जगतार सिंह हवारा पंजाब की राजनीति में इस वक्त काफी चर्चा में है। एक वक्त था जब इस नाम से सभी राजनीतिक दल परहेज करते थे यानी नाम लेने से भी कतराते थे, लेकिन हवारा के प्रति अब माहौल पहले की तुलना में काफी बदल चुका है। हवारा का जन्म 17 मई, 1970 को फतेहगढ़ साहिब के हवारा गांव में हुआ था।

हवारा को 1995 में तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता बेअंत सिंह की हत्या में दोषी ठहराया गया था। सुरक्षा एजेंसियों को नजर में उसका बेहद खतरनाक कैदी माना जाता है।

जनवरी 2004 में चंडीगढ़ की बुरैल जेल (Burail Jail) से उसके नाट्कीय ढंग से फरार होने के बाद से हालात ऐसे बन गए कि पंजाब की कोई भी सरकार उसे राज्य की किसी जेल में रखने के लिए तैयार नहीं होती थी।

दिल्ली की मंडोली जेल में बंद है जगतार सिंह हवारा

यही वजह है कि जून, 2025 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल ने जगतार सिंह हवारा को फिर से गिरफ्तार किया था और तब से आज तक हवारा दिल्ली की जेल में है। पहले उसे दिल्ली की हाई सिक्योरिटी तिहाड़ जेल में रखा गया था अब वर्तमान में वह मंडोली जेल में बंद है।

लेकिन आज, जब पंजाब में विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं और पंथिक वोटों को निर्णायक माना जा रहा है, तब हवारा को लेकर राजनीतिक माहौल पूरी तरह बदल चुका है।

हवारा को लेकर अब पंजाब की राजनीति में बदल रहा माहौल

पंजाब की राजनीति अब हवारा को लेकर बदलाव देखने को मिल रहा है। राजनीतिक दल जो कभी जगतार सिंह हवारा का नाम लेने से कतराते थे या दूरी बनाए हुए थे। आज वही हवारा करीब सभी प्रमुख दलों के समर्थन के केंद्र बिंदु में है। आम आदमी पार्टी (AAP) से लेकर कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल (SAD) व भाजपा के कई नेता और राजनीतिक गुट हवारा को उसकी बीमार मां से मिलने के लिए मानवीय आधार पर पैरोल देने की मांग कर रहे हैं।

हैरानी की बात यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते और भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने भी हवारा की रिहाई की मांग का समर्थन किया है।

हवारा के प्रति यह बदलाव सिख संगठनों की लगातार सक्रियता से जुड़ा है। खासकर कौमी इंसाफ मोर्चा द्वारा किए जा रहे निरंतर लामबंदी के साथ मेल खाती है, जो तथाकथित राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए अभियान चला रहा है। फरवरी में इसने फतेहगढ़ साहिब के हावारा कलां में हवारा की पैरोल की मांग करते हुए एक सभा आयोजित की थी।

सीएम मान ने मांगी हवारा की पैरोल

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने हवारा को कम से कम 10 दिन पैरोल देने की मांग की है। मान और बिट्टू दोनों ने राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया से मुलाकात कर अपना पक्ष रखा है। मुख्यमंत्री को उम्मीद है कि हवारा तीन दशकों से अधिक समय बाद अपनी मां से मिल सकेगा।

जगतार सिंह हवारा के प्रति बदले माहौल की झलक शायद सबसे ज्यादा उस गीत की लोकप्रियता से मिलती है, जो इस उग्रवादी की प्रशंसा में गाया जाता है। गीत की पंक्तियां हैं- “पिंजरे दे विच बंद नई रहणा ऐसे शेरां ने” (ऐसे शेर हमेशा पिंजरे में बंद नहीं रह सकते)। यह गीत पंजाब के कुछ वर्गों में हवारा के प्रति बढ़ती सहानुभूति और समर्थन का प्रतीक माना जा रहा।

यह गीत हाल ही में दिल्ली में हुए जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन के दौरान लोकप्रिय हुआ और सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। जिसमें हवारा को सिख गौरव के प्रतीक के रूप में माना गया।

