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जब पूरा देश दिवाली मना रहा होगा, तब जम्मू के 100 से ज्यादा गांवों में नहीं जलाए जाएंगे दीये

पाकिस्तान की तरफ से सीमापार से लगातार फायरिंग की जा रही है।
Author October 29, 2016 20:40 pm
दिवाली की एक दिन पहले की शाम को गांधीनगर में अक्षरधाम मंदिर में दीये जलाती एक युवती। (Photo Source: REUTERS)

जब पूरा देश दिवाली मना रहा होगा, तब जम्मू क्षेत्र के 100 से ज्यादा गांवों में रोशनी के इस त्योहार के दिन दिये नहीं जलाए जाएंगे। इन गांवों में दीये इसलिए नहीं जलाए जाएंगे, क्योंकि उन्हें डर है कि इस रोशनी से उनके घर सीमापार से पाकिस्तानी मोर्टार के निशाने बन सकते हैं। वहीं आरएस पुरा और अरनिया सेक्टर में एक दर्जन से गांव तो उजाड़ बने हुए हैं, क्योंकि पाकिस्तान की तरफ से लगातार मोर्टार दागे जाने की वजह से वहां रहने वाले लोग अपने मवेशियों के साथ सुरक्षित स्थानों पर पहुंच गए हैं। इसके साथ ही कठुआ जिले में पहाड़पुर से लेकर अखनूर के नजदीक परगवाल तक जो लोग सुरक्षित स्थानों पर नहीं गए हैं, वे बिना लाइट और पटाखों के अपनी दिवाली मनाएंगे। अब्दुलियां के चमैल सिंह ने बताया हमारे लिए क्या दिवाली मानाना। हमारे लिए मवेशियों के चारा और परिवार के लिए दो वक्त का खाना का इंतजाम करना जरूरी है। चमैल सिंह अपने परिवार और एक दर्जन से ज्यादा मवेशियों के साथ बासपुर बांगला में किसी के खेतों में कैंप डाले हुए हैं। उनका कहना है कि हम लोग हमारे पीछे गांवों अपने खेत और घर छोड़ आए हैं, अब केवल हमारे पास मवेशी ही हैं।

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चांदू चाक गांव के रहने वाले सुरजीत सिंह ने का कहना है कि जब भी फसल कटाई का वक्त आता है, तब पाकिस्तानी रेंजर्स मोर्टार दागने शुरू कर देते हैं। पिछली बार की तरह हम लोग इस बार भी त्योहार नहीं मनाएंगे। उन्होंने कहा, ‘जब सबको पता है कि रात में लाइट जलाना मतलब अपने घर को दुश्मन का टारगेट बनाना है तो ऐसे में कौन रात में दिये जलाएगा।’ जम्मू में जिला प्रशासन ने सरकारी इमारतों में दो दर्जन से ज्यादा कैंप बनाए हैं। इन कैंपों सीमा पार से होने वाली पाकिस्तानी फायरिंग से प्रभावित लोग शरण लिए हुए हैं। जम्मू के डीसी सिमरनदीप सिंह का कहना है कि केवल 10 कैंपों में चार सौ से पांच सौ लोग रह रहे हैं, जबकि अन्य 15 कैंपों में कोई नहीं रह रहा है।

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सूत्रों का कहना है कि कैंपों सोने के लिए उचित व्यवस्था तक नहीं होने की वजह से ज्यादात्तर लोग अपने रिश्तेदारों के घर चले गए हैं। वहीं कुछ लोग बॉर्डर से कुछ दूरी पर अपने मवेशियों के साथ खुले में ही रह रहे हैं। प्रशासन की ओर से बनाए गए कैंपों में पशुओं को रखने और उनके चारे के लिए कोई इंतजाम नहीं किया गया है। बासपुर बांगला के रहने वाले देवराज का कहना है, ‘दिवाली सब लोगों के लिए खुशियां लाती है, लेकिन हम लोग बॉर्डर पर रहते हैं, हमारी तो पहले ही रात की नींद उड़ी हुई है। पहले पाकिस्तान की ओर से दागे जाने वाले मोर्टार से हमारा गांव सुरक्षित था, लेकिन इस बार कुछ मोर्टार हमारे गांव की तरफ भी दागे गए हैं।’

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