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जब इंफोसिस के को-फाउंडर नारायण मूर्ति की पत्नी को कपड़े के कारण सहना पड़ा था अपमान, बोला गया- “कैटल क्लास”

हवाईअड्डे पर रेशमी भारतीय-पश्चिमी परिधान, महंगी सैंडिलों और गुची के हैंडबैग के साथ दिखी वह महिला बैठक के अनुरूप लगने के लिए खादी की सादी साड़ी पहनकर आई थी।

Author नई दिल्ली। | July 24, 2017 4:34 PM
इंफोसिस के को-फाउंडर नारायण मूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति। (FILE Photo)

लंदन के हीथ्रो हवाईअड्डे पर इन्फोसिस फाउंडेशन की अध्यक्ष सुधा मूर्ति से एक महिला ने कहा था- ‘‘यहां से जाओ और इकोनॉमी क्लास की कतार में खड़ी हो जाओ। यह कतार बिजनेस क्लास के यात्रियों के लिए है।’’ 66 वर्षीय सुधा दरअसल उस समय सलवार कमीज पहने हुए थीं, जिसके चलते उन्हें संभवत: उस कतार के योग्य व्यक्ति के तौर पर नहीं देखा जा रहा था। लेकिन सुधा को गुस्सा उस समय आया, जब उन्हें ‘निचले तबके’ का व्यक्ति कहा गया। तब उद्योगपति नारायण मूर्ति की आम तौर पर शांत रहने वाली पत्नी ने इस महिला को मुंहतोड़ जवाब देने का फैसला किया। सुधा ने अपने निजी अनुभवों को ‘थ्री थाउजंड स्टिचेज’ नामक एक नई किताब में बयां किया है। इसमें वह समाज में आज भी मौजूद भेदभावों पर रोशनी डालती हैं।

उन्होंने अपनी किताब में लिखा है, ‘‘क्लास :दर्जे: का मतलब भारी दौलत होना नहीं है। मदर टेरेसा एक उत्कृष्ट दर्जे की महिला थीं। इसी तरह भारतीय मूल के महान गणितज्ञ मंजुल भार्गव भी उत्कृष्ट दर्जे के हैं।’’ उन्होंने किताब में लिखा, ‘‘यह धारणा पिछड़ी हुई सोच है कि धन आने पर आपमें अपने आप एक क्लास आ जाती है।’’ पीटीआई भाषा को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि वह उस महिला को अपना बोर्डिंग पास दिखाकर अपनी ‘क्लास’ के बारे में उसके सारे संशय दूर कर सकती थीं लेकिन उन्होंने यह पता लगाने का इंतजार किया कि आखिर उस महिला के हिसाब से वह बिजनेस क्लास के मानकों में फिट क्यों नहीं बैठतीं? उन्होंने कहा, ‘‘जल्द ही मैं समझ गई कि ऐसा मेरे परिधान की वजह से है।’’ संयोगवश उसी शाम सुधा का इस महिला से एक बार फिर आमना-सामना हुआ।

हवाईअड्डे पर रेशमी भारतीय-पश्चिमी परिधान, महंगी सैंडिलों और गुची के हैंडबैग के साथ दिखी वह महिला बैठक के अनुरूप लगने के लिए खादी की सादी साड़ी पहनकर आई थी। इस बैठक में सुधा इन्फोसिस की ओर से सरकारी स्कूलों की मरम्मत के लिए धन देने की बात कह रही थीं। यह कहने की जरूरत नहीं है कि सुधा को बैठक की अध्यक्षता करते देख वह महिला स्तब्ध रह गई थी। वह लिखती हैं, ‘‘कपड़े आज भी समाज में व्याप्त रूढ़ियों को रेखांकित करते हैं। जैसे कि शादियों में अच्छे से अच्छे रेशमी कपड़े पहनने की उम्मीद की जाती है और सामाजिक कार्यकर्ताओं से उम्मीद की जाती है कि वे खुद को सादे और अरुचिकर तरीके से पेश करें।’’ उन्होंने इस बात पर गंभीर चिंता जाहिर की कि एक ‘बाहरी बल’ लोगों को ‘अभिजात्य’ क्लब में शामिल होने का दबाव बना रहा है। इसके चलते कई लोग ‘बुरी आदतों’ का शिकार बन जाते हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘मेट्रो शहरों में कॉलेज जाने वाली कई लड़कियां उच्च स्तरीय वेश्यावृत्ति में शामिल हो जाती हैं क्योंकि वे डिजाइनर कपड़े लेने के लिए जल्दी पैसा कमा लेना चाहती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन पर एक बाहरी दबाव काम कर रहा होता है।’’ सुधा की पुस्तक पेंग्विन रैंडम हाउस ने प्रकाशित की है और इसमें 11 अध्याय हैं। इसमें लेखिका के इन्फोसिस फाउंडेशन में काम करने के दौरान के अनुभवों को भी साझा किया गया है।

 

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