राजधानी दिल्ली में प्रदूषण की स्थिति पिछले कई सालों से चिंताजनक बनी हुई है। तमाम सरकारी एजेंसियां मौसम, गाड़ियां और पराली को प्रदूषण के लिए दोष देती रहती हैं, लेकिन एक ऐसा कारण भी है जिसे लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है और जिसे आसानी से काफी हद तक ठीक किया जा सकता है। इस कारण का नाम है धूल, यानी डस्ट पॉल्यूशन।

इंडियन एक्सप्रेस ने मार्च 2025 से लेकर मार्च 2026 तक एक विस्तृत पड़ताल की। इसमें दिल्ली में सड़कों की सफाई में इस्तेमाल होने वाली मशीनों, यानी Mechanical Road Sweeping Machines (MRSMs) की कार्यक्षमता का विश्लेषण किया गया। उनकी लोकेशन, रूट और काम करने का पूरा डेटा इकट्ठा किया गया।

धूल क्या है, कैसे बनती है?

जानकारी के लिए बता दें कि सड़कों पर मिलने वाली धूल PM10 और PM2.5 जैसे छोटे कणों से जुड़ी होती है। PM10 यानी अपेक्षाकृत बड़े धूल कण, जबकि PM2.5 बेहद छोटे कण होते हैं, जो सीधे फेफड़ों और खून तक पहुंच जाते हैं। डॉक्टर मानते हैं कि इन्हीं छोटे कणों की वजह से सांस की बीमारियां, अस्थमा, हार्ट प्रॉब्लम्स और कैंसर तक का खतरा बढ़ जाता है।

इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आया कि केंद्र सरकार और Commission for Air Quality Management (CAQM) ने अपनी रिपोर्ट में माना था कि दिल्ली की सड़कों को साफ करने के लिए 505 मशीनों की आवश्यकता है। लेकिन वर्तमान में सिर्फ 76 मशीनें ही मौजूद थीं। इनमें से 52 मशीनें MCD के पास थीं जबकि बाकी दूसरी एजेंसियों के पास थीं।

बाद में जरूरत बढ़ने पर MCD ने 14 नई मशीनें खरीदीं। NDMC के बेड़े में भी पांच नई मशीनें जोड़ी गईं, लेकिन इसके बाद भी कुल संख्या सिर्फ 95 तक पहुंच पाई। यानी जरूरत की तुलना में अब भी मशीनों की भारी कमी बनी हुई है।

505 मशीनों की जरूरत, कितनी इस्तेमाल?

भारत सरकार ने 505 मशीनों का आंकड़ा भी एक तय प्रक्रिया के आधार पर निकाला था। उनके अनुसार छोटी सड़कों के लिए 246 मशीनों, मध्यम सड़कों के लिए 91 मशीनों और बड़ी सड़कों के लिए 168 मशीनों की जरूरत है। इस तरह कुल संख्या 505 बनती है।

इन मशीनों से सड़कों की सफाई कैसे होगी, इसकी भी एक तय प्रक्रिया है। अगर किसी सड़क पर डिवाइडर नहीं है तो 1 किलोमीटर सड़क की सफाई के लिए मशीन को 2 किलोमीटर तक चलना पड़ता है। वहीं अगर सड़क पर डिवाइडर है तो 1 किलोमीटर सड़क के लिए 4 किलोमीटर तक सफाई करनी पड़ती है क्योंकि दोनों किनारों को साफ करना होता है।

इंडियन एक्सप्रेस की जांच में यह भी सामने आया कि मार्च 2026 में सिर्फ 15 रूट ही सक्रिय दिखाई दिए। सर्दियों में ज्यादा सफाई होने के भी अपने कारण सामने आए हैं। उस समय AQI खराब होता है, मीडिया में लगातार चर्चा होती रहती है और राजनीतिक दबाव भी बढ़ जाता है। ऐसे में मशीनें ज्यादा चलने लगती हैं। लेकिन जब असली धूल वाले महीने यानी गर्मियां आती हैं तब सफाई कम दिखाई देती है।

कौन से मौसम में कितनी इस्तेमाल मशीनें?

