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12 घंटे में बांग्‍लादेशी कमांडोज ने खत्‍म किया मिशन, क्‍या ढ़ाका जैसे हमले के लिए तैयार है भारत?

इन हमलों से निपटने के मामले में हम कितने तैयार हैं, पठानकोट अटैक उस दिशा में एक बड़ा अलर्ट था। हमारे देश की सबसे एलीट फोर्सेज में से एक एनएसजी खाली इमारत में आतंकियों से 48 घंटे तक मुकाबला करती रही।

Author नई दिल्‍ली | Updated: July 2, 2016 2:15 PM
भारत को राज्‍य के SWAT यूनिट्स की तैयारियों और ट्रेनिंग का मूल्‍यांकन के लिए पूरे देश में एक समान पैमाना बनाने की जरूरत है।

पड़ोसी मुल्‍क बांग्‍लादेश में एक पॉश रेस्‍तरां पर मुंबई के 26/11 स्‍टाइल में हुए आतंकी हमले के बाद रेस्‍क्‍यू मिशन पूरा हो चुका है। 12 घंटे से थोड़ा ज्‍यादा वक्‍त में कमांडोज ने 6 आतंकियों को मार गिराया। 13 बंधक छुड़ाए गए, जबकि 20 के मारे जाने की खबर है। सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि भारत क्‍या इस तरह के हमलों से निपटने के लिए सक्षम है? हाल ही में इस्‍तांबुल के अतातुर्क एयरपोर्ट की बात हो या पेरिस के बटाक्‍लान थियेटर या ओरलैंडो के पल्‍स नाइट क्‍लब पर हमला, दुनिया भर में हुए इन वारदात से यह तो साफ है कि आधुनिक शहरों को निशाना बनाना कितना आसान है। इस तरह से हत्‍याएं करना नया नहीं है। याद कीजिए, 2004 में चेचन्‍य विद्रोहियों ने रूस के बेसलान में एक स्‍कूल में बंधक बनाए 330 लोगों को मार डाला था। इनमें से 186 बच्‍चे थे।

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इस्‍लामिक स्‍टेट ने ढाका हमले की जिम्‍मेदारी ली है। उन्‍होंने कैफे के अंदर के हत्‍याकांड की तस्‍वीरें वेबसाइट पर डाली हैं। यह कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है। अप्रैल में इस्‍लामिक स्‍टेट की मैगजीन दाबिक ने एक बांग्‍लादेशी इस्‍लामिक स्‍टेट कमांडर का इंटरव्यू छापा था। इस कमांडर ने हमले की कसम खाई थी। इस्‍लामिक स्‍टेट ने हाल के महीनों में दर्जनों हमले किए हैं। इनमें हिंदुओं, बौद्ध, शिया मुसलमानों और सरकार तक को निशाना बनाया गया।

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भारतीय पुलिस, सुरक्षा बलों और प्रशासनिक अधिकारियों को आज कुछ वक्‍त एक बड़े सवाल का जवाब सोचने में खर्च करना चाहिए। आप अपनी जनता को हॉली आर्टिसन कैफे (ढाका) में हुई वारदात जैसे हमलों से कैसे बचाएंगे? भारत के बड़े शहर ऐसे लक्ष्‍यों से भरे पड़े हैं। चाहें वे शॉपिंग मॉल हों, मूवी थियेटर हों या फिर पॉश रेस्‍तरां। ऐसी हर जगह पर आतंकी लोगों को बंधक बना सकते हैं। 26/11 जैसी राष्‍ट्रीय आपत्‍त‍ि कभी भी दस्‍तक दे सकती है।

सच्‍चाई यही है कि ऐसे सवाल का हमारे पास माकूल जवाब नहीं है। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि बहुत कुछ ऐसा है जो किया जा सकता है, लेकिन हम नहीं कर रहे हैं। सालों हो गए, सरकार ने बिजनेस कंपनियों को प्राइवेट सिक्‍युरिटी में निवेश करने के लिए प्रोत्‍साहित किया। होटल्‍स और मॉल्‍स की गेट पर खड़े गार्ड बस मानसिक तौर पर सुरक्षा की भावना पैदा करते हैं। वे विस्‍फोटकों को तलाशने या दूसरे सिक्‍युरिटी ड्र‍िल्‍स के मामले में दक्ष नहीं होते। कहना गलत नहीं होगा कि उनमें हथियारबंद हमलावरों से मुकाबला करने की ट्रेनिंग नहीं है।

आतंकी हमलों से निपटने का सबसे बड़ा तरीका यही है कि इनका सबसे पहले सामना करने वालों को अच्‍छी ट्रेनिंग मिले। यानी पुलिसवाले जो किसी भी ऐसे हमले पर मौके पर सबसे पहले पहुंचते हैं। भारत में यही सबसे कमजोर कड़ी है। लेकिन संसाधनों की कमी की वजह से सड़कों पर मौजूद इन पुलिसवालों में से सिर्फ 5 फीसदी ही किसी ट्रेनिंग से साल भर में गुजरते हैं। अधिकतर राज्‍यों में तो 99 प्रतिशत पुलिसवालों को किसी बेहतर फायरिंग रेंज में योग्‍य ट्रेनर के जरिए तालीम मयस्‍सर नहीं होती।

अब बात करें स्‍पेशनल फोर्सेज की। ब्रिटिश ट्रेनिंग वाले बांग्‍लादेशी SWAT टीम ने अच्‍छा प्रदर्शन किया। उन्‍होंने अधिकतर बंधकों को छुड़ाया और आतंकियों को मार गिराया। इंडिया की बात करते हैं। महाराष्‍ट्र की फोर्स 1 इस तरह के हालता से निपटने के लिए ही बनाई गई थी। फोर्स वन के पास भी अपनी फायरिंग रेंज नहीं है। देश के दूसरे हिस्‍सों में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। उदाहरण की तरह पंजाब की बात करें तो उन्‍हें फंड्स की कमी की वजह से अपने कमांडोज की ट्रेनिंग बंद करनी पड़ी।

भारत को राज्‍य के SWAT यूनिट्स की तैयारियों और ट्रेनिंग का मूल्‍यांकन के लिए पूरे देश में एक समान पैमाना बनाने की जरूरत है। ऐसा न होने तक किसी संकट के तबाही में बदलने का पूरा अंदेशा है। इन हमलों से निपटने के मामले में हम कितने तैयार हैं, पठानकोट अटैक उस दिशा में एक बड़ा अलर्ट था। हमारे देश की सबसे एलीट फोर्सेज में से एक एनएसजी खाली इमारत में आतंकियों से 48 घंटे तक मुकाबला करती रही।

आला दर्जे की पुलिसिंग से कोई चमत्‍कार नहीं हो जाएगा कि इससे मदद मिलेगी। मुंबई हमलों के बाद बेहतरीन इंटेलिजेंस नेटवर्क की वजह से कई मौकों पर ऐसे किसी बड़े आतंकी हमले को रोकने में किस्‍मत से कामयाबी मिली है। हालांकि, ऐसा वक्‍त भी आ सकता है जब आतंकियों के मंसूबे कामयाब हों, ऐसे में भारतीय पुलिस फोर्सेज का तैयार रहना बेहद जरूरी है।

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