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धर्मविहीन राजनीति विनाशकारी है: हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत

मेरी निजी राय है कि बिना धर्म के राजनीति विनाशकारी है। लेकिन, इसके साथ ही मैं यह कहना चाहूंगा कि पहले यह समझें कि धर्म क्या है।

आचार्य देवव्रत का संघ और भाजपा से कोई सीधा नाता नहीं रहा है।

अगर कहीं गाय हिंसा और भेदभाव के विमर्श में शामिल हो गई है तो आचार्य देवव्रत के दर्शन में यह वैसी जीवनरेखा है जो किसान, समाज और सियासत को जोड़ती है। 18 जनवरी 1959 को हरियाणा के पानीपत के संभालखा कस्बे के पावती गांव में जन्मे डॉक्टर देवव्रत तीन दशक से ज्यादा समय तक गुरुकुल कुरुक्षेत्र में प्रोफेसर रहे। बचपन में सुभाष के नाम से जाने जाते थे लेकिन स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों से प्रभावित होकर आर्यसमाज से जुड़े और देवव्रत के नाम से जाने गए। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल के रूप में उन्होंने कई धारणाओं को तोड़ने का काम किया है। एक आम धारणा है कि राज्यपाल के पास कोई काम नहीं होता तो सामाजिक कार्यों में जुटे रहने वाले सूबे के महामहिम के पास एक मिनट का भी समय नहीं है। सत्ता पक्ष और राज्यपाल दो विपरीत विचारधारा के हों तो संघर्ष स्वाभाविक माना जाता है लेकिन कांग्रेस की सरकार में धार्मिक विचारधारा और गुरुकुल से जुड़े आचार्य कब समावेशी माहौल बना गए, पता ही नहीं चला। जिसका अंजाम यह है कि राज्यपाल के उठाए नशामुक्ति अभियान के साथ राज्य सरकार मजबूती से जुटी है। आचार्य देवव्रत का संघ और भाजपा से कोई सीधा नाता नहीं रहा है। धर्मविहीन राजनीति को विनाशकारी मानने वाले हिमाचल के राज्यपाल आचार्य देवव्रत से जनसत्ता के कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज की बातचीत के अंश।

हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि धर्मविहीन राजनीति विनाशकारी है। जनसत्ता के साथ विशेष बातचीत में देवव्रत ने कहा कि यह कहते हुए उन्हें तनिक भी संकोच नहीं है कि धर्म और राजनीति में सामंजस्य बिठा कर ही कल्याणकारी राज्य की स्थापना की जा सकती है। ऐसे माहौल में जबकि पक्ष के साथ विपक्ष पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं तो देवव्रत इसका उपाय भी धर्मयुक्त राजनीति को ही बताते हैं। धर्म के आधार पर ही पक्ष और विपक्ष को एक साथ लाकर जनता के कल्याण की राह पर चला जा सकता है। देवव्रत गैरराजनीतिक पृष्ठभूमि से चुने गए राज्यपाल हैं। करीब दो साल पहले हिमाचल का जिम्मा दिए जाने से पहले उनका राजनीति से कोई सरोकार नहीं था और वे हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अपना एक ‘गुरुकुल’ चलाते थे। धर्म और राजनीति पर उनका यह बयान आज के माहौल में खासा अहम है। धर्म और राजनीति की सहभागिता और दोनों का अनुपात आज हमारे बीच बहस का सबसे बड़ा विषय है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ के चयन ने इस बहस को और तेज कर दी है। अपने गठन के समय से ही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर धर्म और राजनीति की खिचड़ी पकाने का आरोप है। केंद्र सरकार और राज्य की भाजपा सरकारें जिस तरह से गीता और गाय पर जोर दे रही है उसे भी इस दिशा में उठाया अहम कदम माना जा रहा है। यह भी तय है कि सरकार ने खुल कर शिक्षा के भगवाकरण की बात कबूल की है।

