instead of stopping mp fund pm narendra modi is planning to raise it five times though it is said to be big soruce of black money - Jansatta
ताज़ा खबर
 

काले धन को बढ़ावा देने वाले सांसद फंड को बंद करने की हिम्‍मत दिखा पाएंगे नरेंद्र मोदी?

पीवी नरसिम्हा राव सरकार और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान मनमोहन सिंह ने सांसद फंड का विरोध किया था लेकिन जब वो पीएम बने तो इसे दो करोड़ रुपये से बढ़ाकर पांच करोड़ कर दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ।

एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार यह घोषणा कर रहे हैं कि वे काला धन को समाप्त करके ही दम लेंगे। पर दूसरी ओर उनकी सरकार सांसद फंड की वार्षिक राशि 5 करोड़ से बढ़ाकर 25 करोड़ रुपए करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। पिछले अनुभव बताते हैं कि यह फंड काला धन पैदा करने का एक स्रोत ही नहीं है बल्कि राजनीति की शुचिता पर दाग लगाने का जरिया भी बन चुका है।

2007 में सपा के राज्य सभा सदस्य साक्षी महाराज की सदस्यता समाप्त करने के संसद के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी थी।साक्षी महाराज पर सांसद फंड से ‘कमीशन’ लेने का आरोप साबित हो गया था। 2014 के सितंबर में बिहार के जमुई की अदालत में एक जदयू विधायक के खिलाफ आरोप गठित किया गया। उन पर आरोप है कि उन्होंने विधायक फंड से दस प्रतिशत कमीशन लिया ।

याद रहे कि फंड के व्यापक दुरुपयोग के आरोप में नीतीश सरकार विधायक निधि को समाप्त कर चुकी है। सांसद फंड को समाप्त करने के पक्ष में प्रशासनिक सुधार आयोग अपनी सिफारिश वर्षों पहले सरकार को दे चुका है। इसके बावजूद सांसद फंड पर बनी संसदीय समिति ने हाल में इस फंड को 5 करोड़ से बढ़ाकर 25 करोड़ रुपए करने की सिफारिश कर दी। वित्त मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को न तो स्वीकार किया है और न ही अस्वीकार।

लगता है कि इस मांग के पीछे की मजबूत लाॅबी की राजनीतिक ताकत को देखते वित्त मंत्रालय और केंद्र सरकार असमंजस में है। सांसद फंड के खिलाफ बहुत सी शिकायतें आती रही हैं। पूर्व प्रधान मंत्री द्वय आईके गुजराल और एचडी देवगौड़ा के फंडों का भी दुरुपयोग हो चुका है। भारत के महालेखा परीक्षक (सीएजी)  से लेकर अदालत और अनेक कानून विशेषज्ञ इसके खिलाफ अपनी राय दे चुके हैं। लालू प्रसाद ने 2007 में कहा था कि ‘विधायक फंड की ठेकेदारी के झगड़े के कारण ही हमारी बिहार की सत्ता चली गयी।’

सांसद फंड जब बढ़कर 25 करोड़ रुपए सालाना हो जाएगा तो इसके काला धन के एक बड़ा स्रोत बन जाने की आशंका है। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे राजनीति दूषित हो रही है। ठेकेदारों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच का फर्क मिट रहा है। उनमें जन सेवा के भाव नहीं के बराबर हैं। उन ठेकेदार-सह कार्यकर्ताओं का अधिकतर सांसदों और विधायकों से मधुर संबंध बन चुका है। इस फंड के प्रति सासंदों के लगाव के कारण कोई प्रधानमंत्री इसे समाप्त करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है। यदि मोदी सरकार इस फंड को बढ़ा कर 25 करोड़ करेगी तो वह काला धन का बड़ा स्रोत ही खोलेगी। यह चिंताजनक बात है कि अपेक्षाकृत ईमानदार प्रधानमंत्रियों ने भी इस फंड को बंद करने की हिम्मत नहीं जुटाई, बल्कि बढ़ा दी।

