पिछले दो सालों में छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों ने माओवादियों के खिलाफ अभियान तेज कर दिए। इसी दौरान नक्सल प्रभावित इलाकों में एक और काम भी तेजी से हुआ और वो था सड़कों का निर्माण। इस प्रक्रिया को क्षेत्र में विकास और सुरक्षा लाने की कुंजी माना जा रहा है। रक्षा मंत्रालय के बीआरओ ने छत्तीसगढ़ के माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में पिछले 15 महीनों में चुनौतीपूर्ण भूभाग पर 20 बेली पुलों का निर्माण किया है और 75 किलोमीटर सड़क निर्माण का काम पूरा किया है।

नवंबर 2024 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा भारत से वामपंथी उग्रवाद को खत्म करने के लिए 31 मार्च 2026 की समय सीमा निर्धारित करने के तीन महीने बाद बीआरओ को बीजापुर और सुकमा जिलों में सड़क नेटवर्क के निर्माण का काम सौंपा गया। ये क्षेत्र माओवादी हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यह नेटवर्क 130 किलोमीटर लंबा होगा और इसमें 10 से ज्यादा सड़क परियोजनाएं शामिल हैं, जो वामपंथी उग्रवाद के कारण सालों से अटकी हुई थीं।

पिछले कुछ सालों में माओवादियों ने सड़क निर्माण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सामान को तबाह कर दिया और सड़क निर्माण कार्य की सुरक्षा के लिए तैनात किए गए दर्जनों सुरक्षाकर्मियों की हत्या कर दी है। ठेकेदारों की भी हत्या की गई है। इनमें से एक की हत्या पिछले दिसंबर में बीजापुर के पामेड में हुई थी।

बीआरओ के एक अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “नक्सलियों से लगातार मिल रही धमकियों के कारण स्थानीय ठेकेदारों की खराब प्रतिक्रिया की वजह से 80% सड़क परियोजनाएं आधे दशक से ज्यादा समय से ठप्प पड़ी थीं।” अधिकारी ने बताया कि माओवादियों ने बीआरओ को भी निशाना बनाने की कोशिश की है और उन्होंने यह भी बताया कि बीजापुर के बसागुडा में 50 किलोग्राम का एक बड़ा आईईडी लगाया गया था, लेकिन सीआरपीएफ की टीम ने उसे निष्क्रिय कर दिया।

घना जंगल, खड़ी पहाड़ी

पिछले 15 महीनों में कई परियोजनाओं को तेजी मिली है। ऐसी ही एक परियोजना ताडापाला पहाड़ी सड़क परियोजना थी, जिसे जनवरी 2026 में बीआरओ को सौंपा गया था। इसे दो महीनों के अंदर पूरा कर लिया गया। अधिकारियों ने बताया कि इसका उद्देश्य सुरक्षा बलों को हर मौसम में निरंतर रसद देना था। यह सड़क 13 किलोमीटर लंबी है और बीजापुर जिले के पुजारी-कांकेर क्षेत्र से शुरू होती है। 13 किलोमीटर में से 8 किलोमीटर पहाड़ी क्षेत्र में पड़ता है।

एक अधिकारी ने कहा, “इस परियोजना की कठिनाई को देखते हुए और पहाड़ी सड़क निर्माण में बीआरओ की विशेषज्ञता को ध्यान में रखते हुए, यह स्वाभाविक रूप से इस सड़क का चयन था। सुरक्षा बलों के लिए इस सड़क का रणनीतिक महत्व बहुत ज्यादा है, क्योंकि यह तेलंगाना से छत्तीसगढ़ में प्रवेश करने वाले नक्सलियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एक प्रमुख मार्ग पर मौजूद है।”