देवव्रत कहते हैं कि धर्म और राजनीति पर कोई बयान देने से पहले वे यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि धर्म क्या है? उनका कहना है कि हमने धर्म को कुछ चिह्नों में समेट कर रख दिया है। धर्म को मंदिर-मस्जिद, गुरुद्वारा या गिरजाघर की चौहद्दियों तक घेर दिया गया है। कोई यह खाता है या वह पहनता है तो ये निशानियां धर्म की व्याख्या नहीं हैं।

देवव्रत कहते हैं कि जो आपकी आत्मा चाहती है वैसा ही दूसरों की आत्मा के लिए पैदा करना धर्म है। अपनी निशानियों से निकल कर दूसरों के लिए अपनी चाह जैसा ही करना धर्म है। उन्होंने कहा कि सत्तानशीनों के लिए जो राजधर्म की परिभाषा दी जाती है वह हिंदू-मुसलमान या ईसाई से बंधा हुआ नहीं है। इसका मकसद कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। यही सत्ता का भी लक्ष्य हो। हिमाचल के राज्यपाल के रूप में देवव्रत के पद संभालते ही प्रदेश की राजनीति में तूफान सा आ गया था। राज्यपाल के पद से जुड़े महज शिष्टाचार को दरकिनार करके उन्होंने आम लोगों से अपना सीधा नाता जोड़ा। उनके आने के बाद राजभवन में एक हवन-कुंड की स्थापना की गई जिसके उद्घाटन में स्वयं मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह उपस्थित रहे। फिलहाल राजभवन में एक गाय भी है जिसकी देखभाल खुद राज्यपाल करते हैं। खेती-किसानी से जुड़े रहे राज्यपाल ने राज्य के कृषि विश्वविद्यालयों को किसानों से सीधे जोड़ने के कई कदम उठाए हैं। कृषि विश्वविद्यालय के शोधार्थियों को किताबी कीड़ा बनाने के बजाए किसानों के पास भेजा। उनका कहना है कि बिना किसानों को ‘गाइड’ बनाए कृषि विश्वविद्यालय की हर पीएचडी अधूरी है।हिमाचल का अगुआ बनते ही देवव्रत ने नशामुक्त राज्य बनाने का अभियान छेड़ा। शुरू में तो सत्ता पक्ष ही यह मानने को तैयार नहीं था कि सूबे में ऐसी कोई समस्या है। लेकिन राज्यपाल की ईमानदार कोशिश का नतीजा है कि नशामुक्ति अभियान एक जनांदोलन बन गया है और सरकार भी पूरी तरह से साथ दे रही है। कांग्रेसी सरकार में ‘गुरुकुल वाले’ राज्यपाल की स्वीकृति उनके व्यक्तित्व को बयां करने के लिए काफी है।

सवाल : इन दिनों राजनीति, धर्म और शिक्षा को लेकर सबसे ज्यादा विवाद है? आप सियासत और धर्म के रिश्ते को कैसे देखते हैं?

’मेरी निजी राय है कि बिना धर्म के राजनीति विनाशकारी है। लेकिन, इसके साथ ही मैं यह कहना चाहूंगा कि पहले यह समझें कि धर्म क्या है। हमने हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई के कुछ चिह्न भर को धर्म मान लिया है। जो मैं अपने लिए चाहता हूं, वही दूसरों के लिए भी करूं यह भावना धर्म है। जो मेरी आत्मा को प्रिय है, वही दूसरों को दूं यही धर्म है। मैं चाहता हूं कि कोई मुझसे झूठा व्यवहार न करे तो मैं दूसरों से झूठा व्यवहार न करूं यही धर्म है। धर्म को धारण करने वाला सुखी हो, जो उसके संपर्क में आए वह भी सुखी हो। जो मैं अपने लिए चाहता हूं वह औरों के लिए पैदा करना। मेरे ख्याल में जितने भी धर्मावलंबी हैं, इस सिद्धांत से कोई दूर नहीं जा सकता है।

