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जगन्माता: रामकृष्ण की प्रेरणा रहीं मां शारदा देवी

जब वे 18 वर्ष की हुईं तो दक्षिणेश्वर मां काली के मंदिर में आईं जहां गदाधर नामक ईश्वर के अवतार रामकृष्ण परमहंस पुजारी के रूप में रहते थे। मां शारदा के दक्षिणेश्वर आते ही रामकृष्ण परमहंस ने उनकी जगन्माता के रूप में पूजा की। मां शारदा और रामकृष्ण परमहंस का विवाह सांसारिक नहीं आध्यात्मिक था।

जगन्माता मां शारदा देवी, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद जी के साथ।

विनय बिहारी सिंह

शारदा (मूल नाम- शारदामणि) का जन्म पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के जयरामबाटी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पिता रामचंद्र मुखोपाध्याय और मां श्यामा सुंदरी देवी के लिए 22 दिसंबर 1853 खुशियां लेकर आया क्योंकि मां शारदा का जन्म इसी दिन हुआ और उन्हें बहुत पहले से देवी-देवताओं के सपने आ रहे थे।

दिव्य दर्शन हो रहे थे। मां शारदा के माता-पिता अत्यंत धार्मिकता और सात्विकता से ओत- प्रोत थे। जब मां शारदा पांच साल की हुईं तो माता-पिता के पास एक विवाह प्रस्ताव आया। उनके गांव से तीन मील दूर (7.6 किलोमीटर) कामारपुकुर गांव के महान संत रामकृष्ण परमहंस (जन्म-18 फरवरी 1836) की तरफ से, जिनका नाम उस समय गदाधर चट्टोपाध्याय था। तब रामकृष्ण परमहंस 17 वर्ष के थे।

कहते हैं उनके पिता, जो भगवान राम के भक्त थे, बचपन में गदाधर की भक्ति को देख कर उन्हें रामकृष्ण कहा करते थे। मां ने सोचा इनका विवाह कर दें तो शायद घर-गृहस्थी में मन लगे। शादी की बात चली तो स्वयं गदाधर ने जयरामबाटी की बालिका शारदामणि से विवाह की इच्छा जताई। और यह दिव्य विवाह मई 1859 में हो गया। मां शारदा की पांच वर्ष की आयु में शादी हुई। वे पिता के घर पर ही रहीं। वे भी अत्यंत धार्मिक स्वभाव की थीं। मां शारदा भक्ति और सेवा की मूर्ति थीं।

जब वे 18 वर्ष की हुईं तो दक्षिणेश्वर मां काली के मंदिर में आईं जहां गदाधर नामक ईश्वर के अवतार रामकृष्ण परमहंस पुजारी के रूप में रहते थे। मां शारदा के दक्षिणेश्वर आते ही रामकृष्ण परमहंस ने उनकी जगन्माता के रूप में पूजा की। मां शारदा और रामकृष्ण परमहंस का विवाह सांसारिक नहीं आध्यात्मिक था।

पहले दिन से ही मां शारदा, रामकृष्ण परमहंस की पत्नी नहीं मां बन गईं। वे उन्हें मां ही कहा करते थे। मां शारदा दिव्य विभूतियों से संपन्न थीं। वे दक्षिणेश्वर मंदिर परिसर में रामकृष्ण परमहंस के कमरे से थोड़ी दूर नौबतखाने में एक अत्यंत छोटे कमरे में रहती थीं। वे रामकृष्ण परमहंस और वहां रहने और आने वाले भक्तों के लिए भोजन बनाती थीं, सेवा करती थीं। रामकृष्ण परमहंस का आशीर्वाद उन पर सदा बरसता रहता था। वे सदा सेवा, ध्यान, पूजा और जप में डूबी रहती थीं। अब मां शारदा के चमत्कार की कहानी। यह घटना रामकृष्ण मिशन के संन्यासी स्वामी भास्करानंद ने लिखी है। सन 1912 की बात है।

मां शारदा के एक शिष्य थे- पंचानन ब्रह्मचारी। ब्रिटिश राज था। अचानक अंग्रेजों ने असम की तत्कालीन राजधानी शिलांग से हटा कर अस्थायी रूप से ढाका कर दी। एक दिन पंचानन ब्रह्मचारी तीन नेपाली मजदूरों को बुला कर अपने घर की मरम्मत करा रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि उनके घर से तीसरे मकान में आग लगी है। वह मकान एक रानी का था, जो तब खाली था।

पंचानन ब्रह्मचारी ने पड़ोस में रखी पानी से भरी बाल्टी उठाई और आग बुझाने दौड़ पड़े। उस घर के दो हिस्से थे। पहले छोटा मकान था, फिर एक बड़ा। आग छोटे मकान में लगी थी। वे सीढ़ी चढ़ कर आग पर पानी डालने वाले ही थे कि सात फुट ऊंची आग की लपटों से वे घिर गए। उन्हें लगा कि अब जान नहीं बचेगी।

उन्होंने अपने गुरु मां शारदा को पुकारा। मां शारदा तब कोलकाता में रहती थीं। उन्होंने देखा कि मां शारदा बिजली की तरह के कौंधते प्रकाश के रूप में वहां आईं और कहा- तुम चिंता न करो बेटे। मैं तुम्हारे पास हूं। फिर उन्होंने आशीर्वाद दिया। थोड़ी देर में आग की लपटें शांत हो गईं। आश्चर्य इतनी देर तक जिन लपटों में रहने के बावजूद पंचानन ब्रह्मचारी का सिर्फ चेहरा झुलस कर काला हुआ था। मां शारदा का देहांत 20 जुलाई 1920 को हुआ।

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