ISRO Privatization Controversy: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO के प्रमुख कर्मचारी संघों ने एजेंसी के निजीकरण के कयासों को लेकर सवाल उठाए हैं। कर्मचारी संघों ने इसरो चीफ वी. नारायणन को पत्र लिखा है और पूछा है कि एजेंसी के निजीकरण के अभियान की स्थिति क्या है और मौजूदा कर्मचारियों की एजेंसी में भविष्य में क्या भूमिका होगी?

ISRO ने कई महीनों के अंतराल के बाद GSLV रॉकेट के जरिए पृथ्वी का अवलोकन करने वाला एक सैटेलाइट सफलतापूर्वक लॉन्च किया था। जानकारी के मुताबिक, इसके कुछ घंटों बाद ही शुक्रवार को कर्मचारी संघों ने इसरो चीफ वी नारायणन को एजेंसी के निजीकरण के संबंध में सवाल पूछते हुए उन तक एक पत्र भेजा।

निजी कंपनियों की बढ़ती हिस्सेदारी

भले ही इसरो अपने मुख्य मिशनों को सफलतापूर्वक कर रहा है, लेकिन कर्मचारी संघों ने जो पत्र लिखा है, वह बताता कि कैसे देश की अंतरिक्ष मिशन वाली गतिविधियों में निजी कंपनियों का दखल और हिस्सेदारी बढ़ रही है। इसके चलते ही इसरो की भूमिका पर भी अंदरखाने कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं।

इसरो के निजीकरण को लेकर शुरू हुए विवाद की वजह बिजनेस टुडे का एक कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम में IN-Space के अध्यक्ष पवन गोयनका भी मौजूद थे। IN-Space इसरो का ही नोडल यूनिट है। इस विभाग की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 में भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के खोलने के लिए थी।

निजी भागीदारी की कही गई थी बात

ISRO मद्रास के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के अध्यक्ष गोयनका ने कहा, “अंततः इसरो किसी भी प्रक्षेपण यान का निर्माण नहीं करेगा। यह काम निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम करेंगे। वे रोजमर्रा के उपग्रहों का निर्माण नहीं करेंगे। वे विशेष प्रयोजन के उपग्रहों का निर्माण करेंगे, जैसे वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए कक्षा में स्थापित उपग्रह या नई तकनीक का विकास करने वाले उपग्रह, जिन्हें बाद में निजी क्षेत्र को हस्तांतरित कर दिया जाएगा।”

कर्मचारी संघों का तर्क है कि अंतरिक्ष विभाग की ओर से इन बयानों के बाद कभी भी कोई औपचारिक संचार जारी नहीं किया गया जिसमें नीति, उसके कानूनी आधार उसकी समयसीमा या वर्तमान कर्मचारियों और भविष्य की भर्ती पर इसके प्रभाव के बारे में बताया गया हो।

ISRO के अलग-अलग केंद्रों (SAC और LPSC) के प्रतिनिधियों ने अपने अध्यक्ष को इन्हीं सबके चलते पत्र लिख कर पूछा है कि पवन गोयनका ने हाल ही में जो बयान दिया है, क्या वह भारत सरकार, अंतरिक्ष आयोग या अंतरिक्ष विभाग का आधिकारिक और मंजूर किया गया फैसला है या नहीं। कर्मचारी सीधे तौर पर निजीकरण के कयासों को लेकर चिंतित हैं।

इस पत्र में कई विशिष्ट चिंताएं जताई गई हैं-

  • सार्वजनिक संगठन के रूप में इसरो की भविष्य की भूमिका कैसी होगी?
  • क्या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को भी विनिर्माण कार्यों से बाहर रखा जाएगा?
  • वर्तमान कर्मचारियों के लिए क्या सुरक्षा उपाय मौजूद हैं?
  • सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित प्रौद्योगिकियों को निजी कंपनियों को कैसे हस्तांतरित किया जा रहा है?
  • क्या एजेंसी की संरचना, जनादेश या कर्मचारियों को प्रभावित करने वाले किसी भी अपरिवर्तनीय निर्णय को अंतिम रूप देने से पहले कर्मचारी संघों से परामर्श किया जाएगा।

गिनाए भविष्य से संबंधित खतरे

कई बार फोन और मैसेज करने के बावजूद, गोयनका और नारायणन दोनों ही टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं थे। संगठनों ने गोयनका द्वारा उल्लिखित गतिविधियों को इसरो की मुख्य क्षमता बताया है और चेतावनी दी है कि इनसे पीछे हटना संगठन के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए खतरा है।

पत्र में कहा गया है कि जिन कर्मचारियों ने इसरो की स्थिरता और सार्वजनिक छवि को आधार बनाकर अपना करियर बनाया है, उन्हें अब अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। रिक्तियों और कर्मचारियों के छोड़ने से पहले से ही सीमित भर्ती प्रक्रिया प्रतिभाशाली युवा पेशेवरों को हतोत्साहित करेगी जो इसरो को एक सम्मानित सार्वजनिक क्षेत्र के करियर के रूप में देखते हैं।

अंतरिक्ष क्षेत्र को 2020 में निजी भागीदारी के लिए खोले जाने के बाद से सरकार का घोषित दृष्टिकोण यह रहा है कि आईएसआरओ उभरती कंपनियों को मार्गदर्शन प्रदान करे और धीरे-धीरे नियमित कार्य उन्हें सौंपे, जबकि आईएसआरओ वैज्ञानिक और रणनीतिक महत्व के मिशनों पर ध्यान केंद्रित करे।

पत्र में उल्लेख किया गया है कि आईएसआरओ पहले ही उद्योग को लगभग 120 प्रौद्योगिकियां हस्तांतरित कर चुका है, जिनमें लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएमएलवी) और पीएसएलवी शामिल हैं। इसके अलावा, कुलशेखरपटनम में विकसित किए जा रहे नए अंतरिक्ष बंदरगाह का ध्यान लघु उपग्रह प्रक्षेपणों पर केंद्रित होने की उम्मीद है, एक ऐसा क्षेत्र जहां निजी क्षमता पहले से ही काफी उन्नत है।

वैश्विक भागीदारी का उम्मीद

मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान के उप महानिदेशक अजय लेले ने कहा कि इस क्षेत्र का उदारीकरण बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था और इससे भारत को वैश्विक बाजार में अधिक हिस्सेदारी हासिल करने में मदद मिल सकती थी।

उन्होंने कहा कि अब जब आईएसआरओ गगनयान, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और मानवयुक्त चंद्र मिशन जैसी प्रमुख परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, तो कुछ कार्य स्वाभाविक रूप से निजी कंपनियों को सौंप दिए जाएंगे – लेकिन उन्होंने यह भी आगाह किया कि प्रक्षेपण सेवाएं और वाहन विकास आईएसआरओ के मूल दायित्वों का अभिन्न अंग बने रहेंगे।

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