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नाटक में समाज की तल्ख सच्चाइयां

आशीर्वाद रंगमंडल द्वारा आयोजित बिहार के प्रथम अंतर्राष्टीय थिएटर महोत्सव के तीसरे और अंतिम चरण में तीन नाटकों का मंचन किया गया।

(File Pic)

आशीर्वाद रंगमंडल द्वारा आयोजित बिहार के प्रथम अंतर्राष्टीय थिएटर महोत्सव के तीसरे और अंतिम चरण में तीन नाटकों का मंचन किया गया। पहली प्रस्तुति थी बांग्लादेश के थिएटर समूह ‘कैट’ की ‘द मेटामॉरफोसिस’, दूसरा आशीर्वाद रंगमंडल, बेगूसराय की ‘दो औरतें’ और समापन नाटक था नई दिल्ली के थिएटर समूह ‘संभव’ की प्रस्तुति ‘गरीब नवाज’।

‘द मेटामॉरफोसिस’ कहानी है एक घुमंतू सेल्समैन ग्रेगोर समसा की। एक दिन सुबह जब वह जागता है तो पाता है कि पिछली रात वह एक दैत्याकार कीड़े में तब्दील हो चुका है पर वह रोज की आदतों से अपने दिमाग को घिरा पाता है। ग्रेगोर का यह रूपांतरण न सिर्फ उसके लिए पीड़ा का सबब बन जाता है बल्कि उसके पूरे परिवार के लिए भी जो कि आर्थिक रूप से उसपर निर्भर है। उसका परिवार उसे शयनकक्ष में बंद कर देता है और उससे किसी भी प्रकार का संवाद नहीं स्थापित करता है। ग्रेगोर अपने पिता द्वारा दिए गए जख्मों की पीड़ा, उसकी यातना से गुजरता है, उसे भोगता है और उसे एक बेकार वस्तु की तरह घर के किसी एक कोने में फेंक दिया जाता है। उसके वजूद को नकार दिया जाता है।

ग्रेगोर की इस कहानी के बहाने फ्रांज काफ्का की कहानी को निर्देशक कमालुद्दीन नीलू ने कई तरह से, कई रूपों में व्याख्यायित किया है। वस्तुत: यह सामाजिक और आर्थिक मांगों के दायरे में एक चरित्र के अस्तित्ववादी कारावास की अभिव्यक्ति को उभारने का प्रयास है। नाटक का संगीत उम्दा था। वाद्ययंत्रों में बांसुरी और जाइलोफोन का इस्तेमाल किया गया था। ग्रेगोर की भूमिका में अभिनेता अबुल कलाम आजाद शेतु ने अच्छा अभिनय किया है लेकिन इब्सन के अपरंपरागत व्याख्याकार के रूप में निर्देशक कमालुद्दीन नीलू अपने जिस जादू के लिए जाने जाते हैं वह जादू इस नाटक में नहीं दिखा।

दूसरी प्रस्तुति युवा निर्देशक अमित रौशन द्वारा निर्देशित नाटक ‘दो औरतें’ थी। इस वर्ष के भिखारी ठाकुर पुरस्कार से सम्मानित युवा रंगकर्मी अमित राष्टीय थिएटर महोत्सवों का आयोजन करते आ रहे हैं। उनका नाटक ‘दो औरतें’ समाज में बढ़ते अपराध और आक्रामकता के खिलाफ एक प्रतिक्रियात्मक राजनीतिक प्रस्तुति थी। नाटक दो मांओं की उनके बच्चों के प्रति प्रेम को प्रदर्शित करता है जो अपराधी हैं। निर्देशक का मानना है कि जीवन सिर्फ परीकथा नहीं है या परीकथाओं जैसा नहीं है।

इसमें बहुत सी तल्ख सच्चाइयां भी हैं। उनका कहना है कि इस सीखने और स्वीकारने का ही एक छोटा-सा प्रतिफल है नाटक ‘दो औरतें’। नाटक में दोनों औरतों की आवाज को वाणी रिंटू कुमारी ने दी। उनका अभिनय और भावाभिव्यक्ति को उम्दा बनाने में इस नाटक के संगीत, विशेष रूप से गायन और प्रकाश व्यवस्था का बहुत योगदान है। गायन अवधेश पासवान का था और प्रकाश व्यवस्था थी अभिमन्यु विनय कुमार की।

इस समारोह का समापन नाटक था वरिष्ठ रंगकर्मी और राष्टÑीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक देवेंद्रराज अंकुर द्वारा निर्देशित नाटक ‘गरीब नवाज’-जो समाज के वर्ग-संघर्ष के बहाने एक शहर की पूरी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को उजागर कर देता है। इसमें केवल अमीर और गरीब के बीच का संघर्ष ही नहीं झलकता है बल्कि खुरदुरेपन और नजाकत के बीच, तल्ख हकीकत और नफासत के बीच व गंदगी और स्वच्छता के बीच का संघर्ष भी दिखता है।

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