इस क्षेत्र की ऊबड़-खाबड़ जमीन और घने जंगल ने लंबे समय से नक्सलियों को प्राकृतिक लाभ दिया था। निर्माण कार्य में बड़ी चुनौतियां थीं, क्योंकि कई जगहों पर कथित तौर पर आईईडी और बारूदी सुरंगें बिछी हुई थीं, साथ ही निर्माण के दौरान कठोर चट्टानी संरचनाएं भी मौजूद थीं। अधिकारी ने आगे कहा, “इसके बावजूद, बीआरओ कर्मियों ने गृह मंत्रालय के 31 मई, 2026 के लक्ष्य से काफी पहले, दो महीने के अंदर ही ताडापाला पहाड़ी की चोटी तक कनेक्टिविटी हासिल कर ली। डीजीबीआर लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह ने फरवरी में ताडापाला पहाड़ी की चोटी का दौरा करने के बाद व्यक्तिगत रूप से परियोजना की निगरानी की।”

बीआरओ द्वारा शुरू की गई एक अन्य परियोजना एक सड़क का मार्ग बदलने की थी। इसे उसने चार महीनों में पूरा कर लिया, जिससे बीजापुर के कोंडापल्ली गांव और सुकमा जिले के पुवर्ती गांव के बीच की दूरी पहले के 38 किलोमीटर से घटकर मात्र 9 किलोमीटर रह गई।

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माओवादी विरोधी अभियानों में बीआरओ के कार्यों की भूमिका पर बोलते हुए बस्तर रेंज के आईजी पी. सुंदरराज ने कहा, “ये क्षेत्र, जो कभी घने जंगलों और खराब संपर्क के कारण बेहद दुर्गम थे, अब धीरे-धीरे सुरक्षा बलों के लिए बहुत सुलभ होते जा रहे हैं। बेहतर सड़क बुनियादी ढांचे ने सैनिकों की तेज आवाजाही, बेहतर रसद और नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान ज्यादा प्रभावी समन्वय को संभव बनाया है। सुरक्षा बल माओवादी समूहों पर दबाव बनाए रखने में सक्षम हुए हैं।”

आठ महीनों में बीआरओ ने बीजापुर और सुकमा के क्षेत्रों में 20 से ज्यादा बेली पुल स्थापित किए हैं। बीआरओ के एक अधिकारी ने कहा, “बेली ब्रिज द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों द्वारा विकसित एक पोर्टेबल ट्रस ब्रिज है। इसका इस्तेमाल रक्षा बलों की तरफ से किया जाता था।”

हर मौसम में कनेक्टिविटी

अधिकारी ने बताया कि मानसून के मौसम में सुरक्षा बलों के लिए रसद व्यवस्था के मामले में इन पुलों ने अहम भूमिका निभाई। अधिकारियों के अनुसार, इन पुलों और सड़कों के निर्माण से बीजापुर और सुकमा जिलों के 25 से ज्यादा गांवों में हर मौसम में आवागमन सुगम हो गया है। अधिकारी ने कहा, “ये स्थानीय आदिवासी आबादी के लिए कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने का एक प्रमुख साधन भी साबित होंगे, जो अन्यथा मानसून के चरम मौसम के दौरान मुख्य भूमि से काफी हद तक कटी रहती है।”

आईजी सुंदरराज ने कहा कि इन सड़कों और पुलों से दूरदराज के गांवों और जिला मुख्यालयों के बीच संपर्क बेहतर होगा, जिससे स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, बाजार और सरकारी सेवाओं तक बेहतर पहुंच संभव होगी। समय के साथ, यह संपर्क विकास को गति देगा, आर्थिक गतिविधियों को सुगम बनाएगा और दूरस्थ आदिवासी समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने में मदद करेगा।

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छत्तीसगढ़ से तेलंगाना में एंट्री गेट माने जाने वाले कोंडापल्ली से धर्माराम तक 20 किलोमीटर लंबी सड़क भी तैयार है। राज्य की तरफ से चलाई जा रही बसें भी इस पर चलने लगी हैं। बीआरओ के एक अधिकारी ने बताया, “इस रास्ते पर कुल नौ बेली ब्रिज बनाए जा रहे हैं और मानसून के दौरान जल निकासी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए 43 पुलियाएं जोड़ी गई हैं। सड़क पर पक्की सड़क बिछाने का काम एक महीने के भीतर शुरू होने की उम्मीद है।”

