इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनई की मौत हो गई। इस हमले में ईरान के कई बड़े अधिकारियों की भी मौत हुई है। ईरान ने भी पलटवार किया है। खामेनई की मौत के बाद कश्मीर से लेकर भारत के कई शहरों में शिया समुदाय ने विरोध प्रदर्शन किया। कश्मीर मुद्दे पर ईरान का रुख मिला-जुला रहा है। 1990 के दशक में ईरान ने एक बार कश्मीर मुद्दे पर भारत का साथ दिया था।

भारत के लिए हमेशा महत्वपूर्ण है ईरान

हालांकि अगर देखा जाए तो भारत का ईरान के साथ रिश्ता पारस्परिक हितों पर टिका रहा है। लेकिन भारत की क्षेत्रीय कूटनीति के लिए ईरान हमेशा से एक महत्वपूर्ण देश रहा है। कई बार खुले तौर पर ईरान ने पाकिस्तान की आलोचना भी की है, जिससे भारत को ताकत मिली है। कश्मीर को लेकर कई मुद्दों पर ईरान और उसके नेता रहे अयातुल्लाह खामेनई ने ऐसी बातें कही हैं, जिसे भारत ने नकार दिया।

पहलवी शाह करते थे पाक का खुला समर्थन

जब ईरान सेकुलर था और पहलवी शाह शासन करते थे, तब वह खुलेआम पाकिस्तान का समर्थन करते थे और कश्मीर मुद्दे पर भारत का विरोध करते थे। लेकिन जब इस्लामी क्रांति आई और अयातुल्लाह खोमैनी ने सत्ता संभाली उसके बाद से ईरान ने अपनी विदेश नीति को संतुलित कर लिया। इससे नुकसान पाकिस्तान को हुआ।

कश्मीर पर ईरान की नीति

1989 में जम्मू और कश्मीर में हिंसा भड़कने के साथ ही ईरानी अधिकारियों के सामने पहली चुनौती यह थी कि वे भारत और पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को संतुलित करते हुए कश्मीर नीति कैसे तैयार करें। इसलिए शीर्ष नेतृत्व ने किसी भी पक्ष का समर्थन करने से परहेज किया और लोगों की पीड़ा पर अपनी प्रतिक्रिया सीमित रखी। ईरान की विदेश नीति में यहीं से बड़ा बदलाव दिखा। ईरान ने तब किसी विवादित राजनीतिक समाधान का समर्थन नहीं किया।

1990 में अयातुल्ला खामेनेई ने कहा था, “देखिए दुनिया में जहां भी मुस्लिम समुदाय है, उनके साथ दूसरों की तुलना में कहीं अधिक कठोर व्यवहार किया जाता है। कश्मीर इसका एक समकालीन उदाहरण है। वहां मुसलमान अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं। कश्मीर में जो कुछ हुआ है, उससे अवगत कोई भी व्यक्ति जानता है कि कश्मीर के मुसलमान जो कहते हैं वह सत्य और न्याय के सिवा कुछ नहीं है। जो लोग उन्हें चुप कराते हैं, उनका मकसद अन्यायपूर्ण है। जो लोग उन पर हमला करते हैं, वे ही गलत काम कर रहे हैं। विडंबना यह है कि दुनिया इन सब को निर्मम भाव से देख रही है।”

भारत की ईरान ने की थी मदद

अगर हम देखें तो ईरान की सीमा पाकिस्तान से लगती है और यह शिया मुल्क है। ईरान पाकिस्तान को अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया से व्यापार करने से रोकने में भी मदद करता है। 1990 के दशक में पाकिस्तान भारत के खिलाफ कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव लाना चाहता था। अगर वह सफल हो जाता तो भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगा सकते थे, तब देश के प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव थे। ऐसे में उन्होंने ईरान की तरफ रुख किया और विदेश मंत्री दिनेश सिंह को ईरान भेजा।

ईरान के विदेश मंत्री भारतीय विदेश मंत्री को रिसीव करने के लिए एयरपोर्ट आए और ईरान के राष्ट्रपति को संदेश दिया गया। इसके बाद OIC में ईरान ने पाकिस्तान की ओर से लाया गया प्रस्ताव का समर्थन ही नहीं किया। पाकिस्तान की ओर से पेश किए गए प्रस्ताव में भारत पर कश्मीर में मानवधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था और प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। इसी प्रकार से यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र में आ ही नहीं पाया।

370 पर खामेनई ने की थी भारत की आलोचना

हालांकि इसके बाद अन्य मुद्दों पर अयातुल्लाह अली खामेनई कई बार भारत की आलोचना कर चुके हैं। जब जम्मू कश्मीर से धारा 370 खत्म की गई, तो उसके बाद अयातुल्लाह अली खामेनई ने लिखा था, “हम कश्मीर में मुस्लिमों की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। हमारे और भारत के बीच रिश्ते अच्छे हैं। लेकिन भारत एक न्यायपूर्ण नीति अपनाए और क्षेत्रीय मुस्लिमों के प्रति अत्याचार को रोके।”

इसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ा विरोध जताया था और कहा था कि किसी भी देश को भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी से पहले अपनी खुद की स्थिति और रिकॉर्ड को देखना चाहिए। हालांकि जब OIC की बैठक हुई तब कई बार ईरान ने पाकिस्तान की भाषा पर आपत्ति जताई और भारत के साथ संवाद पर जोर दिया। इसके बाद भारत को OIC की बैठक में आमंत्रित किया गया। पाकिस्तान ने इसका विरोध किया लेकिन ईरान ने खुले तौर पर इसका समर्थन किया। ऐसे में ईरान की नीति भारत को लेकर कभी भी स्पष्ट नहीं रही है। कई बार ईरान ने खुलकर विरोध जताया है तो कई बार समर्थन भी किया है। पढ़ें जब अयातुल्लाह अली खामेनेई भारत आए

(यह भी पढ़ें- अपने पड़ोसी देशों के साथ ईरान के रिश्ते तनावपूर्ण क्यों हैं?)

अमेरिका और इजरायल के हमलों के चलते ईरान अपने वर्तमान शासन पर एक गंभीर खतरे का सामना कर रहा है। वह सात देशों के साथ सीमा साझा करता है। दो पड़ोसियों को छोड़ दें तो अन्य 5 के साथ ईरान के रिश्ते काफी जटिल और तनावपूर्ण ही माने जाते हैं। पढ़ें पूरी खबर