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इशरत जहां के हलफनामों पर ‘फर्जी विवाद’ पैदा कर रही है मोदी सरकार: चिदंबरम

चिदंबरम ने एक बयान में कहा कि समाचार रिपोर्ट ने मामले में केंद्र सरकार की ओर से दायर दो हलफनामों पर राजग सरकार द्वारा पैदा किए गए ‘फर्जी विवाद को उजागर किया है।

Author नई दिल्ली | June 16, 2016 3:32 PM
पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम। (फाइल फोटो)

कांग्रेस के नेता एवं पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने मोदी सरकार पर इशरत जहां मामले में दायर दो हलफनामों को लेकर ‘फर्जी विवाद’ पैदा करने और लापता फाइलों की रिपोर्ट ‘छेड़छाड़ करके’ तैयार करने का गुरुवार (16 जून) को आरोप लगाया। रिपोर्ट में यह कहा गया है कि इशरत जहां मामले से जुड़ी गुम हुई फाइलों की जांच कर रहे पैनल ने एक गवाह को ‘प्रताड़ित’ किया। इसके बाद चिदंबरम ने एक बयान में कहा कि समाचार रिपोर्ट ने मामले में केंद्र सरकार की ओर से दायर दो हलफनामों पर राजग सरकार द्वारा पैदा किए गए ‘फर्जी विवाद को व्यापक रूप से उजागर’ कर दिया है।

उन्होंने कहा, ‘कहानी से यह सीख मिलती है कि छेड़छाड़ करके तैयार की गई (जांच अधिकारी की) रिपोर्ट भी सच नहीं छुपा सकती। असल मुद्दा यह है कि क्या इशरत जहां और तीन अन्य लोग वास्तविक मुठभेड़ में मारे गए थे या उनकी मौत फर्जी मुठभेड़ में हुई थी। मामले की जुलाई 2013 से लंबित सुनवाई ही सच को सामने लेकर आएगी।’

गृह मंत्रालय मे अतिरिक्त सचिव बी के प्रसाद के नेतृत्व में एक सदस्यीय जांच समिति ने कल जमा की गई अपनी रिपोर्ट में कहा था कि गुम हुए पांच दस्तावेजों में से चार दस्तावेज अब भी नहीं मिले हैं। पैनल ने कहा कि तत्कालीन संयुक्त सचिव के अनुसार ये कागजात उनके वरिष्ठों को भेजी गई फाइल का हिस्सा थे लेकिन जब फाइल उन्हें वापस दी गई तो उसमें ये कागजात नहीं थे। उस समय चिदंबरम गृह मंत्री थे।

कांग्रेस के नेता ने कहा कि समाचार रिपोर्ट ने उस रुख को पूरी तरह से सही साबित कर दिया है जो उन्होंने दो हलफनामों को लेकर अपनाया था। पहले हलफनामे में (छह अगस्त, 2009) उन ‘खुफिया जानकारियों’ का खुलासा किया गया है जो केंद्र सरकार ने राज्य के साथ साझा की थीं। चिदंबरम ने कहा कि न्यायाधीश एस पी तमांग ने अपनी रिपोर्ट (सात सितंबर, 2009) में पाया था कि इशरत जहां एवं तीन अन्य एक ‘फर्जी मुठभेड़’ में मारे गए थे।

उन्होंने कहा, ‘रिपोर्ट ने गुजरात और अन्य जगहों पर हंगामा पैदा कर दिया। मुठभेड़ का बचाव करने के लिए पहले हलफनामे की गलत व्याख्या की गई और उसका दुरुपयोग किया गया इसलिए पहले हलफनामे को स्पष्ट करना आवश्यक था।’ उन्होंने कहा, ‘इसलिए, यह स्पष्ट करने के लिए (29 सितंबर, 2009 में) ‘एक और हलफनामा’ दायर किया गया कि खुफिया जानकारियां ‘निर्णायक साक्ष्य नहीं है और इस प्रकार की जानकारियों पर कार्रवाई करना राज्य सरकार एवं राज्य पुलिस का काम है।’

चिदंबरम ने कहा कि ‘एक और हलफनामे’ की विषयवस्तु (खासकर दूसरा एवं पांचवा पैरा) बिल्कुल स्पष्ट एवं सही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मामले पर टिप्पणी करने वाले अधिकतर लोगों ने ‘दूसरे हलफनामे’ को पढ़ने की परवाह नहीं की। उन्होंने कहा, ‘‘ ‘गुम हुए’ पांच दस्तावेज मेरे अपनाए रुख को पूरी तरह सही साबित करते हैं। घटनाक्रम इस निर्णय तक पहुंचाते हैं कि हमने पूरी तरह से पारदर्शी तरीके से काम किया।’

पूर्व गृह मंत्री ने कहा कि देश के सर्वोच्च कानूनी अधिकारी अटॉर्नी जनरल ने ‘दूसरे हलफनामे’ को दायर किए जाने से पहले इसके मसौदे की जांच की थी। यह फाइल कम से कम तीन या चार बार गृह सचिव के हाथों से गुजरी। अंतत: गृह सचिव के आदेश पर ‘दूसरा हलफनामा’ अदालत में दायर किया गया। उन्होंने कहा, ‘‘निस्संदेह, मैं उस ‘एक और हलफनामा’ को दायर करने की पूरी जिम्मेदारी लेता हूं जिसे दायर करना पूरी तरह से सही था।’

एक समाचार पत्र ने 16 जून को एक रिपोर्ट में आरोप लगाया कि जांच पैनल के प्रमुख प्रसाद ने गवाह को पूछे जाने वाले प्रश्नों के बारे में ही नहीं बताया बल्कि उसे यह भी बताया कि उसे यह उत्तर देना चाहिए कि उसने कोई लापता दस्तावेज नहीं देखा।

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