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भारत-अमेरिकी रणनीतिक संबंध : रूस को लेकर कैसे निकले राह

भारत और अमेरिका के बीच हाल के दशकों में बढ़ती नजदीकियों के बावजूद रूस-यूक्रेन संकट ने दोनों देशों के बीच कुछ मूलभूत मतभेदों को जाहिर किया है।

भारत-अमेरिकी रणनीतिक संबंध : रूस को लेकर कैसे निकले राह
संरा सुरक्षा परिषद में अमेरिकी प्रस्ताव के खिलाफ मतदान करतीं भारतीय राजनयिक रुचिरा कंबोज। फाइल फोटो।

हाल में, यूक्रेन के चार क्षेत्रों के विलय की रूस की घोषणा के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव लाया गया। रूस के इस प्रस्ताव पर भारत ने मतदान नहीं किया, जबकि अधिकतर देश अमेरिका के साथ दिखे।

यह प्रस्ताव रूस के वीटो के कारण गिर गया। इस घटनाक्रम को लेकर भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर नए सिरे से बहस तेज हो गई है। दोनों देशों के जानकार कहने लगे हैं कि अगले एक दशक में रणनीतिक संबंधों को लेकर भारत और अमेरिका-दोनों को ही अधिक समझ और आपसी विश्वास का निर्माण करना होगा।

संरा सुरक्षा परिषद की कवायद

अमेरिका के सहयोगी यूक्रेन के खिलाफ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की कार्रवाई के विरुद्ध दबाव डालने के लिए साथ आ गए हैं। अमेरिका और अल्बानिया ने रूस के विलय की कवायद को लेकर प्रस्ताव रखा था। 15 देशों में से चार भारत समेत चार देशों को छोड़कर सभी ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। बाद में रूस से वीटो से प्रस्ताव गिर गया। अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के साथ-साथ जापान और दक्षिण कोरिया जैसी एशियाई शक्तियां भी रूस के विरुद्ध प्रतिबंध लगा रही हैं।

अमेरिका के संदर्भ में देखें तो भारत बाइडेन प्रशासन की ‘हिंद-प्रशांत क्षेत्र’ की रणनीति का केंद्र बिंदु है। अमेरिका और भारत के बीच ‘2 2’ बैठक का मंच है, जहां रणनीतिक संबंधों को लेकर निरंतर बातचीत हो रही है। इससे यह रास्ता निकालने की कोशिश हो रही है कि भले ही रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर दोनों देश एकसमान दृष्टिकोण नहीं रखते, लेकिन मतभेदों से ऊपर उठना और निरंतर सहयोग सुनिश्चित करना दोनों देशों के पारस्परिक हित में है।

किस हाल में भारत-अमेरिका संबंध

वर्तमान में भारत-अमेरिका द्विपक्षीय साझेदारी कोविड-19 से मुकाबला, महामारी के बाद आर्थिक पुनरुद्धार, जलवायु संकट व सतत् विकास, महत्त्वपूर्ण एवं उभरती प्रौद्योगिकियां, आपूर्ति शृंखला लचीलापन, शिक्षा, प्रवासी समुदाय और रक्षा एवं सुरक्षा सहित विभिन्न विषयों को अपने दायरे में लेती है। भारत-अमेरिका संबंधों का विस्तार हो रहा है। रूस-यूक्रेन संकट के प्रति भारत और अमेरिका की प्रतिक्रियाए पर्याप्त विरोधाभासी रहीं।

हाल की बैठक में भारत के प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह मत व्यक्त किया कि दुनिया के दो प्रमुख लोकतंत्र पारस्परिक रूप से स्वीकार्य परिणामों पर पहुंचने के लिए अपने मतभेदों को दूर करने के इच्छुक हैं। रणनीतिक विषयों पर अंतरराष्ट्रीय सलाहकार संस्था ‘कट्स इंटरनेशनल’ के एक आयोजन में हाल में विशेषज्ञों ने कहा कि द्विपक्षीय संबंधों में मतभेदों को कम करने और अवसरों को अधिकतम करने की जरूरत है।

