दार्जिलिंग में सड़कों, पर्यटक स्थलों और कल्याणकारी योजनाओं के संकेत चिह्नों के साथ लगती दीवारों पर हमें गोरखालैंड चाहिए के नारे की अब धुंधली तस्वीरें ही दिखाई देती हैं, जो इस बात का साफ संकेत है कि कैसे पर्वतीय क्षेत्र की राजनीति अलग राज्य के सपने से हटकर अब शासन में रोजमर्रा की मांगों पर केंद्रित हो रही है।
उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और कुर्सियोंग में दशकों से राजनीति एक अलग गोरखालैंड राज्य की मांग के वादे के इर्द-गिर्द घूमती है, जो दशकों से क्षेत्र के लोगों से भावनात्मक रूप से जुड़ी है। यह आकांक्षा आज भी जीवित है लेकिन अब यह पर्वतीय क्षेत्र में राजनीति की एकमात्र भाषा नहीं रह गई है।
पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले पर्वतीय क्षेत्र में एक गहरा बदलाव देखने को मिल रहा है। राजनीतिक मान्यता की पुरानी मांग अब कुछ अन्य मजबूत मांगों के साथ जुड़ गई है जैसे कि सड़कों की मरम्मत कौन करेगा, पर्यटन को कौन पुनर्जीवित करेगा, पीने के पानी की व्यवस्था कौन करेगा, स्कूलों और अस्पतालों में सुधार कौन करेगा, चाय बागानों में मजदूरी कौन बढ़ाएगा और कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन का प्रवाह कौन बनाए रखेगा?
नतीजतन पर्वतीय इलाकों में गोरखालैंड के सपने और उसे साकार करने की राजनीति के बीच टकराव के कारण वर्षों में सबसे जटिल चुनावी मुकाबला देखने को मिल रहा है। एक स्तर पर यह चुनाव राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस – भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा (बीजीपीएम) गठबंधन और भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के बीच एक मुकाबला है।
तृणमूल समर्थित अनित थापा के नेतृत्व वाली बीजीपीएम मतदाताओं को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि अंतहीन आंदोलनों का दौर समाप्त हो चुका है और अब पर्वतीय इलाकों को विकास की जरूरत है। इसके उलट भाजपा एक बार फिर स्थायी राजनीतिक समाधान के भावनात्मक विचार में फिर जान डालने की कोशिश कर रही है और यह तर्क दे रही है कि सड़कें, कल्याण और पर्यटन परियोजनाएं गोरखा पहचान के अनसुलझे प्रश्न का विकल्प नहीं बन सकती हैं।
कुर्सियोंग के एक चाय बागान के कर्मचारी ने कहा कि पहले लोगों ने गोरखालैंड के सपने के लिए वोट दिया था। अब वे यह भी जानना चाहते हैं कि उनके गांव के लिए सड़क की मरम्मत कौन करेगा। पश्चिम बंगाल में 1980 के दशक में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के हिंसक आंदोलन से लेकर विमल गुरुंग के गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के उदय तक, पर्वतीय क्षेत्र की राजनीति लंबे समय से अलग राज्य के अधूरे वादे से प्रेरित रही है।
भाजपा का 2009 के बाद इस परिदृश्य में पदार्पण हुआ। एक के बाद एक चुनाव में उसने जीजेएम और बाद में जीएनएलएफ के समर्थन से दार्जिलिंग लोकसभा सीट बरकरार रखी, साथ ही स्थायी राजनीतिक समाधान का वादा भी किया। हालांकि बार-बार किए गए वादों के पूरा नहीं होने से लोगों में निराशा पैदा हुई है और इन वादों के प्रति उनका आकर्षण भी कम हुआ है।
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तमाम चुनौतियों के बीच पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस एक बार फिर से सत्ता हासिल करने में जुटी हुई है। चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी अपने प्रदर्शन की बदौलत सत्ता में वापसी का दंभ भर रही है, लेकिन चुनावी जंग में कांग्रेस और हुमायूं कबीर-एआईएमआईएम गठबंधन के उतरने से तृणमूल कांग्रेस को मतों के नुकसान की चिंता बनी हुई है। पूरी खबर पढ़ें…
