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‘तीन तलाक को समान नागरिक संहिता से नहीं जोड़ा जाए, दोनों अलग मामले’

जामिया मिलिया इस्लामिया में प्रोफेसर जुनैद हारिस का कहना है कि ‘तीन तलाक मुस्लिम समुदाय का आंतरिक मामला है और इसमें अदालत या राजनीतिक दलों का कोई दखल नहीं होना चाहिए।’

Author नई दिल्ली | October 23, 2016 14:11 pm
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है। (रॉयटर्स फाइल फोटो)

विधि आयोग की ओर से तीन तलाक और समान नागरिक संहिता पर लोगों की राय मांगे जाने और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा इसका विरोध किए जाने के बाद खड़े हुए विवाद की पृष्ठभूमि में देश के कुछ इस्लामी जानकारों और मुस्लिम महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने रविवार (23 अक्टूबर) कहा कि ये दो लोग अलग मुद्दे हैं तथा इनको आपस में जोड़ने का मकसद ‘असल मुद्दों से ध्यान भटकाना’ है। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह-संस्थापक जकिया सोमान का आरोप है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक के मामले को लेकर ‘बैकफुट पर आने’ के बाद इसे समान नागरिक संहिता से जोड़ने की कोशिश की। दूसरी तरफ, जामिया मिलिया इस्लामिया में इस्लामी अध्ययन विभाग के प्रोफेसर जुनैद हारिस का कहना है कि ‘तीन तलाक मुस्लिम समुदाय का आंतरिक मामला है और इसमें अदालत या राजनीतिक दलों का कोई दखल नहीं होना चाहिए।’

प्रोफेसर हारिस ने कहा, ‘समान नागरिक संहिता के मुद्दे को मुसलमानों से जोड़कर देखना पूरी तरह गलत है। यह मुसलमानों का नहीं, बल्कि देश की संस्कृति से जुड़ा मुद्दा है। हमारा देश अलग धर्मों, आस्थाओं, परंपराओं और रीति-रिवाजों का एक संग्रहालय है। अलग अलग समुदायों के अपने पर्सनल लॉ हैं। ऐसे में इस मामले को सिर्फ मुस्लिम समुदाय के साथ जोड़कर देखना पूरी तरह गलत है।’ जकिया सोमान ने कहा, ‘विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता पर लोगों की राय मांगी है तो देश के हर नागरिक को अपनी राय देनी चाहिए। लेकिन पर्सनल लॉ बोर्ड ने तीन तलाक के मामले से ध्यान भटकाने के लिए जानबूझकर इसे समान नागरिक संहिता के साथ जोड़ दिया। उसने समान नागरिक संहिता को आगे रखकर मुस्लिम समुदाय को डराने की कोशिश की है।’

प्रोफेसर हारिस ने कहा, ‘तीन तलाक को मैं मुस्लिम समुदाय का आंतरिक मामला मानता हूं। शरिया और कुरान में इसको लेकर चीजें स्पष्ट की गई हैं और तलाक के साथ कई ऐसी शर्तें हैं जो महिलाओं के हक में जाती है। ऐसे में तीन तलाक को थोपने का मामला कहां उठता है। मुझे लगता है कि इस मामले पर बेवजह बवाल खड़ा किया जा रहा है। वैसे भी, धार्मिक और आस्था के मामलों में अदालत और राजनीतिक दलों को दखल नहीं देना चाहिए।’ गौरतलब है कि हाल ही में विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता और तीन तलाक सहित कुछ मुद्दों पर लोगों की राय मांगते हुए एक प्रश्नावली जारी की। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ दूसरे मुस्लिम संगठनों ने इस प्रश्नावली का बहिष्कार करने का एलान किया जिसके बाद इस विवाद ने तूल पकड़ा।

इस्लामी नारीवादी शीबा असलम फहमी का कहना है, ‘समान नागरिक संहिता का मामला पूरी तरह राजनीतिक है। इसे सत्तारूढ़ दल की तरफ से चुनावी फायदे के लिए छेड़ा गया है। मुस्लिम महिलाओं का मुद्दा यह नहीं है। उनका मुद्दा सिर्फ इतना है कि तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह की व्यवस्था में कुरान और शरीयत के मुताबिक संशोधन किए जाएं। समान नागरिक संहिता और तीन तलाक को आपस में जोड़ने की जरूरत नहीं है।’

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