एक साल पहले पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) को ‘स्थगित’ कर दिया था। अब सरकार चिनाब नदी पर 5000 मेगावाट से ज्यादा संयुक्त क्षमता वाली जलविद्युत परियोजनाओं (hydropower projects) के तेजी से विकास और छह दशक पुरानी इस संधि पर नए सिरे से बातचीत की दिशा में आगे बढ़ रही है। सोमवार को सरकारी सूत्रों ने यह जानकारी दी।
सूत्रों के मुताबिक, सरकार का आकलन है कि मौजूदा स्वरूप में यह संधि अपनी उपयोगिता खो चुकी है और अब इसे अधिक संतुलित बनाने के लिए पाकिस्तान के साथ दोबारा बातचीत की जानी चाहिए। एक शीर्ष सरकारी सूत्र ने कहा, ”सिंधु जल संधि अपने मौजूदा स्वरूप में अब दोबारा लागू नहीं हो सकती।”
आतंकवाद को खत्म करने के कोई संकेत नहीं
सूत्रों का यह भी कहना है कि पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद को समाप्त करने के कोई संकेत नहीं दिए हैं जबकि यही सिंधु जल संधि के तहत सहयोग बहाल करने की पहली और अनिवार्य शर्त है।
सूत्रों के अनुसार, भविष्य में अगर नदी जल बंटवारे के प्रावधानों को फिर से लागू करना है तो संधि को संशोधित स्वरूप में दोबारा तैयार करना होगा। हालांकि, यह तभी संभव होगा जब पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकवाद को समर्थन देना स्थायी रूप से बंद करेगा।
हाइड्रो प्रोजेक्ट्स में तेजी
द इंडियन एक्सप्रेस को मिली जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता चिनाब नदी पर प्रस्तावित प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं को तेजी से पूरा करना है। इनमें 1856 मेगावाट की सावलकोट जलविद्युत परियोजना, 1,000 मेगावाट की पाकल दुल परियोजना, 850 मेगावाट की रातले परियोजना, 624 मेगावाट की किरू परियोजना और 540 मेगावाट की क्वार परियोजना शामिल हैं।
सूत्रों के मुताबिक, किरू और पाकल दुल प्रोजेक्ट इस साल के आखिर तक पूरी होने की उम्मीद है जबकि बाकी परियोजनाएं अगले दो से तीन वर्षों में पूरी हो सकती हैं।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि ये परियोजनाएं भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन, बिजली ग्रिड की स्थिरता और क्षेत्रीय विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इनके पूरा होने से भारत की जलविद्युत उत्पादन क्षमता में काफी वृद्धि होगी और सिंधु बेसिन में अपने वैध जल अधिकारों का अधिक प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जा सकेगा।
सूत्रों ने कहा, ”जलविद्युत परियोजनाओं के तेज विकास और आधुनिक नदी बेसिन प्रबंधन के साथ ये पहल सुनिश्चित करेंगी कि सिंधु नदी के जल में भारत के वैध हिस्से का इस्तेमाल कुशल, टिकाऊ और देश के लॉन्गटर्म डिवेलपमेंट, जल सुरक्षा तथा स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों के अनुरूप किया जाए।”
अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश में पाकिस्तान
पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है। भारत के रुख को स्पष्ट करते हुए सरकारी सूत्रों ने कहा कि सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) सद्भावना, मित्रता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना के साथ तय की गई थी और उसी भावना के अनुरूप इसे लागू किया गया।
सूत्रों ने कहा, ”किसी भी दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय समझौते की तरह यह संधि केवल कानूनी दायित्वों पर नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, पारस्परिकता और सद्भावना पर भी आधारित थी। छह दशकों से अधिक समय तक भारत ने संधि की भावना और प्रावधानों का पूरी निष्ठा से पालन किया। युद्ध, सैन्य तनाव और दोनों देशों के बीच लंबे समय तक चली कटुता के बावजूद भारत ने कभी इसके क्रियान्वयन में बाधा नहीं आने दी।”
सूत्रों के अनुसार, इसी दौरान पाकिस्तान भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद को लगातार बढ़ावा देता रहा।
सूत्रों ने कहा, ”इस तरह के व्यवहार ने संधि के सहयोगात्मक क्रियान्वयन के लिए आवश्यक आपसी विश्वास के माहौल को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय समझौते लगातार शत्रुतापूर्ण गतिविधियों और आतंकवाद से अलग-थलग रहकर नहीं चल सकते।”
क्या है सिंधु जल संधि, भारत और पाकिस्तान ने इस पर हस्ताक्षर क्यों किये?
सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान आमने-सामने हैं। पाकिस्तान का कहना है कि वह इस जल संधि को बेहद महत्वपूर्ण मानता है और उम्मीद करता है कि भारत इस जल संधि के तहत किए गए समझौते के प्रावधानों का पालन करेगा। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि इन दोनों पड़ोसी मुल्कों के बीच सिंधु जल समझौता क्यों हुआ था?
‘सिंधु जल संधि अपने मौजूदा स्वरूप में नहीं…
भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि सिंधु जल संधि अब अपने पुराने स्वरूप में काम नहीं करेगी। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कहा है कि पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ सीमा पार से जारी आतंकवाद को खत्म करने के कोई संकेत नहीं दिए हैं जबकि इस संधि के तहत सहयोग फिर से शुरू करने के लिए ऐसा करना जरूरी है।
