूरत महसूस की जा रही है। इसी के मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि केंद्र सहित गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और फेसबुक सहित इंटरनेट कंपनियां इस बात से सहमत हैं कि बलात्कार और बच्चों के यौन शोषण के वीडियो के साथ-साथ आपत्तिजनक चीजें सार्वजनिक पहुंच से दूर करने की जरूरत है। इससे पहले आपत्तिजनक सामग्रियों की पहुंच पर सवाल तो उठ रहे थे, लेकिन सरकार और इसका माध्यम बनने वाली कंपनियों के बीच कोई सहमति नहीं बन पा रही थी।

इसमें संदेह नहीं कि संचार और तकनीक के क्षेत्र में हुए क्रांतिकारी विस्तार के साथ देश में ज्यादातर लोगों की पहुंच इस तक बनी है। इसके सकारात्मक उपयोग के फायदे असीम हैं और यह कई क्षेत्रों में दर्ज भी किया जा रहा है। लेकिन इसके समांतर हर हाथ में पहुंचे स्मार्टफोन के उपयोग के तौर-तरीकों पर भी कुछ सवाल उठने शुरू हुए हैं। ज्यादातर लोगों को अपने स्मार्टफोन में वीडियो बनाने और देखने की सुविधा रोमांचित करती है, लेकिन इसके अपने ही मन-मस्तिष्क पर और इसके बाद फिर सामाजिक असर के बारे में सोचना उन्हें जरूरी नहीं लगता। हालत यह है कि कुछ लोगों को बलात्कार या बच्चों के यौन शोषण जैसी घटना का वीडियो भी दूसरों के पास भेजने से पहले सोचना जरूरी नहीं लगा कि इसके नतीजे क्या हो सकते है। संदेश या वीडियो के अपने मोबाइल पर देखने के बाद उसके सही या गलत होने की पुष्टि करना ज्यादातर लोग जरूरी नहीं समझते। कई ऐसे वीडियो भी होते हैं, जो बेहद आपत्तिजनक और यहां तक कि त्रासद भी होते हैं, लेकिन बहुत सारे लोग उसे मनोरंजन की तरह देखते और दूसरों को भेज देते हैं। कई बार लोगों को भड़काने और दंगे फैलाने में भी इसका इस्तेमाल देखा गया। अफवाहों वाले संदेशों के वायरल होने के बाद कई ऐसी घटनाएं सामने आर्इं, जिसमें भीड़ में तब्दील हुए लोगों ने किसी निर्दोष को पीट-पीट कर मार डाला।

जाहिर है, यह आधुनिक तकनीकी के बरक्स सामाजिक प्रशिक्षण में एक बड़ी कमी को दर्शाता है, जहां व्यक्ति ऐसे वीडियो को दूसरों से साझा करते और उसके असर में आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए न्यूनतम संवेदनशीलता बरतना भी जरूरी समझता। इस तरह के मामले लगातार सामने आ रहे हैं और इससे देश में एक नए तरह की जटिलता खड़ी हो रही है। अब अगर सरकार सहित अलग-अलग पक्षों के बीच सहमति बन रही है तो इस आधार पर एक मसौदा भी तैयार किया जा सकता है। इस समस्या से बढ़ती मुश्किलों पर गौर करना जरूरी इसलिए भी है कि अगर यह प्रवृत्ति बढ़ती रही तो आने वाले वक्त में लोगों के सोचने-समझने के तरीके से लेकर व्यवहार तक पर इसका बेहद घातक असर पड़ेगा। संचार और आधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल अगर सकारात्मक हो तो वह एक ज्ञान आधारित समाज की बुनियाद तैयार कर सकता है। लेकिन इसके दुरुपयोग से उपजी नकारात्मकता सामाजिक विध्वंस की स्थिति पैदा कर सकती है।

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