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संपादकीय: संवेदनहीन सरकार

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को कड़ी फटकार लगाई और राज्य के मुख्य सचिव से साफ तौर पर कहा कि मामले में इतनी देरी से एफआइआर दर्ज करने का क्या मतलब है; आश्रय गृह में बच्चों के साथ यौन हिंसा की घटना हुई, लेकिन पुलिस ने जिस तरह बेहद कमजोर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया, वह अमानवीय और बेहद शर्मनाक है।

Author November 29, 2018 5:41 AM
जेडीयू अध्यक्ष और बिहार के सीएम नीतीश कुमार। (फाइल फोटो)

बिहार के मुजफ्फरपुर में एक बालिका गृह की त्रासद हकीकत को सामने आए चार महीने हो चुके हैं, लेकिन अब तक मुख्य आरोपियों और उस मामले में शामिल अन्य लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने को लेकर बिहार सरकार ने जिस स्तर की लापरवाही बरती, वह हैरान करने वाली है। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि मुजफ्फरपुर के बालिका-गृह में करीब तीन दर्जन बच्चियों के खिलाफ हुई यौन हिंसा की घटना ने जहां देश भर के संवेदनशील लोगों के भीतर एक आक्रोश पैदा किया था, वहीं बिहार सरकार उस मामले में तुरंत सख्त कार्रवाई करने के बजाय अपनी ऊर्जा आरोपियों को बचाने की कोशिश में ही खर्च करती रही। यह बेवजह नहीं है कि इस मसले की सुनवाई के दौरान मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को कड़ी फटकार लगाई और राज्य के मुख्य सचिव से साफ तौर पर कहा कि मामले में इतनी देरी से एफआइआर दर्ज करने का क्या मतलब है; आश्रय गृह में बच्चों के साथ यौन हिंसा की घटना हुई, लेकिन पुलिस ने जिस तरह बेहद कमजोर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया, वह अमानवीय और बेहद शर्मनाक है। एफआइआर में यौन शोषण और वित्तीय गड़बड़ी का जिक्र तक नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के अन्य चौदह आश्रय गृहों में नाबालिगों के यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट पर भी उचित कार्रवाई नहीं करने पर बिहार सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए साफ कहा कि उसकी मानसिकता दुर्भाग्यपूर्ण है। अदालत ने राज्य के आश्रय गृहों से जुड़े सभी सत्रह मामलों की जांच सीबीआइ से कराने के आदेश दिए हैं।

गौरतलब है कि मुजफ्फरपुर में बाल संरक्षण के नाम पर चलने वाले बालिका गृह में बच्चियों को प्रताड़ना और यौन-हिंसा के विकृत रूप से गुजरना पड़ा और उसके आरोपियों में ब्रजेश सिंह नाम के एक स्थानीय कद्दावर व्यक्ति से लेकर बिहार सरकार में मंत्री मंजू वर्मा तक शामिल हैं। अव्वल तो ऐसे आश्रय गृहों की नियमित जांच और कुछ गड़बड़ी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई करना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए थी, वहां की त्रासदी एक स्वतंत्र संस्थान टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंसेज की जांच के बाद उजागर हुई। दूसरे, संस्थान की जांच-रिपोर्ट के बाद भी उस मसले पर तुरंत कार्रवाई करने और दोषियों को सजा दिलाने के मामले में भी बिहार सरकार ने जिस तरह टालमटोल की, वह संवेदनहीनता का एक चरम उदाहरण है। आखिर वे कौन-सी वजहें हैं कि अपराधों से सख्ती से निपटने का दावा करती रहने वाली बिहार सरकार ने इस मामले का खुलासा होने के बावजूद आरोपियों के प्रति नरम रवैया अख्तियार किया। हालत यह थी कि खुद आत्मसमर्पण करने से पहले तक मुख्य आरोपी और बिहार सरकार में मंत्री मंजू वर्मा कहां गायब रहीं, किसी को पता नहीं था।

मुजफ्प्फरपुर बालिका गृह के मामले की ताजा सुनवाई के दौरान अदालत ने यह तल्ख सवाल किया कि क्या सरकार की नजर में वे देश के बच्चे नहीं हैं? अदालत का यह सवाल इसलिए अहम है कि मुजफ्फरपुर के उस बालिका गृह में किसी तरह पहुंच पाने वाली बच्चियां बेहद कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आती हैं और किन्हीं हालात में घर से लेकर समाज तक में कहीं भी ठौर और सुरक्षा नहीं मिल पाने की वजह से लाचारी में वहां आई थीं। लेकिन थोड़ी सुरक्षा और जीवन मिल पाने की जिस उम्मीद में उन्होंने उस बालिका गृह में शरण ली, उसी के संचालकों ने उन्हें शोषण और यातना के अंधेरे में धकेल दिया। वहां कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार और उत्पीड़न के जैसे उदाहरण सामने आए, वे किसी भी संवेदनशील इंसान का दिल दहला देने वाले थे।

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