हवारा के समर्थकों ने जमीनी स्तर पर भी समर्थन जुटाना शुरू कर दिया है। उनके लंबे समय से सहयोगी रहे जसवंत सिंह का कहना है कि फतेहगढ़ साहिब के दर्जनों गांवों की पंचायतों ने उनकी पैरोल के समर्थन में प्रस्ताव पारित किए हैं। जसवंत के अनुसार, हिंदू मंदिरों के प्रस्तावों को मिलाकर अब इनकी संख्या लगभग 150 हो गई है।

आम आदमी पार्टी पहले कर चुकी है हवारा की पैरोल का विरोध

आम आदमी पार्टी (AAP) का हावारा के प्रति झुकाव मार्च के उस रुख से बिलकुल उलट है। जब सरकार ने उसकी पैरोल का विरोध किया था। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट को लिखे पत्र में सरकार ने कहा था, “दोषी जगतार सिंह हवारा के खिलाफ 25 आपराधिक मामले दर्ज हैं। इसी वजह से फतेहगढ़ साहिब के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और जांच ब्यूरो के निदेशक ने कैदी को पैरोल देने की सिफारिश नहीं की है।”

जुलाई में हाई कोर्ट की कार्यवाही से पता चला कि हवारा के खिलाफ 36 आपराधिक मामले दर्ज थे। सात मामलों में उसे दोषी ठहराया जा चुका था। छह मामलों में उसकी सजा पूरी हो चुकी थी और वह बेअंत सिंह हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहा।

पिछले साल जून में हवारा की पैरोल सुनवाई के दौरान उसके वकील ने अदालत को बताया कि उसने लगभग 29 साल हिरासत में बिताए हैं और उसे कभी पैरोल या सजा में छूट नहीं दी गई। जुलाई में हुई सुनवाई में हाई कोर्ट ने उसकी पैरोल याचिका पर निर्णय लेने के लिए एक समयबद्ध प्रक्रिया का आदेश दिया था।

पंजाब के पूर्व सीएम बेअंत सिंह की हत्या का दोषी है जगतार सिंह हवारा

जगतार सिंह हवारा का उग्रवाद की ओर रुख बब्बर खालसा इंटरनेशनल से जुड़ने के साथ शुरू हुआ। इस दौरान वह भूमिगत हो गया। 31 अगस्त 1995 को पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की चंडीगढ़ स्थित पंजाब एवं हरियाणा सिविल सचिवालय के बाहर हुए आत्मघाती बम विस्फोट में हत्या कर दी गई थी। इस हमले में आत्मघाती हमलावर दिलावर सिंहकी भी मौत हुई थी, जबकि 15 अन्य लोगों की जान चली गई थी। बाद में इस हत्या की साजिश में शामिल होने के आरोप में जगतार सिंह हवारा को दोषी ठहराया गया।

जनवरी 2004 में हवारा अपने सह-आरोपियों जगतार सिंह तारा, परमजीत सिंह भेओरा और एक अन्य दोषी देवी सिंह के साथ बुरैल जेल से सुरंग बनाकर फरार हो गया। करीब छह महीने बाद जून 2005 में उसे दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गिरफ्तार कर लिया।

इसके बाद चले मुकदमे में साल 2007 में ट्रायल कोर्ट ने हवारा को मौत की सजा सुनाई। साल 2010 में हाई कोर्ट ने इस सजा को बदलकर उम्रकैद में तब्दील कर दिया। जिसमें कोई रिहाई नहीं होगी। अदालत ने माना की हवारा हत्या की साजिश में सक्रिय रूप से शामिल था।

जगतार सिंह हवारा को मिल सकती है पैरोल, CM मान के बाद रवनीत सिंह बिट्टू भी मिले राज्यपाल से

पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में दोषी जगतार सिंह हवारा को जल्द पैरोल मिल सकती है। इस मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने बुधवार शाम को राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया से मुलाकात की। पढ़ें पूरी खबर।