इस मार्ग के बनने से बीजापुर जिला मुख्यालय से तेलंगाना के भद्राचलम मंदिर तक की दूरी पहले के 270 किलोमीटर से घटकर 180 किलोमीटर रह गई है। माओवादियों की मौजूदगी के कारण पहले इस मार्ग का इस्तेमाल लगभग बंद रहता था, लेकिन अब इस पर चेरला और भद्राचलम की आवाजाही में तेजी आई है।

करेगुट्टा पहाड़ियां

बीआरओ ने करेगुट्टा हिल्स क्षेत्र में ताडापाला पहाड़ियों की कनेक्टिविटी परियोजना का लगभग 70% काम पूरा कर लिया है। यह क्षेत्र अब तेलंगाना सीमा के निकट माओवादियों का अंतिम गढ़ है। माओवादियों की बटालियन 1 के कुछ सदस्य अब इन पहाड़ियों के पीछे छिपे हुए हैं।

सड़क निर्माण का चुनौतीपूर्ण काम एक किलोमीटर से ज्यादा के हिस्से में कठोर चट्टान को काटने से संबंधित था। इसमें लगातार 25 दिनों तक विस्फोट करना शामिल था। यह रास्ता क्षेत्र में तैनात सीआरपीएफ सैनिकों के लिए गेम-चेंजर साबित हुआ है, जिन्हें पहले जरूरी चीजों को क्षेत्र में पहुंचाने के लिए हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल करना पड़ता था।

अधिकारी ने कहा, “सड़क परियोजना लगभग पूरी हो चुकी है, और सीआरपीएफ के जवान अब वायु सेना के हेलीकॉप्टरों पर निर्भर नहीं हैं। पहले इस महत्वपूर्ण जगह पर जरूरी चीजों की आपूर्ति के लिए हेलीकॉप्टरों की जरूरत पड़ती थी।” बीजापुर में बीआरओ के कामों के बारे में बात करते हुए जिला कलेक्टर संबित मिश्रा ने कहा, “तार्रेम-कोंडापल्ली-पामेड सड़क पहले दुर्गम इलाकों से गुजरने वाला एक महत्वपूर्ण गलियारा है, जिससे उसूर ब्लॉक में कनेक्टिविटी में सुधार हुआ है, दूरदराज के गांवों तक पहुंच आसान हुई है और स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं की डिलीवरी में सुविधा हुई है। इससे यात्रा का समय कम हुआ है।”

भविष्य के लिए रोडमैप

बीआरओ ने नारायणपुर, सुकमा, कोंडागांव और कांकेर जिलों में आठ महत्वपूर्ण पुलों के निर्माण के लिए रोडमैप तैयार कर लिया है। अधिकारियों ने बताया कि इन जगहों पर मॉड्यूलर पुलों का निर्माण कम समय में किया जाएगा। राज्य सरकार ने इन पुलों के निर्माण का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेज दिया है। इसके अलावा, बीआरओ ने बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर, कोंडागांव और कांकेर जिलों में बुनियादी ढांचा कार्यों के लिए 10 से ज्यादा डीपीआर तैयार की हैं। इनमें से सभी जिलों में हाल तक माओवादियों की मजबूत उपस्थिति थी।

बीजापुर और सुकमा में 51 माओवादियों ने किया सरेंडर

गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 माओवादियों के खात्मे की आखिरी डेडलाइन दी है। पिछले कुछ महीनों से लगातार कई बड़े माओवादियों को मार गिराया गया है जबकि सैकड़ो की संख्या में सरेंडर किया है। इस बीच सुकमा और बीजापुर में 51 माओवादियों ने सरेंडर कर दिया। अधिकारियों ने बताया कि सरेंडर करने वालों में 24 महिलाएं शामिल थीं और जिन पर कुल 1.61 करोड़ रुपये का इनाम था। पढ़ें पूरी खबर…