अमेरिका और रूस के साथ संतुलन

बावजूद इसके अमेरिका ने न सिर्फ भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ाया बल्कि क्वाड (एक समूह जिसमें अमेरिका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया शामिल हैं) जैसे मंचों के माध्यम से बहुपक्षीय जुड़ाव को भी मजबूत किया है। चीन के बारे में साझा चिंताओं ने इंडो-पैसिफिक में भारत और अमेरिका को एक-दूसरे के बेहद करीब ला दिया है।

लेकिन रिश्तों की ये मधुरता दूसरे भौगोलिक क्षेत्रों में नहीं आ सकती है, जैसा कि रूस-यूक्रेन संकट में भारत और अमेरिका की अलग-अलग स्थिति से जाहिर है। राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 24 फरवरी की टिप्पणी में कहा कि भारत और अमेरिका के बीच मंत्रणा हुई और वो रूस पर अपना रुख तय करने के मसले को अभी हल नहीं कर पाए हैं।

चीन के खिलाफ पश्चिम के समर्थन का फायदा उठाने, लेकिन रूस की कार्रवाई पर खामोश रहने के आरोप का जवाब देते हुए भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हाल में स्पष्ट तौर पर कहा कि इंडो-पैसिफिक और अटलांटिक-पार स्थितियां एक समान नहीं थीं। 19 फरवरी को म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि अगर दो परिस्थितियों के बीच संबंध होता तो यूरोपीय शक्तियां बहुत पहले इंडो-पैसिफिक में बहुत बेहतर हालत में होतीं, लेकिन भारत ने ऐसा नहीं देखा।

रूस से संतुलन

भारत-अमेरिका संबंध में रूस कोई नया कारक नहीं है। प्रतिबंधों के बीच भी भारत ने रूस से कच्चे तेल के आयात में कमी लाने के बजाय वृद्धि ही की है। रूस द्वारा भारत के लिए कम मूल्यों पर इसकी पेशकश की गई थी। भारत-रूस रक्षा संबंध भी भारत-अमेरिका संबंधों में एक अवरोध बना रहा है। भारत द्वारा रूस से मिसाइल रक्षा प्रणाली की खरीद पर अमेरिकी कानून के अनुपालन को लेकर भी लंबे समय से चर्चा जारी है।

हालांकि, अमेरिका में भारतीय काकस वहां की कांग्रेस पर दबाव डाल रहा है कि भारत पर प्रतिबंध लगाने जैसा कोई भी कदम उनके संबंधों को फिर दशकों पीछे घसीट ले जाएगा। अमेरिका की स्पष्ट चेतावनी के बावजूद भारत और रूस डालर-आधारित वित्तीय प्रणाली को दरकिनार कर द्विपक्षीय व्यापार कर सकने के तरीके तलाश रहे हैं।

क्या कहते हैं जानकार

तीन भू-राजनीतिक चुनौतियां हैं। भारत -अमेरिका को यूक्रेन युद्ध को लेकर मतभेद खत्म करना होगा, अफगानिस्तान को लेकर समझ गहरी करनी होगी और चीन को लेकर क्वाड से आगे सोचना होगा।

  • लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) डीएस हुड्डा, उत्तरी कमान के पूर्व प्रमुख

रक्षा व्यापार और संयुक्त सैन्य अभ्यास के क्षेत्रों में दोनों देशों की सेना के बीच सहयोग बढ़ रहा है। सरकार से सरकार के स्तर पर संवाद बढ़ाना होगा। चीन को लेकर दोनों देशों की साझा चिंताएं हैं। इस पर ध्यान देना होगा।

  • अनीत मुखर्जी, एसोसिएट प्रोफेसर, नानयांग तकनीकी विवि, सिंगापुर

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First published on: 04-10-2022 at 06:54:36 am