बीजेपी में आंतरिक लोकतंत्र का मुद्दा: दो साल से राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक नहीं, कुछ लोगों पर ही पार्टी चलाने का आरोप

इस तरह की अगली मुलाकात के बारे में अभी कुछ नहीं कहा गया है। राष्ट्रीय नेतृत्व ने अभी तक राष्ट्रीय कार्यकारिणी की संरचना को भी नहीं तय किया है।

BJP, Executive Meeting
भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की 2019 में हुई बैठक में मौजूद पार्टी के नेतागण। (फोटो- इंडियन एक्सप्रेस फाइल)

यद्यपि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को भाजपा के आंतरिक लोकतंत्र के लिए संवैधानिक तंत्र माना जाता है, और कम से कम पांच राज्यों ने अपनी राज्य कार्यकारिणी की बैठकें भौतिक रूप से आयोजित भी की हैं, जिसमें राष्ट्रीय नेताओं ने भाग लिया था। पिछली बार सत्ताधारी दल ने दो साल से अधिक पहले जनवरी 2019 में एक पूर्ण राष्ट्रीय कार्यकारिणी सम्मेलन बुलाया था, लेकिन इस तरह की अगली बैठक के बारे में अभी कुछ नहीं कहा गया है। वास्तव में, राष्ट्रीय नेतृत्व ने अभी तक राष्ट्रीय कार्यकारिणी की संरचना का पता नहीं लगाया है।

द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कम से कम तीन वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने देरी को सामान्य बात बताने की कोशिश की। उनमें से एक ने कहा, “संगठन में चीजें बहुत कुशलता से आगे बढ़ रही हैं और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक नहीं होने से कामकाज में अब तक कोई बाधा नहीं आई है।” हालांकि, भाजपा में एक वर्ग, जिसमें कुछ वरिष्ठ नेता शामिल हैं, ने देरी के लिए मौजूदा पार्टी नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि बैठक नहीं करने के पीछे महामारी प्रतिबंध को “बहाना” के रूप में बताया गया। एक नेता ने कहा “पार्टी नेतृत्व नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी टीम का गठन भी नहीं कर पाया है। किसी को राष्ट्रीय नेतृत्व से पूछना चाहिए कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक क्यों नहीं होती है।”

यह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व के संदर्भ में है, जो शक्तियों के “केंद्रीकरण” की आलोचना का सामना कर रहा है। कुछ मुट्ठी भर नेता व्यापक विचार-विमर्श के बिना ही सारे फैसले लेते हैं। इसकी वजह से क्षेत्रीय नेता एक मजबूत छवि के साथ उभर नहीं पाते हैं।

भाजपा का संविधान कहता है, “राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राज्य कार्यकारिणी की बैठक हर तीन महीने में एक बार होनी चाहिए।” 2010 में, पार्टी ने महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करते हुए सदस्यों की संख्या 80 से बढ़ाकर 120 कर अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी को मजबूत किया था।

संयोग से, कई प्रमुख राज्यों की राज्य कार्यकारिणी की बैठक पहले ही हो चुकी है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा ने पहले सभी राज्य इकाई प्रमुखों को 21 जून से बैठकें करने का निर्देश दिया था। हालांकि राष्ट्रीय नेतृत्व ने वर्चुअल मीटिंग करने का भी विकल्प दिया है, लेकिन कई राज्य इकाइयों ने इसे भौतिक रूप से आयोजित किया।

असम बीजेपी की दो दिवसीय राज्य कार्यकारिणी की बैठक 22-23 सितंबर को हुई थी, जिसमें मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल शामिल हुए थे। गुवाहाटी में हुई बैठक में असम प्रभारी और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बैजयंत पांडा भी मौजूद थे। उत्तर प्रदेश की राज्य कार्यकारिणी की बैठक जुलाई में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पूर्व केंद्रीय मंत्री और यूपी प्रभारी राधा मोहन सिंह के साथ हुई थी। इसमें राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने वर्चुअल रूप में दिल्ली से संबोधित किया।

गुजरात भाजपा ने केवड़िया कॉलोनी में एक से तीन सितंबर तक तीन दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सीआर पाटिल ने की। केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह और केंद्रीय मंत्री और गुजरात पार्टी के प्रभारी भूपेंद्र यादव बैठक में शामिल हुए।

मध्य प्रदेश भाजपा, जिसकी कार्यकारिणी में 160 से अधिक सदस्य हैं, जून में मिले, हालांकि महामारी प्रोटोकॉल के कारण उपस्थिति सीमित रही। बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी मौजूद रहे। राजस्थान इकाई ने 2 मार्च को अपनी राज्य कार्यकारिणी का आयोजन किया, वहीं कर्नाटक इकाई ने इस महीने इसे आयोजित किया।

भाजपा की अन्य शाखाओं ने भी फिजिकल कॉन्क्लेव आयोजित किए हैं। उदाहरण के लिए अनुसूचित जाति मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक वाराणसी में हुई। कुछ वरिष्ठ नेताओं ने संकेत दिया कि भाजपा पार्टी और राष्ट्र के सामने चुनौतियों के अनुसार अपनी कार्यशैली में बदलाव कर रही है। भाजपा महासचिव और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा, “पदाधिकारियों की बैठकें नियमित रूप से हो रही हैं। पार्टी अध्यक्ष नियमित रूप से ऐसी बैठकें करते हैं। महामारी के दौरान, भाजपा ही वह पार्टी थी जो सबसे अधिक सक्रिय रही है।”

उन्होंने एक आइडिया एक्सचेंज कार्यक्रम में द इंडियन एक्सप्रेस को बताया “भाजपा ने हमेशा चुनौतियों के अनुसार अपने आयाम बदले – जब लोकतंत्र खतरे में था [आपातकाल के दौरान], हम जनता पार्टी में विलय हो गए। 1989 में जब भ्रष्टाचार सबसे बड़ी चुनौती थी, तब भाजपा इसके खिलाफ खड़ी हुई थी। जब देश को उस मोर्चे पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा, तब हमारी पार्टी ने शासन के मुद्दों को उठाया। इसलिए, महामारी के दौरान, हमने साबित कर दिया है कि सेवा भी एक तरह की राजनीति है।”

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