वित्त मंत्री और राज्य सभा में कांग्रेस नेता के रूप में मनमोहन सिंह पहले इस फंड के सख्त खिलाफ थे। पर जब सिंह खुद प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इसे 2 करोड़ से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपए कर दिया। अब नरेंद्र मोदी की परीक्षा है। दरअसल एमपी फंड की सबसे बड़ी बुराई यह है कि इससे अधिकतर एमपी की छवि बनने के बदले बिगड़ती है।इसके इस्तेमाल के तरीके को लेकर जनता में तरह-तरह की अफवाहें उड़ती रहती हैं। जब एमपी की छवि बिगड़ती है तो साथ साथ राजनीति की छवि भी धूमिल होती है।

अपवादस्वरूप कुछ ही सांसद अपने फंड का दुरुपयोग नहीं होने देते। सत्ता संभालने के तत्काल बाद नरेंद्र मोदी का ध्यान इस फंड के दुरुपयोग की ओर गया था। इसके तहत होने वाले विकास कार्यों की थर्ड पार्टी निगरानी कराने का फैसला उनकी सरकार ने किया भी था। पर इस दिशा में कोई काम भी हुआ, ऐसी कोई खबर नहीं मिली है। विगत अप्रैल में सरकार ने लोक सभा को बताया था कि वित्त मंत्रालय सांसद फंड को सालाना 25 करोड़ करने के प्रस्ताव पर विचार कर रहा है।

कल्पना कीजिए कि जिस राज्य सभा सदस्य की सदस्यता इस आरोप में गयी थी, उसकी कितनी नैतिक धाक स्थानीय प्रशासन पर है या तब रही होगी ? कल्पना कीजिए कि जब किसी जिले का कोई कलक्टर अपने जिले के सासंद को सांसद फंड में कमीशन लेते देखेगा तो वह अफसर खुद कितना ईमानदार रह पाएगा? वह अपने अधीनस्थों को ईमानदारी का पाठ कैसे पढ़ाएगा? नरेंद्र मोदी अपने सांसदों से कह रहे हैं कि वे अपने क्षेत्रों में घूम कर काले धन के खिलाफ हमारे अभियान का जनता में प्रचार करें।

विवादास्पद पृष्ठभूमि में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने 1993 में सासंद फंड शुरू किया था। क्या यह संयोग है कि उसके ठीक पहले राम जेठमलानी ने यह आरोप लगाया था कि शेयर घोटालेबाज हर्षद मेहता ने नंदियाल लोक सभा उप चुनाव के खर्चे के लिए राव को एक करोड़ रुपए का चंदा दिया था ? तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने तब कहा था कि जानबूझ कर मेरी विदेश यात्रा के समय इसे शुरू किया गया क्योंकि मैं इसके खिलाफ था।

बाद में भी राज्य सभा में 10 मार्च 2003 को कांग्रेस के नेता मनमोहन सिंह ने फंड में बढ़ोतरी का विरोध करते हुए अटल सरकार से कहा था कि ‘यदि आप चीजों को इस तरह होने दीजिएगा तो जनता नेताओं और लोकतंत्र में विश्वास खो देगी।’ पर घटनाएं बताती हैं कि जिस तरह अटल जी फंड पक्षी सासंदों के दबाव में आ गए थे, उसी तरह प्रधानमंत्री बनने के बाद मनमोहन सिंह भी दबाव में आ गए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2011 में इसे दो करोड़ रुपए से बढ़ा कर पांच करोड़ रुपए सालाना कर दिया। जबकि योजना आयोग ने इस बढ़ोतरी का विरोध किया था। यह उम्मीद की जाए कि जिन फंडपक्षी शक्तियों के दबाव में अटल और मनमोहन आ गए थे, उनके दबाव में मोदी जी नहीं आएंगे ?

वीडियोः बैंकाें से सांठ-गांठ कर सफेद कराया गया काला धन: बाबा रामदेव

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App