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संपादकीय: जानलेवा प्रदूषण

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन आॅफ इंडिया ने मिल कर देश में एक अध्ययन कराया था। इसमें पता चला कि राजधानी दिल्ली में रोजाना चौंतीस लोग ऐसी बीमारियों से मर रहे हैं जो हवा के जहरीली होने से हो रही हैं। इन बीमारियों में सांस नली और फेफड़े के संक्रमण और कैंसर, दिल का दौरा और मधुमेह जैसी बीमारियां हैं।

Author December 8, 2018 5:30 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

देश में अगर हर महीने एक लाख से ज्यादा मौतें सिर्फ वायु प्रदूषण के कारण हो रही हों, तो यह वाकई चौंकाने वाली बात है। इसे सुन कर किसी को भी फिक्र हो सकती है, भले सरकारों के कान पर जूं न रेंगे। दरअसल, वायु प्रदूषण भारत में किस कदर लोगों का जीवन निगल रहा है, हाल में एक अध्ययन से इसका खुलासा हुआ है। इससे पैदा रोगों से होने वाली मौतों को लेकर भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन आॅफ इंडिया ने मिल कर देश में एक अध्ययन कराया था। इसमें पता चला कि राजधानी दिल्ली में रोजाना चौंतीस लोग ऐसी बीमारियों से मर रहे हैं जो हवा के जहरीली होने से हो रही हैं। इन बीमारियों में सांस नली और फेफड़े के संक्रमण और कैंसर, दिल का दौरा और मधुमेह जैसी बीमारियां हैं। पिछले साल देश भर में वायु प्रदूषण की वजह से बारह लाख लोग मारे गए। इनमें करीब सात लाख लोग दूषित हवा और पांच लाख से ज्यादा लोग घर में होने वाले प्रदूषण की वजह से मारे गए थे। ये आंकड़े यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि प्रदूषण से निपटने के मोर्चे पर हमारा तंत्र विफल रहा है। हालात देख कर तो यही लग रहा है कि इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों ने अपने को एक तरह से लाचार घोषित कर डाला है। वरना इसकी वजह से होने वाली मौतों का आंकड़ा लाखों में नहीं होता।

वायु प्रदूषण को लेकर पिछले कुछ सालों में जिस तरह से सर्वोच्च अदालत तक चिंता जाहिर कर चुकी है, वह हालात की गंभीरता को बयान करता है। दिल्ली में हर साल ऐसी स्थिति पैदा होना सामान्य बात हो गई है जब पूरा महानगर और इससे सटे शहर धुएं की चादर में लिपट जाते हैं। वायु प्रदूषण से निपटने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कड़ा रुख अख्तियार किया और सरकारों व संबंधित महकमों को सख्त दिशा-निर्देश जारी किए। लेकिन स्थिति जिस तेजी से भयावह होती जा रही है, उसे देखते हुए लग रहा है कि प्रदूषण रोकने की सारी कवायदें बेअसर साबित हो रही हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है कि इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए सरकार के पास कोई ठोस और दूरगामी योजना नहीं है। दिल्ली में सालों से कचरे के पहाड़ खड़े हैं और इनमें जब-तब आग लगती रहती है। इनसे उठने वाला धुआं कई किलोमीटर की परिधि को अपने दायरे में ले लेता है। वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण डीजल से चलने पांच लाख से ज्यादा ऐसे वाहन हैं जिनकी अवधि खत्म हो चुकी है। लेकिन इन गाड़ियों के सड़कों पर आने से रोक पाने में सरकार लाचार साबित हुई है। दिल्ली के रिहायशी इलाकों में चलने वाली लघु उद्योग इकाइयों पर कोई लगाम नहीं लग पाई है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड जैसे उत्तरी राज्यों में भी जहरीली हवा से मरने वालों का आंकड़ा हैरान करने वाला है। पिछले साल उत्तर प्रदेश में ढाई लाख से ज्यादा मौतें वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों के कारण ही हुर्इं। आइसीएमआर के इस अध्ययन से पता चला है कि मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, केरल, कर्नाटक, ओड़िशा उन राज्यों में हैं जहां घरेलू वायु प्रदूषण लोगों के लिए ज्यादा घातक सिद्ध हो रहा है। सबसे बड़ी समस्या घरों में इस्तेमाल होने वाला र्इंधन और स्वच्छता है। इन राज्यों में आज भी लोग कोयले, लकड़ी, किरासन जैसे ईंधन का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। ये आंकड़े हमें आगाह कर रहे हैं कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए तो प्रदूषण से होने वाली मौतों का ग्राफ तेजी से बढ़ेगा।

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