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सामान्य वर्ग को आरक्षण: नरसिम्हा राव के फैसले को किया था फेल, अब रोकेंगी पीएम मोदी का रास्ता?

1992 में इंद्र साहनी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सवर्णों को आरक्षण देने की कोशिश पर विराम लगा दिया था और साथ ही उनकी याचिका पर जातिगत आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय कर दी थी।

Author Published on: January 10, 2019 1:57 PM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फाइल फोटो और इंद्रा साहने के फेसबुक अकाउंटे से तस्वीर।

मोदी सरकार आर्थिक तौर पर कमजोर सवर्णों के लिए 10 फीसदी आरक्षण देने जा रही है। इसके लिए सरकार कानून में संशोधन करने जा रही है। वर्तमान स्थिति यह है कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में संशोधन बिल पास हो गया लेकिन इसे लेकर अटकलें ऐसी भी लग रही है कि 1992 में नरसिम्हा राव सरकार के सवर्णों को आरक्षण देने के कदम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर रोकने वाली इंद्रा साहने कहीं अब मोदी सरकार की कवायद पर अड़ंगा न लगा दें। 1992 में इंद्र साहनी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सवर्णों को आरक्षण देने की कोशिश पर विराम लगा दिया था और साथ ही उनकी याचिका पर जातिगत आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय कर दी थी। न्यूज 18 से बात करते हुए साहने ने कहा कि मोदी सरकार के इस फैसले से सामान्य श्रेणी के योग्य उम्मीदवारों को नुकसान होगा। उन्होंने कहा, ”इस बिल को अदालत में चुनौती दी जाएगी, अगर इस संवैधानिक संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका दायर करनी है तो मुझे इस पर सोचने दें लेकिन इस बिल से आरक्षण की सीमा 60 फीसदी हो जाएगी और सवर्ण वर्ग के योग्य उम्मीगवार पीछे छूट जाएंगे। इसलिए संशोधन को खारिज कर दिया जाएगा।”

1992 में नरसिम्हा राव सरकार के द्वारा आर्थिक तौर पर कमजोर सर्वणों को आरक्षण दिए जाने फैसले को याद करते हुए साहने ने बताया कि दिल्ली में झंडेवालान एक्सटेंशन में एक विरोध प्रदर्शन वाली रैली को देखने के बाद उन्हें याचिका डालने का विचार आया था। उन्होंने बताया, ”रैली चल रही थी, मैंने वहां बच्चों को देखा, स्कूल और कॉलेज के छात्र सड़क पर थे। मैंने दो दिन के भीतर याचिका डाल दी लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतने लंबे वक्त तक मामला चलेगा।”

उन्होंने बताया कि जस्टिस वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाली बेंच के द्वारा फैसला दिए जाने से पहले केस कई बेचों से होकर गुजरा था। साहने ने बताया, ”मीडिया अदालत की सभी कार्यवाहियों की जोरदार रिपोर्टिंग कर रहा था और तर्क लंबे समय तक चले थे। दो जजों की बेंच से सुनवाई शुरू हुई थी, फिर तीन जजों की बेंच, पांच जजों की बेंच, सात जजों की बेंच और फिर नौ जजों की बेंच ने सुनवाई की।” बता दें कि लोकसभा चुनाव करीब हैं, ऐसे में आर्थिक तौर पर कमजोर सवर्णों को आरक्षण देने का फैसला मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है।

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