Ram Mandir Donation Controvery: अयोध्या में राम मंदिर के लिए मिले दान में कथित चोरी का मामला 10 जुलाई से कर्नाटक के बेलगावी में शुरू हो रही आरएसएस की तीन दिन की सालाना अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक में चर्चा का मुख्य विषय रहने वाला है। संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों का कहना है कि यह विवाद संगठन के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बन गया है।

हालांकि, इस बैठक में मुख्य रूप से देश के मौजूदा मुद्दों, जैसे कि चल रही जनगणना प्रक्रिया पर चर्चा होनी थी, लेकिन संघ के सूत्रों ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि राम मंदिर विवाद बाकी एजेंडा पर हावी हो सकता है क्योंकि इसका असर आरएसएस की सार्वजनिक छवि पर पड़ा है। बैठक में राम मंदिर के कामकाज से जुड़े कुछ आरएसएस पदाधिकारियों के भविष्य पर भी चर्चा हो सकती है।

जनगणना पर भी चर्चा होगी

आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, “हालांकि देश के अन्य मौजूदा मुद्दों के साथ-साथ जनगणना पर भी चर्चा होगी, लेकिन राम मंदिर का मुद्दा जाहिर तौर पर सभी के मन में है और इस पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। इसने पूरे संघ परिवार पर असर डाला है और सभी कार्यकर्ता व वरिष्ठ पदाधिकारी इस मुद्दे को उठा सकते हैं। यह मुद्दा लोगों के बीच संघ की नकारात्मक छवि बना रहा है और हमें इस गिरावट को रोकना होगा।”

उत्तर प्रदेश के एक आरएसएस पदाधिकारी ने इस विवाद को कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान संघ पर लगे हिंदुत्व टेरर के आरोपों से भी ज्यादा नुकसानदायक बताया। पदाधिकारी ने कहा, “जब यूपीए सरकार ने संघ पर हिंदुत्व टेरर का आरोप लगाया था, तो किसी ने उस पर विश्वास नहीं किया था। इसे सरकार का एक अभियान माना गया था। लेकिन यह मामला लोगों की नजर में हमें नुकसान पहुंचा रहा है। लोग सोचते हैं कि राम मंदिर और संघ एक ही हैं। भले ही गबन में संघ का कोई व्यक्ति शामिल न हो, लेकिन यह एक ऐसा विवाद है जिससे पीछा छुड़ाना मुश्किल होगा।”

यह सालाना बैठक क्या है?

बेलगावी में 10 से 12 जुलाई तक होने वाली सालाना ‘अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक’ आरएसएस की सबसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठकों में से एक है। इसमें सभी 11 संगठनात्मक क्षेत्रों और 46 प्रांतों के प्रांत प्रचारक, सह-प्रांत प्रचारक, क्षेत्र प्रचारक और सह-क्षेत्र प्रचारक शामिल होंगे। इनके अलावा, संघ से प्रेरित 32 संगठनों के अखिल भारतीय संगठन सचिव भी इसमें हिस्सा लेंगे। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले, सभी सह-सरकार्यवाह और संगठन की शीर्ष कार्यकारिणी के सदस्य भी इसमें शामिल होंगे।

संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान संगठन के विस्तार, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और योजनाओं की समीक्षा के अलावा, प्रतिभागियों के मौजूदा राष्ट्रीय हालात (जिसमें जनगणना भी शामिल है) पर भी चर्चा करने की उम्मीद है।

डैमेज कंट्रोल

यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि आरोपों के सामने आने के लगभग एक हफ्ते बाद शुक्रवार को आरएसएस ने राम मंदिर विवाद पर अपना पहला औपचारिक बयान जारी किया। बयान में होसबोले ने मंदिर के दान पात्रों से कथित चोरी की घटना को ऐसा बताया जिससे पूरे समाज और राम भक्तों की भावनाओं और आस्था को गहरी चोट पहुंची है और कहा कि संगठन इससे बेहद दुखी और नाराज है।

बयान में कहा गया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अनुरोध पर एक एसआईटी का गठन किया है और इस बात पर जोर दिया कि जांच के बाद दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। इसमें यह भी कहा गया कि ट्रस्ट को इस घटना को एक असाधारण मामला मानना ​​चाहिए, मंदिर के प्रबंधन और कामकाज में कमियों को दूर करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भक्तों की आस्था बनी रहे।

आरएसएस ने कहा कि उसे उम्मीद है कि मंदिर प्रबंधन और एसआईटी दोनों ही पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन और कुशल प्रशासनिक प्रणालियों के जरिये जनता का भरोसा बहाल करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएंगे। साथ ही, उसने हिंदू समाज से धैर्य और संयम बरतने और हिंदू-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी ताकतों को इस विवाद का फायदा उठाकर हिंदू समाज को बदनाम न करने देने की अपील की।

कब शुरू हुआ विवाद?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब राम मंदिर के दान पात्रों से चोरी के आरोपों के बाद ट्रस्ट ने जांच की मांग की। इसके बाद यूपी सरकार ने मामले की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया। इस घटना ने संघ परिवार के भीतर भी एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता और ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को इस मामले को संभालने के तरीके को लेकर संगठन के ही कुछ हिस्सों से आलोचना का सामना करना पड़ा है। इसके बाद आरएसएस नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से जांच का समर्थन किया है और साथ ही मंदिर के प्रशासन में व्यवस्थागत सुधारों पर जोर दिया है।

पिछले कुछ दशकों में राम मंदिर के संघ परिवार के वैचारिक आंदोलन का सबसे प्रमुख प्रतीक बन जाने के बाद आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने माना है कि इस विवाद के नतीजे सिर्फ आपराधिक जांच तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह पूरे संगठन की विश्वसनीयता का मुद्दा भी बन गया है। कई नेताओं ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि बेलगावी बैठक में न केवल कानूनी और प्रशासनिक प्रतिक्रिया पर चर्चा होगी, बल्कि इस घटना से हुई प्रतिष्ठा की हानि को कम करने के तरीकों पर भी विचार किया जाएगा।

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राम मंदिर दान चोरी को लेकर रोज के नए खुलासे हो रहे हैं। इसी कड़ी में अब खबर है कि राम मंदिर से सोने के पन्नों वाली रामचरित मानस भी गायब है। दान देने वाले पूर्व गृह सचिव लक्ष्मी नारायण ने इसे लेकर कई दावे किए हैं। उनका कहना है कि उन्होंने 8 अप्रैल 2024 को सोने से पन्नों वाली रामचरित मानस दी थी, लेकिन उन्हें उसकी कोई रसीद नहीं मिली। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…