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…जब IBM ऑफिस में बिना रिज्यूमे जॉब के लिए पहुंच गए थे रतन टाटा, जानिए पहली नौकरी में क्या काम करते थे टाटा

आपको जानकर हैरानी होगी कि जब उनको पहली नौकरी का ऑफर मिला था तो रतन टाटा के पास रेज्यूमे ही नहीं था। उन्होंने बताया, 'भारत आने के बाद मुझे IBM से ऑफर मिला। मैं वहां पहुंचा तो उन्होंने मेरा रेज्यूमे मांगा लेकिन मेरे पास नहीं था। उनके ऑफिस में इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर था। मैं वहीं पर बैठ गया और तुरंत अपना रेज्यूमे बनाकर उनको सौंपा।'

ratan tata, tata motors, tata groupटाटा ग्रुप के पूर्व चेयरमैन रतन टाटा। (फाइल फोटो)

टाटा ग्रुप के पूर्व चेयरमैन रतन टाटा भारत के सबसे मशहूर उद्योगपतियों में से एक हैं। वह अपने सॉफ्ट हार्ट के लिए भी जाने जाते हैं। उन्होंने न्यूयॉर्क की कोरनेल यूनिवर्सिटी से आर्किटेक्चर की डिग्री ली थी। वहां से भारत वापस आने के बाद उन्होंने तुरंत टाटा ग्रुप नहीं जॉइन किया था। उनकी स्कूली पढ़ाई मुंबई में ही हुई थी। हालांकि बीच में डेढ़ साल के लिए वह अमेरिका भी गए थे। वह शुरू में इंजिनियर ही बनना चाहते थे लेकिन बाद में वह उद्योग जगत में आ गये और आज दुनिया के बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट में से एक हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि जब उनको पहली नौकरी का ऑफर मिला था तो रतन टाटा के पास रेज्यूमे ही नहीं था। उन्होंने बताया, ‘भारत आने के बाद मुझे IBM से ऑफर मिला। मैं वहां पहुंचा तो उन्होंने मेरा रेज्यूमे मांगा लेकिन मेरे पास नहीं था। उनके ऑफिस में इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर था। मैं वहीं पर बैठ गया और तुरंत अपना रेज्यूमे बनाकर उनको सौंपा।’ हालांकि रतन टाटा ने IBM में नौकरी नहीं की थी।

1962 में रतन टाटा को टाटा इंडस्ट्रीज से नौकरी का ऑफर मिला। टाटा इंजिनियरिंगद ऐंड लोकोमोटिव कंपनी जमशेदपुर प्लांट में उनकी 6 महीने ट्रेनिंग हुई। इसके बाद वह टाटा स्टील कंपनी में चले गए। यहां वह लाइमस्टोन पत्थरों की सप्लाइ का काम मैनेज किया करते थे। 1969 में वह ऑस्ट्रेलिया में टाटा ग्रुप के रेजिडेंट रिप्रंजंटेटिव बन गए और भारत से बाहर चले गे। 1970 में वह भारत आए और टाटा कंसल्टेंसी सर्विस के साथ जुड़ गए।

इसके अगले साल ही रतन टाटा को नैशनल रेडियो ऐंड इलेक्ट्रॉनिक्स का डायरेक्टर इनचार्ज बना दिया गया। 1974 में वह टाटा सन्स के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में शामिल हो गए। 1975 में उन्होंने हारवर्ड यूनिवर्सिटी से अडवांस मैनेजमेंट प्रोग्राम पूरा किया। 1981 में उन्हें टाटा इंडस्ट्रीज का चेयरमैन बना दिया गया और कंपनी में उन्होंने बड़े परिवर्तन शुरू कर दिए। 1986 से 1989 तक वह एयर इंडिया के भी चेयरमैन रहे। 1991 में उन्होंने जेआरडी टाटा की जिम्मेदारी संभाली और टाटा ट्रस्ट, टाटा सन्स दोनों के चेयरमैन बन गए। यह समय था भारत में उदारीकरण का। इसका फायदा उठाकर उन्होंने कंपनी को रीस्ट्रक्चर कर दिया।

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