सवाल : शिक्षा, धर्म और खेती। इतने व्यापक दायरे में खुद को स्थापित कैसे कर पाए?
’मैं तीन दशक तक कुरुक्षेत्र के गुरुकुल में प्रधानाचार्य रहा। वहां पढ़ाई के साथ-साथ मेरे पास 200 एकड़ का एक फार्म था, वहीं मैंने गोशाला तैयार की। पढ़ते-पढ़ाते हुए मेरा दायरा समाज सुधार और शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ता गया। वहां मैं भारतीय किसान संघ का 10 साल तक अध्यक्ष रहा। किसानों के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत बनाने के लिए काम करता रहा। इसी के साथ स्कूल-कॉलेजों में शिविर लगवाना शुरू किया, नैतिक शिक्षा के लिए, योग के लिए। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अभियान छेड़ कर नौजवानों को उससे जोड़ता रहा। मेरा मानना है कि धर्मविहीन राजनीति विनाशकारी है।
सवाल : आर्यसमाज की पृष्ठभूमि से होने के कारण शिक्षा और समाज को लेकर आपका खास वैचारिक लगाव रहा जो आपके काम में दिख रहा है? आप इसे कैसे देखते हैं।
’मेरी पृष्ठभूमि आर्यसमाज से जुड़ी रही है। स्वामी दयानंद की अगुआई में आर्य समाज ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर अंधविश्वास, कुरीतियों और नारी-सशक्तीकरण के लिए काम किया। जाति-प्रथा के विरोध में समरसता का भाव पैदा करना और किसी भी प्रकार का ऊंच-नीच का भेदभाव समाज में न हो, यह स्वामी दयानंद की सोच थी। गौपालन में उन्नत नस्ल बना करके उन्हें समाज के लिए उपयोगी बनाना। इस तरह के कार्यक्रमों से मैं करीब 34-35 साल तक लगातार जुड़ा रहा। तो ऐसे समय में अचानक मुझे यहां जिम्मेदारी मिल गई।

सवाल : समाज सुधार के क्षेत्र में सक्रिय व्यक्ति एक ऐसे पद पर पहुंचता है जिसे रबर स्टैंप माना जाता है? और यहां आते ही आपने नशामुक्त प्रदेश की बात कर संस्थागत रूढ़िवादिता पर प्रहार किया। कितने सहज रहे आप?
’यहां आते ही मैंने नशामुक्त प्रदेश के लिए काम शुरू किया। स्कूल से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालय और कई संस्थानों से जुड़ कर इसके खिलाफ आवाज उठाई। मेरे से पहले यहां नशे की बात कोई नहीं करता था। लोग मानने को भी तैयार नहीं थे कि प्रदेश इतनी गंभीर समस्या की चपेट में आ चुका है। मेरे अभियान शुरू करने के बाद अब सरकार भी इस विषय को मजबूती से उठा रही है। ऐसा कोई दिन नहीं बीत रहा जब नशे के कारोबारी या माफिया के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही हो। इसे लेकर जागृत होकर प्रदेश ने एक सकारात्मक कदम उठाया है।

सवाल : मोदी सरकार की कोई मुहिम जिसने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया?
’प्रधानमंत्री ने बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ की मुहिम हरियाणा के पानीपत से शुरू की थी। उस दिन उस कार्यक्रम को मैंने सुना। वहां से मैं कुरुक्षेत्र के लिए निकला और सवा घंटे के रास्ते में इसी के बारे में सोचता रहा। रास्ते में मैंने संकल्प किया कि भाषण तो सुन लिया, अब जमीनी काम करना चाहिए। उसी सवा घंटे के दौरान अंबाला में बेटियों का गुरुकुल स्थापित करने का फैसला किया। अब इसका तीसरा साल हो गया। अभी यहां बारहवीं का पहला बैच निकला है। हमारी कुल 71 बेटियां मेधा सूची में आर्इं। योग, प्राणायाम, नैतिक शिक्षा और पढ़ाई के साथ हम उन्हें बहुत मजबूत बना रहे हैं।

