लद्दाख HC के CJ बोले, संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्यूलर’ शब्द जोड़ने से देश की आध्यात्मिक छवि को हुआ नुकसान; BJP सांसद ने दी प्रतिक्रिया

लद्दाख उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पंकज मिथल ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में सेक्यूलर शब्द जोड़ने से इसकी आध्यात्मिक छवि को नुकसान पहुंचा है।

Chief Justice Pankaj Mithal, Constitution of India
संविधान की प्रस्तावना में सेक्यूलर शब्द जोड़ने से देश की आध्यात्मिक छवि को हुआ नुकसान- जस्टिस पंकज मिथल (प्रतीकात्मक फोटो-एक्सप्रेस)

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने एक कार्यक्रम में संबोधन के दौरान कहा कि सेक्यूलर शब्द जोड़ने से देश की आध्यात्मिक छवि को नुकसान पहुंचा है। उनके इस बयान पर भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी सहमति में प्रतिक्रिया दी है।

लद्दाख उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पंकज मिथल ने भारत को अनादि काल से एक आध्यात्मिक देश बताते हुए कहा कि प्रस्तावना में पहले से ही उल्लेखित “संप्रभु, लोकतांत्रिक, गणतंत्र” के लिए 1976 में “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” को जोड़ा गया। इसके बाद से इसकी अपनी आध्यात्मिक छवि को नुकसान पहुंचा है। इसने इसकी विशालता को सीमित कर दिया।

उनके इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अपनी उस याचिका का जिक्र किया जो सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए पेंडिंग है। इस याचिका के जरिए उन्होंने मांग की है कि संविधान से धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को हटाया जाना चाहिए। स्वामी ने आगे कहा कि संसद के पास प्रस्तावना में संशोधन करने की कोई शक्ति नहीं है।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के अधिवक्ता परिषद की तरफ से जम्मू में आयोजित एक कार्यक्रम ‘धर्म और भारत का संविधान: परस्पर क्रिया’ में बोलते हुए जस्टिस मिथल ने ये बातें कही। उन्होंने अपने संबोधन में कहा- “भारत अपने सभी नागरिकों की देखभाल करने में सक्षम है और इसमें समाजवादी प्रकृति निहित है।

उन्होंने कहा कि पांडवों से लेकर मौर्य, गुप्त, मुगलों और अंग्रेजों ने इस पर शासन किया, लेकिन भारत को कभी भी मुस्लिम, ईसाई या हिंदू राष्ट्र के रूप में धर्म के आधार पर परिभाषित नहीं किया गया, क्योंकि इसे एक आध्यात्मिक देश के रूप में स्वीकार किया गया था। “धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़कर, हमने आध्यात्मिक उपस्थिति की अपनी विशालता को संकुचित कर दिया है …।”

उन्होंने आगे कहा कि इसे एक संकीर्ण सोच कहा जा सकता है। सीजे ने कहा कि भारत अनादि काल से एक आध्यात्मिक देश रहा है और इसका नाम “भारत का आध्यात्मिक गणराज्य” होना चाहिए था। संविधान में हुए संशोधनों का जिक्र करते हुए चीफ जस्टिस पंकज मिथल ने कहा कि संशोधनों का होना अच्छा है क्योंकि ये मददगार साबित होते हैं, लेकिन जो राष्ट्रीय हित में नहीं हैं, वे किसी काम के नहीं हैं।

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