महाराष्ट्र की राजनीति में एनसीपी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। इस साल 28 जनवरी को अजित पवार के निधन के बाद से ही पार्टी अंदरूनी कलह से जूझ रही है। एक बार फिर पार्टी के मतभेद खुलकर जनता के सामने आ गए हैं। जब से एमएलसी चुनाव के लिए विक्रम काकडे को नॉमिनेट किया गया है, कई एनसीपी नेताओं ने खुलकर इस फैसले की आलोचना की है।
अजित पवार के रहते हुए एनसीपी में एक अनुशासन था, जहां किसी फैसले के प्रति नाराजगी होने पर भी बातचीत के जरिए समाधान निकाला जाता था। लेकिन अब मीडिया के सामने खुलकर विचार रखे जा रहे हैं और पार्टी की नीतियों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस समय एनसीपी के कई दिग्गज नेता जहां इस फैसले की आलोचना कर रहे हैं, वहीं एक बड़े नेता ने तो अपने पद से इस्तीफा तक दे दिया है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सबसे ज्यादा आपत्ति राज्यसभा सांसद और पवार के बेटे पार्थ पवार की बढ़ती ताकत को लेकर है।
क्यों नाराज हैं एनसीपी नेता?
पार्वती असेंबली कांस्टीट्यूएंसी के वर्किंग प्रेसिडेंट पद से इस्तीफा देने वाले रामदास कहते हैं, “मैंने कार्यकारी अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया है क्योंकि वफादारी के लिए पार्टी में कोई जगह नहीं बची है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विक्रम काकडे के पिता संजय काकडे वही शख्स हैं, जिन्होंने एनसीपी में बगावत की थी। ऐसे में उन्हीं के बेटे को टिकट दे देना पूरी तरह गलत है। इसलिए मैंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।”
अपने पत्र में रामदास आगे लिखते हैं, “आज लेजिसलेटिव काउंसिल के लिए गलत प्रत्याशी का चयन किया गया है। हमने एनसीपी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए अपना खून-पसीना एक किया था। पिछले 30 सालों से हम पार्टी के प्रति वफादार रहे हैं, लेकिन अगर इसके बावजूद पार्टी संजय काकडे के बेटे को टिकट दे रही है, तो हम जैसे वफादारों के लिए इस पार्टी में क्या जगह रह जाएगी? इसी वजह से मैं अपने पद से इस्तीफा दे रहा हूं।”
विवाद की जड़ क्या है?
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए सुनील टिंगरे ने भी अपनी नाराजगी व्यक्त की है। उनका कहना है, “हर वरिष्ठ नेता उस समय हैरान रह गया, जब विक्रम काकडे के नाम का ऐलान किया गया। अगर पार्टी हम लोगों में से किसी को भी चुनती, तो हमें कोई आपत्ति नहीं होती; लेकिन विक्रम काकडे के नाम का आगे आना हम सभी के लिए एक बड़ा झटका था। हम सभी नेताओं ने काफी मेहनत की है और अजित दादा के नेतृत्व में पार्टी को ताकतवर बनाया है। हम हमेशा पार्टी के प्रति वफादार रहे हैं। जब अजित दादा ने भाजपा के साथ जुड़ने का फैसला किया था, तब भी हमने उनका समर्थन किया था। हमें कभी ऐसा नहीं लगा था कि हमारे साथ ऐसा व्यवहार किया जाएगा।”
वैसे एनसीपी में मचे इस घमासान को रोकने के लिए खुद पार्थ पवार ने सुनील टिंगरे से मुलाकात की थी। इस मुलाकात के बारे में टिंगरे ने कहा, “मेरे मन में जो भी शिकायतें थीं, मैंने सब बता दी हैं। पार्टी नेतृत्व ने मुझे आश्वासन दिया है कि भविष्य में मेरे सम्मान का ध्यान रखा जाएगा।” अब एक तरफ जहां टिंगरे आश्वासन की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यह भी मान रहे हैं कि पार्टी को प्रत्याशी चुनते समय कुछ दूसरे नेताओं ने गुमराह करने का काम किया है। उन्होंने जोर देकर कहा, “नाराजगी के बावजूद मैं पार्टी नहीं छोड़ने वाला हूं। मैंने दादा से वादा किया था कि मैं हमेशा पार्टी के प्रति वफादार रहूंगा।”
वफादार नेता किए जा रहे दरकिनार?
पिंपरी-चिंचवड़ के पूर्व मेयर योगेश बहल ने भी अपनी नाराजगी व्यक्त की है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए उन्होंने कहा, “अजित दादा के रहते हुए मुझसे वादा किया गया था कि मुझे लेजिसलेटिव काउंसिल के लिए नॉमिनेट किया जाएगा। मैं खुद 35 साल तक पार्टी का कॉर्पोरेटर रहा हूं और अजित दादा के प्रति हमेशा वफादार रहा हूं। लेकिन इसके बावजूद पार्टी ने एक ऐसे शख्स को नॉमिनेट किया है जिसने हाल ही में पार्टी जॉइन की है। पिंपरी-चिंचवड़ के भी सभी नेता इस समय इस फैसले से बेहद नाराज हैं।”
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