सवाल : स्वच्छता अभियान भी केंद्र सरकार का झंडाबरदार कार्यक्रम है। इसे लेकर आपका क्या रुख है?
’मैं जहां भी जाता हूं, गाड़ी में झाड़ू व सफाई का अन्य सामान जरूर रखता हूं। जहां जाता हूं वहां स्थानीय प्रशासन के लोग आते हैं, स्थानीय लोग मिलते हैं। सैकड़ों लोग हो जाते हैं, जिनके साथ मिलकर स्वच्छता अभियान चलाता हूं। गांव के लोगों को, बाजार में सबको इसके लिए जागरूक करता हूं।
सवाल : आपका खेती-किसानी पर काम रहा। आपने जो शून्य बजट खेती की धारणा दी है उसका क्या तात्पर्य है?
’इसका मतलब है कि प्रधानमंत्री जी ने जो योजना दी है कि किसान की आय दुगुनी होनी चाहिए, उसमें किसान की लागत नहीं रहेगी तो वह आय में जुड़ जाएगी। उदाहरण के लिए किसान शहर से उर्वरक, कीटनाशक और महंगे बीज खरीदता है। ऐसे में ओला पड़ जाए, तूफान आ जाए, फसल नष्ट हो जाए तो वह कर्ज कहां से उतारेगा। इसलिए किसान कर्जदार होता है और आत्महत्या की ओर बढ़ता है। इसलिए शून्य बजट खेती की बुनियाद रखी है। महाराष्टÑ के सुभाष पालेकर ने इस बारे में बहुत बड़ा अनुसंधान किया है। दक्षिण भारत में 40 लाख किसान इस खेती को करते हैं। मैंने इन्हें कृषि विश्वविद्यालय में बुलाकर चार दिन का शिविर लगाया। इस खेती को हमने दो कृषि विश्वविद्यालयों में लागू करवाया। किसानों का प्रशिक्षण शुरू कर दिया कि वे इसे आगे ले जाएं।

सवाल : खेती, किसानी, शिक्षा और सरकार को एक साथ जोड़ने में कोई परेशानी हुई?
’पिछले दिनों पालमपुर कृषि विश्वविद्यालय में मैंने एक मीटिंग बुलाई। वहां पिछले तीन सालों से ऐसी मीटिंग नहीं हुई, और अगर होती भी थी तो आधे घंटे में चाय पी और अपना टीए-डीए लेकर चले जाते थे। इस बार वह बैठक तीन घंटे चली। और उस बैठक में मैंने कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों और प्रशासन दोनों को आमने-सामने बिठाया। अब तक कृषि विश्वविद्यालय में यही होता था कि एक विद्यार्थी गाइड की देखरेख में पीएचडी कर लेता था और उसके बाद उसकी किताब आलमारी में बंद हो जाती थी।

सवाल : तो अब क्या बदलाव है?
’मैंने इसे बदल दिया। कोई भी विद्यार्थी पीएचडी करता है तो अपना विषय किसान को दे दे। विद्यार्थी जो किताब में लिखे उसका व्यावहारिक ज्ञान किसान के खेत में होना चाहिए। और यह किसान को महसूस होना चाहिए कि शोध ने फसल पैदावार में मेरी मदद की, मेरा काम आसान हुआ। बिना किसान को सहयोगी बनाए कृषि विश्वविद्यालय की पीएचडी कैसे हो सकती है?

