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हमारी याद आएगी: जयकिशन- खामोश सुर और सूने टेबल पर जलती मोमबत्ती

जयकिशन के जाने से किसी का क्या बिगड़ा? राज कपूर पहले की तरह हिट संगीत के साथ फिल्में बनाते रहे। कभी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ, तो कभी रवींद्र जैन के साथ। मगर दो तीन लोग थे, जिन्हें जयकिशन से जाने से फर्क पड़ा था।

मशहूर संगीतकार जयकिशन।

कहते हैं ये दुनिया फानी है। किसी के जाने से लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। 12 सितंबर, 1971 को मशहूर संगीतकार शंकर-जयकिशन की जोड़ी के जयकिशन गुजरने के बाद मुंबई फिल्म इंडस्ट्री वैसी ही चल रही थी, जैसी चलती थी। 1949 में ‘बरसात’ के सुपरहिट होने के बाद 20 सालों तक शंकर-जयकिशन का हिंदी सिनेमा संगीत में दबदबा था। जयकिशन के गुजरने के बाद शंकर ने 16 साल उनके बिना फिल्मों में अकेले संगीत दिया मगर नाम गया शंकर-जयकिशन का। यह दोनों के बीच अलिखित करार था। 4 नवंबर को जयकिशन की 91वीं जयंती है।

जयकिशन हीरो जैसे दिखते थे। हैदराबादी शंकर तबलावादक थे, गुजराती जयकिशन पेटी बजाते थे। दोनों पृथ्वी थियेटर में काम करते हुए राज कपूर के संपर्क में आए। जब ‘बरसात’ के संगीतकार राम गांगुली के साथ राज कपूर के मतभेद हुए तो उन्होंने शंकर-जयकिशन को ‘बरसात’ की जिम्मेदारी सौंप दी, जिन्होंने इतिहास रच दिया था। पृथ्वी में काम करते जयकिशन को पृथ्वीराज कपूर ने बेटे जैसा स्नेह दिया था। जब जयकिशन की शवयात्रा मरीन लाइंस से जा रही थी, तो वहां के एक अस्पताल में पृथ्वीराज कपूर कैंसर का इलाज करवा रहे थे। उनसे जयकिशन के निधन की खबर छुपाई गई थी। डर था ऐसा न करने से पृथ्वीराज कपूर की तबीयत और बिगड़ सकती है।

जयकिशन के जाने से किसी का क्या बिगड़ा? राज कपूर पहले की तरह हिट संगीत के साथ फिल्में बनाते रहे। कभी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ, तो कभी रवींद्र जैन के साथ। मगर दो तीन लोग थे, जिन्हें जयकिशन से जाने से फर्क पड़ा था। एक थे शम्मी कपूर, जो शंकर-जयकिशन की ‘जंगली’ से स्टार बने थे। जयकिशन की बनाई धुन पर पहला अधिकार शम्मी कपूर का होता था। धुन पसंद आती थी तो शम्मी कपूर उसे अपनी किसी फिल्म के लिए बुक कर लेते थे।

शंकर के जाने के बाद शम्मी कपूर ने एफसी मेहरा की फिल्म ‘मनोरंजन’ (1994) का निर्देशन किया। यह वेश्या व्यवसाय पर बनी देश की पहली ऐसी फिल्म थी, जिसमें नैतिकता को उठा कर हाशिए पर रख दिया था। ‘मनोरंजन’ के बाद 40 उलांघ चुके शम्मी कपूर ने बतौर हीरो काम करना बंद कर दिया और चरित्र भूमिकाएं करने लगे। जयकिशन के जाने से शंकर को तगड़ा झटका लगा था। लता मंगेशकर उनके लिए नहीं गा रही थीं, क्योंकि शंकर पर नई गायिका शारदा को आगे बढ़ाने का जुनून सवार था। जयकिशन के बिना शंकर ने 16 साल निकाले। मगर शंकर पहले जैसा करिश्मा बरकरार नहीं रख सके।

और किसे जयकिशन से जाने से फर्क पड़ा था? एक शख्स और था, जिसका फिल्मी दुनिया से रिश्ता नहीं था, मगर फिल्मी दुनिया के लोगों का उससे रिश्ता था। यह थे चर्चगेट में गेलार्ड रेस्तरां के मालिक। गेलार्ड फिल्मवालों का पसंदीदा रेस्तरां था। यहां टेबल पाने के लिए बड़े बड़े स्टार इंतजार करते थे। फिल्म सितारों की एक झलक पाने के लिए चर्चगेट के कई कॉलेजों के लड़के-लड़कियों की यहां भीड़ लगी रहती थी। गेलार्ड में डांस फ्लोर के पास 23 नंबर का टेबल जयकिशन के नाम से बुक रहता था। वह शाम को रेस्तरां में आते थे।

शम्मी कपूर ने इस टेबल पर जयकिशन की बनाई कई धुनें सुनीं। जयकिशन के निधन के दिन शाम को यह टेबल सूना था। उस पर रिजर्व की पट्टिका रखी थी। साथ ही एक मोमबत्ती भी जलाई गई थी। जिस रेस्तरां में ग्राहकों की इतनी भीड़ होती थी कि लोगों को टेबल पाने के लिए इंतजार करना पड़ता था, उस रेस्तरां का मालिक अगर लगातार महीने भर तक एक टेबुल को रिजर्व की पट्टी और मोमबत्ती जलाकर सूना रखे, तो उसके स्नेह को समझा जा सकता है। यह थी जयकिशन की अपने संपूर्ण करिअर में की गई खरी कमाई।

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