Indus Water Treaty News: केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल ने कहा कि सिंधु नदी का पानी पाकिस्तान को नहीं दिया जाएगा और भारत के हित में पाकिस्तान की ओर बहने वाले पानी को रोका जाएगा। इस पानी से हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और दिल्ली को फायदा होगा।

केंद्रीय मंत्री पाटिल ने शनिवार को जयपुर स्थित बीजेपी मुख्यालय में मीडिया से बातचीत के दौरान यह बयान दिया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार पाकिस्तान को जाने वाले पानी को रोकने और देश भर के अलग-अलग राज्यों द्वारा इसके इस्तेमाल को रोकने के लिए एक ठोस कार्य योजना तैयार कर रही है। मंत्री ने कहा, “हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और दिल्ली को इस पानी से सीधा फायदा होगा। पाकिस्तान को जाने वाले पानी को डायवर्ट करने के लिए एक डीपीआर तैयार की गई है।”

भारत और पाकिस्तान के बीच जल बंटवारे का समझौता सिंधु जल संधि 19 सितंबर 1960 को कराची में साइन की गई थी। इस संधि के तहत, सिंधु नदी और उसकी पश्चिमी सहायक नदियों झेलम और चिनाब पर नियंत्रण का ज्यादातर भाग पाकिस्तान को सौंप दिया गया था। भारत को इन नदियों का सीमित उपयोग हाईड्रो पावर जेनरेशन, सिंचाई और पेयजल जैसे उद्देश्यों के लिए करने की इजाजत दी गई थी, लेकिन इनके प्रवाह को रोकने या डायवर्ट पर प्रतिबंध था। भारत को इन नदियों पर रन-ऑफ-द-रिवर हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट बनाने की इजाजत दी गई थी।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि निलंबित

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से अस्थायी रूप से निलंबित करने की घोषणा की। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान की लगभग 80 प्रतिशत खेती की जमीन सिंधु नदी सिस्टम पर निर्भर है। जल प्रवाह में किसी भी तरह की बाधा फसल उत्पादन पर असर डाल सकती है। कराची, लाहौर और मुल्तान जैसे प्रमुख शहर भी शहरी जल आपूर्ति के लिए सिंधु नदी प्रणाली पर काफी हद तक निर्भर हैं।

इस बीच, पाकिस्तान ने हेग स्थित न्यायालय में भारत के हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। इसमें जम्मू और कश्मीर में मौजूद बागलीहार और किशनगंगा परियोजनाओं पर आपत्ति जताई गई है। इस मामले की सुनवाई 2-3 फरवरी को होनी थी। भारत ने साफ तौर पर इसका पालन करने से इनकार कर दिया है और कहा है कि वह न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को मान्यता नहीं देता है। सरकार ने न्यायालय के निर्देशों को अवैध और अमान्य बताते हुए दोहराया है कि उसने इस मामले में मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) के अधिकार को कभी स्वीकार नहीं किया है। 1960 में साइन की गई सिंधु जल संधि का भारत के लिए क्या मतलब है?