सवाल : कृषि के क्षेत्र में फिलहाल शोध के माहौल को कैसे देखते हैं?
’यहां देश में खेती को उन्नत करने के लिए दो विभाग बने। एक तो एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और दूसरा एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट जो सरकार के नीचे काम करता है। और यह जो एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी है उसमें वैज्ञानिक शोध करते हैं। अभी जो शोध होता है वह विश्वविद्यालय तक सीमित हो जाता है। कृषि विभाग का काम यह था कि इन लोगों से रिसर्च लेकर उसे किसानों के खेत में लागू करे। मैंने इनसे पूछा कि आपसे मीटिंग हुई? उन्होंने बताया कि जब से यूनिवर्सिर्टी बनी आज तक नहीं हुई। तब मैंने वहां के एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट के सर्वोच्च अधिकारी और कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति से लेकर डीन सबको आमने-सामने बिठाकर कहा कि यह मीटिंग हर महीने होनी चाहिए। आपके जो शोध हों वह कृषि विभाग को मिलने चाहिए और विभाग उसे किसानों के हित में व्यावहारिक रूप से लागू करे।

सवाल : क्या राजभवन में पहुंचने के बाद काम करने में कोई बाधा महसूस हुई?
’मैं एक स्वतंत्र संस्थान से आया था और मुझे काम करने की पूरी आजादी थी। मैं शिक्षा के क्षेत्र में काम करता था। गाय की नस्ल सुधारने के लिए काम करता था। मेरे पास छह नस्लों की गायें थीं। इन नस्लों को मैंने अपने हाथों से उन्नत किया था। 39 किलो 200 ग्राम दूध देकर मेले में मेरी गाय अव्वल रही। अब तीस किलो से नीचे दूध देने वाली एक भी गाय मेरे पास नहीं है। फिर मुझे पता चला कि न्यूजीलैंड और आॅस्ट्रेलिया में ए1ए2 दूध पर अनुसंधान हुआ कि विदेशी गायों का दूध मानव शरीरों के लिए हानिकारक है। और भारतीय गायों का दूध उत्तम है स्वास्थ्य के लिए। इस तरह मैं इस पर लगातार काम करता हूं, और आगे भी करूंगा।

सवाल : इतने सक्रिय राज्यपाल को लेकर शासन और नौकरशाही का क्या रवैया रहा?
’मैंने एग्रीकल्चर विभाग को बुलाकर इससे देसी नस्ल को जोड़ दिया। इनकी पॉलिसी थी केवल एसएच और जरसी गाय की। भारतीय नस्ल की गायों को इन्होंने बिल्कुल नजरअंदाज किया था। विभाग के डॉक्टर ने माना कि यह गलत हो रहा है। यहां आकर सबसे पहले मैंने सरकार के सभी विभागों के प्रमुखों की बैठक बुलाई। ध्यान रखा कि यह बैठक मैंने मुख्यमंत्री की सहमति से बुलाई। बैठक बहुत कामयाब रही। सबने इस रूप में लिया कि अपने विभाग में मजबूती से काम करो। हमने तय किया कि आज लक्ष्य तय करो और तीसरे महीने उसकी रिपोर्ट की समीक्षा कर आगे बढ़ें। मेरी इस बैठक से खलबली मच गई कि राज्यपाल जी ने तो समानांतर सरकार खड़ी कर दी। उसके बाद कुछ समझदार लोग मिले। फिर मैंने भी संविधान देखा कि मेरे क्या-क्या अधिकार हैं? बाद में मैंने सामूहिक बैठक नहीं बुलाई, क्योंकि इनका विरोध हुआ जो अच्छा नहीं लगा। फिर कार्यशैली बदल कर मैंने विभाग से कुछ लोगों को बुलाना शुरू किया। इसके साथ-साथ मैंने अभियान शुरू कर दिया। मसलन नशा मुक्त प्रदेश बनाओ, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, वृक्षारोपण, जल संरक्षण, जैविक खेती, समरसता। इन बिंदुओं पर काम शुरू किए। ये सब प्रदेश के हिस्से थे। किसी तरह के विवाद की गुंजाइश नहीं थी।

