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वाम दलों के कड़े विरोध के बीच लोस में बीमा विधेयक पेश

वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस के कड़े विरोध के बीच सरकार ने बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाकर 49 फीसद तक करने वाले बीमा विधि संशोधन विधेयक 2015 को मंगलवार को लोकसभा में पेश कर दिया। वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस ने राजग सरकार पर इस विधेयक को लेकर संवैधानिक प्रक्रियाओं […]
वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस के कड़े विरोध के बीच सरकार ने बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाकर 49 फीसद तक करने वाले बीमा विधि संशोधन विधेयक 2015 को मंगलवार को लोकसभा में पेश कर दिया।

वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस के कड़े विरोध के बीच सरकार ने बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाकर 49 फीसद तक करने वाले बीमा विधि संशोधन विधेयक 2015 को मंगलवार को लोकसभा में पेश कर दिया। वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस ने राजग सरकार पर इस विधेयक को लेकर संवैधानिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। जबकि सरकार ने इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

वाम दलों के सदस्यों के विधेयक को पेश करने के चरण में मत विभाजन की मांग किए जाने के बाद सदन ने 45 के मुकाबले 131 मतों से विधेयक को पेश करने की मंजूरी प्रदान कर दी। इसके बाद वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने लोकसभा में विधेयक पेश किया।

वाम दलों की आपत्तियों को पूरी तरह से खारिज करते हुए संसदीय मामलों के मंत्री एम वेंकैया नायडू ने नियमों का हवाला देते हुए कहा कि अगर लोकसभा अध्यक्ष किसी विधेयक को पेश करने की इजाजत प्रदान करती हैं तो विधेयक पेश किया जा सकता है।

इसके साथ ही नायडू ने कहा कि जिस क्षण अध्यादेश पेश किया जाता है वह उसी क्षण कानून का रूप ले लेता है और अगले छह हफ्ते तक उसके तहत की जाने वाली कार्रवाई वैध है। उन्होंने कहा कि छह हफ्ते के भीतर उसे कानून का रूप देना अनिवार्य है और इस अध्यादेश के मामले में
यह समय-सीमा पांच अप्रैल को खत्म हो रही है।

उन्होंने संसदीय कार्यवाही के एक अन्य नियम का हवाला देते हुए कहा कि यह पूरी तरह स्थापित तथ्य है कि सरकार को किसी भी सदन में विधेयक पेश करने की आजादी है। यह विधेयक सरकार के इस संबंध में जारी अध्यादेश का स्थान लेने के लिए लाया गया है। वित्त राज्य मंत्री सिन्हा ने कहा कि सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र के दायरे के भीतर रहते हुए विधेयक पेश किया है और यह तय करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि छह हफ्ते के भीतर अध्यादेश कानून का रूप ले।

इससे पूर्व वाम दलों के सदस्यों ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि जब यही विधेयक राज्यसभा में लंबित है और सरकार ने उसे वापस नहीं लिया है तो समान विधेयक लोकसभा में कैसे पेश किया जा सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार एक गलत परंपरा की शुरुआत कर रही है और ऐसा पिछले 65 सालों में कभी नहीं देखा गया। उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है।

माकपा के पी करुणाकरन ने राज्यसभा में समान विधेयक के लंबित रहते लोकसभा में नया विधेयक पेश किए जाने का विरोध करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में यह विधेयक लोकसभा के अधिकार क्षेत्र में ही नहीं आता और न ही सदन के पास इस पर विचार करने की कोई शक्ति है। तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय ने विधेयक पेश करने के सरकार के कदम पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि पिछले 65 सालों में सरकार एक भी ऐसा उदाहरण बताए जहां उच्च सदन में विधेयक के लंबित रहते निचले सदन में समान विधेयक पेश किया गया हो। उन्होंने कहा कि सरकार पहले अध्यादेश लाई और अब गलत तरीके से बिल पेश किया जा रहा है। उन्होंने सरकार से जानना चाहा कि क्या देश अध्यादेश राज में जा रहा है?

माकपा के ही एमबी राजेश ने आरोप लगाया कि सरकार एक गलत परंपरा शुरू करने का प्रयास कर रही है जैसा कि पिछले 65 साल में कभी नहीं देखा गया। इसी पार्टी की पीके श्रीमति टीचर ने इसे गलत परंपरा बताते हुए सरकार के इस कदम को जनता और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बताया।

रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के एनके रामचंद्रन ने विधेयक पेश करने के सरकार के कदम को तमाम संसदीय परंपराओं के खिलाफ बताया। बीमा विधि (संशोधन) विधेयक 2015 , बीमा अधिनियम 1938 और सामान्य बीमा व्यापार ( राष्ट्रीयकरण ) अधिनियम 1972 और बीमा नियमन और विकास प्राधिकरण अधिनियम 1999 में संशोधन करने के लिए लाया गया है। कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार ने भी बीमा क्षेत्र में एफडीआइ की सीमा बढ़ाने के लिए एक विधेयक पारित कराने की कोशिश की थी। उसने 2008 में राज्यसभा में विधेयक पेश किया था जिसे बाद में प्रवर समिति को भेज दिया गया।

 

 

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