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हुर्रियत नेता मीरवाइज उमर फारूक व चार अन्य कश्मीरी नेताओं ने रिहाई के लिए बॉन्ड पर किए हस्ताक्षर

इन नेताओं ने कहा है कि यदि इन्हें रिहा किया जाता है तो वे लोग किसी भी राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे। एक अधिकारी ने बताया कि यदि किसी व्यक्ति को सीआरपीसी की अनुच्छेद 107 के तहत हिरासत में लिया जाता है तो उसे एक बॉन्ड साइन करना पड़ता है।

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जम्मू कश्मीर में हुर्रियत नेता मीरवाइज उमर फारूक और चार अन्य कश्मीरी नेताओं को प्रशासन की तरफ से रिहा कर दिया है। खबर है कि इन नेताओं की रिहाई एक बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के बाद ही सुनिश्चित हुई है। द हिंदू की खबर के अनुसार हुर्रियत कॉन्फ्रेस के नेता मीरवाइज उमर फारूक, नेशनल कॉन्फ्रेंस के दो नेता और पीडीपी के एक नेता ने एक बॉन्ड पर हस्ताक्षर किये।

इन नेताओं ने कहा है कि यदि इन्हें रिहा किया जाता है तो वे लोग किसी भी राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान खत्म किए जाने के बाद के राज्य के प्रमुख नेताओं व विभिन्न संगठनों के लोगों को ऐहतियातन हिरासत में ले लिया गया था।

एक अधिकारी ने बताया कि यदि किसी व्यक्ति को सीआरपीसी की अनुच्छेद 107 के तहत हिरासत में लिया जाता है तो उसे एक बॉन्ड साइन करना पड़ता है। इसके बाद वह उस बॉन्ड का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाती है। इसमें व्यक्ति की गिरफ्तारी भी शामिल है। इसके अंतर्गत निषेधात्मक गतिविधियों में राजनीतिक भाषण देना भी शामिल है।

वहीं पीपुल्स कॉन्फ्रेंस चेयरमैन सज्जाद लोन और पीडीपी युवा इकाई के नेता वाहिद पारा बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने पर सहमत नहीं हुए। सरकार की तरफ से राज्य का सेंटूर होटल एक सहायक जेल के रूप में बदल गई है। यहां कम से कम 36 नेताओं को हिरासत में रखा गया है। इसमें पूर्व नौकरशाह से राजनीतिज्ञ बने फैसल शाह भी शामिल हैं।

प्रशासन की तरफ से करीब 3000 लोगों को हिरासत में लिया गया है उनमें जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, फारूक अब्दुल्ला व उमर अब्दुल्ला भी शामिल हैं। हालांकि, इनमें से दो तिहाई लोगों को रिहा कर दिया गया है लेकिन अभी भी करीब 1000 लोग हिरासत में हैं। केंद्र सरकार ने 5 अगस्त को राज्य का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के साथ ही इसके दो भागों में बंटवारे की घोषणा की थी।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में जम्मू और कश्मीर के साथ ही लद्दाख को भी केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने की घोषणा की थी। इसके बाद से प्रशासन की तरफ से राज्य में लोगों की आवाजाही पर रोक के साथ ही संचार से साधनों को पूरी तरह से बंद कर दिया गया था।

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