आंकड़े बताते हैं कि गर्मियों में औसतन 1629 किलोमीटर की सफाई की गई। मानसून के दौरान यह आंकड़ा 1284 किलोमीटर रहा। पोस्ट-मानसून में यह बढ़कर 2231 किलोमीटर तक पहुंच गया, जबकि दिसंबर में 2591 किलोमीटर की सफाई दर्ज की गई। इसके बाद मार्च 2026 में यह घटकर सिर्फ 1043 किलोमीटर रह गई।

जानकारी के लिए बता दें कि MCD ने पूरी दिल्ली को 12 जोन में बांट रखा है। सबसे ज्यादा मशीनें सेंट्रल और साउथ दिल्ली में चल रही हैं। वहीं नरेला, नजफगढ़, शाहदरा नॉर्थ, सिविल लाइंस और करोल बाग जैसे इलाकों को काफी हद तक नजरअंदाज किया गया है।

VIP कल्चर यहां भी पहुंच गया!

VIP इलाकों को स्पष्ट फायदा मिलता दिखाई दे रहा है। एक MCD अधिकारी ने खुद इस बात को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि जहां ज्यादा VIP रहते हैं, वहां मशीनें भी ज्यादा भेजी जाती हैं। उदाहरण के लिए सेंट्रल जोन।

जांच में एक और बड़ा पैटर्न सामने आया। मशीनें बार-बार उन्हीं जगहों पर घूमती रहीं। सिर्फ 5 रूट्स पर कुल काम का लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा हुआ। वहीं 15 रूट्स पर एक-तिहाई मशीनें लगा दी गईं।

जिन इलाकों में मशीनों की सबसे ज्यादा आवाजाही देखी गई, उनमें वजीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया, मॉडल टाउन, सीलमपुर, दिलशाद गार्डन और ओखला इंडस्ट्रियल एरिया शामिल हैं।

दिल्ली में गर्मियों के दौरान सिर्फ 51.5 प्रतिशत बड़ी सड़कों की सफाई हो पाई। नवंबर में यह आंकड़ा करीब 60.5 प्रतिशत तक पहुंचा, लेकिन मार्च 2026 में फिर गिरकर 41.24 प्रतिशत रह गया।

IIT कानपुर और TERI की रिपोर्ट भी एक अहम बात बताती है। दोनों रिपोर्टों के मुताबिक दिल्ली के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण धूल ही बनी हुई है। TERI की रिपोर्ट के अनुसार गर्मियों में PM2.5 का 38 प्रतिशत हिस्सा धूल से आता है, जबकि PM10 का 41 प्रतिशत हिस्सा भी धूल की वजह से होता है।

TERI की रिपोर्ट यह भी बताती है कि सड़कों पर काम करने वाली MRSM मशीनें PM10 के 80 प्रतिशत तक कणों को हटाने में सक्षम हैं। रिपोर्ट में इंदौर का उदाहरण भी दिया गया है, जहां इन मशीनों के इस्तेमाल से धूल का स्तर 145 mg/Nm3 से घटकर 75-80 mg/Nm3 तक पहुंच गया।

दिल्ली के सामने बड़ी चुनौतियां

लेकिन दिल्ली में यह मॉडल उतना सफल नहीं हो पाया। इसके पीछे कई वजहें बताई गई हैं। सबसे बड़ी समस्या प्लानिंग फेलियर की रही। जरूरत का सही अनुमान समय पर नहीं लगाया गया। फंडिंग की कमी भी एक बड़ी चुनौती बनी रही। वहीं जो मशीनें मौजूद थीं, उनका भी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाया।

साल 2025 में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने भी इस मामले का संज्ञान लिया था। PMO ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि मशीनों की खरीद तेज की जाए। एक बैठक में यह तक कहा गया था कि पूरे NCR को 1000 अतिरिक्त मशीनों की जरूरत है।

लेकिन इतने निर्देशों के बावजूद भी दिल्ली के हर क्षेत्र को समान प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। इंडियन एक्सप्रेस ने जब MCD अधिकारियों से बात की तो उन्होंने खुलकर कहा कि कुछ जोन में PWD की सड़कें ज्यादा हैं, इसलिए वहां मशीनों की आवाजाही भी ज्यादा दिखाई देती है।

उन्होंने आगे कहा कि कई बार वरिष्ठ अधिकारियों के कहने पर मशीनें उनके जोन में भेज दी जाती हैं। सेंट्रल जोन में कई VIP आवास हैं, इसलिए वहां ज्यादा मशीनें पहुंचती हैं। एक दूसरे अधिकारी ने यह भी कहा कि जहां ट्रैफिक ज्यादा होता है, उदाहरण के लिए रिंग रोड, वहां सफाई मशीनें अधिक भेजी जाती हैं।

नई मशीनों की खरीद को लेकर भी MCD ने बयान दिया। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एक अधिकारी ने कहा कि पिछले महीने छह नई MRSM मशीनें खरीदी गई हैं। हर मशीन की कीमत लगभग 58.69 लाख रुपये है।

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