...तो क्या सीबीएसई दायरा लांघ रहा है? - Jansatta
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…तो क्या सीबीएसई दायरा लांघ रहा है?

सीबीएसई अपने कई निर्णयों के कारण हाल में स्कूल संचालकों की आलोचना का शिकार रहा और आरोप लगे कि बोर्ड अपने उद्देश्य से भटक रहा है।

Author नई दिल्ली | June 8, 2017 4:49 AM
दिल्ली में सीबीएसई से जुड़े सरकारी स्कूलों के पास प्रतिशत में कोई बडा़ बदलाव नहीं आया है।

स्कूलों में प्राध्यापकों की बहाली या उनके सेवानिवृति संबंधी सर्कुलर हों या इस अप्रैल में दर्जन भर से ज्यादा स्कूलों को नोटिस और कई के खिलाफ कार्रवाई… सीबीएसई अपने कई निर्णयों के कारण हाल में स्कूल संचालकों की आलोचना का शिकार रहा और आरोप लगे कि बोर्ड अपने उद्देश्य से भटक रहा है। लेकिन सीबीएसई के खिलाफ दायरे के उल्लंघन की आवाजें केवल स्कूल संचालकों की तरफ से नहीं उठीं, अप्रैल में ही राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने बोर्ड को पत्र लिखकर उसकी भूमिका पर सवाल खड़ा किए। तो क्या देश के लगभग 18,000 स्कूलों की माध्यमिक शिक्षा का कमान संभाल रहे बोर्ड के कामकाज की समीक्षा कर उसे सुव्यवस्थित करने की जरूरत है? एनसीपीसीआर के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने कहा, ‘शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून आने के बाद से अभी तक सीबीएसई की कार्यशैली की किसी ने समीक्षा नहीं की है। अब आरटीई कानून के कार्यान्वयन की निगरानी एजंसी होने की हैसियत से आयोग इस बात की समीक्षा कर रहा है कि सीबीएसई की भूमिका क्या होनी चाहिए और इसे हम सरकार के समक्ष रखेंगे। ऐसा करने के पीछे आयोग के अपने तर्क हैं। लेकिन, आयोग से इतर सीबीएसई की भूमिका के बारे मे विशेषज्ञों और स्कूल संचालकों की जो राय है, उससे कई चीजें स्पष्ट होती हैं।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक और शिक्षाविद् प्रो. जे. एस. राजपूत ने मॉडरेशन नीति संबंधी का उदाहरण देते हुए कहा, ‘इस तरह का निर्णय ऐसे समय नहीं लिया जाता जब परीक्षा परिणाम आने वाला है, इससे असमंजस की स्थिति बनी, पंजाब बोर्ड ने मॉडरेशन नहीं किया, जबकि सीबीएसई ने खुद किया। वाकई में यह एनसीईआरटी का काम है, उसके पास एक विभाग है डिपार्टमेंट आॅफ मेजरमेंट एंड इवैल्युएशन। यह विभाग अनुसंधान के बाद तय करता कि मॉडरेशन होनी चाहिए या नहीं, और होगी तो कैसे होगी।’ माउंट कार्मल स्कूल्स के डीन डॉ माइकल विलियम्स का कहना है, ‘जब से सीबीएसई के नय अध्यक्ष ने कार्यभार संभाला है, बोर्ड स्कूलों को इस तरह से नियंत्रित करने की कोशिश में लगा है कि मानों वह राज्य के शिक्षा निदेशालय से उपर है, चाहे सेवानिवृत्ति के उम्र की बात हो, या स्कूल वर्दी की दुकानों की या ट्यूशन फीस की, वह अपना दायरा लांघ रहा है।’
प्रियंक कानूनगो कहते हैं, ‘केन्द्र ने अकादमिक अधिकार एनसीईआरटी को दिए हैं और राज्यों में यह एससीईआरटी के पास है। वहीं राज्यों में परीक्षा के लिए बोर्ड होते हैं वैसे ही सीबीएसई का काम केवल परीक्षा संचालन करना है और उसके लिए स्कूलों को संबद्धता देना है। लेकिन, वर्ष 2011-12 से एनसीईआरटी की भूमिका दबती चली गई है।

सीबीएसई स्कूलों के खिलाफ बाल अधिकारों के उल्लंघन की भी कई शिकायतें मिली हैं, वो सीबीएसई से संबद्धता के लिए राज्यों से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेते हैं, लेकिन राज्य सरकारों की बातें नहीं मानते हैं चाहे वह फीस नियमन की बात हो या लू के दौरान स्कूल बंद करने का आदेश। सीबीएसई को समझना होगा कि उससे संबद्ध स्कूलों पर राज्य सरकार द्वारा निर्धारित सभी नियम लागू होंगे। आयोग का मानना है कि प्राथमिक स्तर पर सतत एवं समग्र मूल्यांकन (सीसीई) के उद्देश्य को सीबीएसई ने केवल गलत समझा बल्कि सीसीई पर कक्षा 6 -8वीं के लिए ‘शिक्षकों का मैन्युअल’ में मूल्यांकन का प्रारूप तय कर अपने माध्यमिक शिक्षा के दायरे से बाहर जाने और एनसीईआरटी के काम में दखल की कोशिश की। कानूनगो के मुताबिक इन विसंगतियों के कारण उत्पन्न स्थितियां शिक्षा के लिए खतरनाक हैं।नीट, जेईई, यूजीसी जैसी परीक्षाओं का बोझ उठा रहे सीबीएसई पर प्रो. राजपूत कहते हैं यह अपने माध्यमिक शिक्षा के उस उद्देश्य से भटक गया है, जहां नवाचार, नए अभ्यास और एक सुव्यवस्थित परीक्षा संचालन के माध्यम से शिक्षा की गतिशीलता को बनाए रखने की जरूरत है।

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