सवाल : हिमाचल सरकार तो मान ही नहीं रही थी कि सूबे में नशे की समस्या है? एक राज्यपाल के तौर पर इस जंग का आगाज कैसे किया?
’मैंने 12 अगस्त 2015 को शपथ ली। और, 5 सितंबर को यहां पर शिक्षक दिवस का एक राज्यस्तरीय कार्यक्रम हुआ। उसमें पूरे प्रदेश के शिक्षक थे, इसलिए मैंने वहीं बातचीत शुरू कर दी। मैंने कहा कि हम अध्यापकों का कर्तव्य है कि अपने बच्चों को ड्रग्स की बुराई से बचाएं। और, जिम्मेदार नागरिकों की इस देवभूमि में ड्रग्स नहीं होना चाहिए। मुख्यमंत्री जी ने मुझसे सामान्य रूप से कहा कि यहां कोई ड्रग्स नहीं है, सामान्य रूप से लोग बीड़ी-सिगरेट पीते हैं। इससे ज्यादा कुछ भी नहीं है। किसी ने आपको गलत सूचना दे दी है। मैंने कहा कि मुझे तो यह रिपोर्ट मिली कि यहां ड्रग्स बहुत तेजी से फैल रहा है। इसकी गिरफ्त में छोटे बच्चे भी हैं। तब उन्होंने फिर कहा कि नहीं-नहीं किसी ने गलत प्रचार किया है। ऐसा कुछ भी नहीं है। मुख्यमंत्री से बातचीत के बाद उसी कार्यक्रम में दोपहर के भोजन के दौरान वहां मौजूद शिक्षिका मेरे पास आई। खाने की मेज के पास आने के बाद उसने बोला, ‘सर मैं कुछ बात कर सकती हूं’।
मैंने कहा, जरूर कीजिए। तो उसने कहा कि हमारे इलाके को भी बचाओ। वहां तो सातवीं-आठवीं के बच्चे भी नशे के शिकार हो गए हैं। छोटे-छोटे बच्चे भी नशे में डूब रहे हैं। और पूरा क्षेत्र बर्बाद हो रहा है। मैंने कहा, मुख्यमंत्री जी ये तो मैंने नहीं बोला जी, न कोई मेरा परिचय इनसे। मैंने कहा, जो गलती हो चुकी है उन सबको सुधारना हमारी जिम्मेदारी है। हमारे बच्चे बर्बाद हो रहे हैं। लेकिन आप इस बात को मजबूती से खारिज कर कह रहे हैं कि यहां नशा-वशा नहीं है। इसके बाद सरकार ने भी अपनी बड़ी मीटिंग बुलाई और पुलिस को बोला। और अब कोई दिन ऐसा नहीं होगा जब कहीं न कहीं धर-पकड़ न हो। ड्रग्स माफिया पर कोई कार्रवाई न हो। यह एक जबरदस्त आंदोलन बन गया।

सवाल : अब आप इस बात को लेकर आश्वस्त तो हैं न कि आपको लेकर यहां एक समावेशी माहौल बन गया है?
’जी बिलकुल। मैंने ईमानदारी से राज्य के कानून का पालन किया। प्रजा, प्रदेश और सार्वजनिक मुद्दों को अपना एजंडा बनाया है। लोग कहते हैं कि राज्यपाल की कोई भूमिका नहीं होती है। लेकिन मेरे पास तो समय ही नहीं है। राज्यपाल अगर सही से मध्यस्थ्ता करे तो बहुत से तनाव दूर हो सकते हैं। मेरे लिए अब कोई समस्या नहीं है। शासन कर रही पार्टी भी समझ चुकी है कि यह सिर्फ प्रदेश की भलाई के लिए काम करेगा।
सवाल : विपक्ष की बातों को अनसुना करने का चलन है? क्या पक्ष-विपक्ष के साथ मिलकर कल्याण की कोई राह नहीं निकल सकती।
’धर्मयुक्त राजनीति हो तो ऐसा बिलकुल संभव हो सकता है। दोनों पक्ष यह मान लें कि हम जनकल्याण के लिए हैं। अपने स्वार्थ से दूर हो जनता का कल्याण देखें।

 

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