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दुनिया मेरे आगे: विकल्प का हासिल

शिक्षा संस्थानों के नियामकों ने बिना अधिक सोच-विचार किए ही ई-शिक्षा के कार्यक्रम जारी कर दिए। अब भी इस मसले पर असमंजस जारी है कि बच्चे कभी स्कूल जाएंगे या नहीं? इस मसले पर एक राय नहीं बन पा रही है, क्योंकि जब कोराना शुरुआती दौर में था, तब पूर्णबंदी रही और जब यह बीमारी विस्फोटक रूप ग्रहण कर चुका है, तब उसमें ढील दी गई।

Educationकोविड के कारण शिक्षा व्‍यवस्‍था बदहाल। फाइल फोटेा।

समय के साथ व्यक्ति, समाज और संस्थाएं बदल जाती हैं। वैसे इंसान बिना कारण और बिना वातावरण के नहीं बदलता। वह अपनी मर्जी से सुविधाओं को नहीं छोड़ता। मौजूदा दौर की महामारी ने समूचे विश्व को झिंझोड़ कर रख दिया है। देश, दुनिया और लोगों को मजबूरन बंद में रहना और जीना सिखा दिया है। ऐसे में समाज और लोग, जो जहां थे, वहीं सीमित होकर रह गए हैं। सारी व्यवस्थाएं बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं! शिक्षा जगत भी बुरी तरह अव्यवस्थित हुआ है। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय लंबे समय से बंद। यानी उजाले को अंधेरे ने धर दबोचा है। नीति निर्धारक स्तब्ध होकर देख रहे हैं, मानो कुछ नहीं करने की हालत में पहुंच गए हों। ऐसे हालात में अचानक बिना किसी तैयारी के ही सामने आई ई-शिक्षा। यानी इंटरनेट के जरिए या आॅनलाइन पढ़ाई।

हालांकि पिछले कुछ सालों से इस माध्यम से शिक्षा के मसले पर मशक्कत जारी है, पर किसी ने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि इसे अचानक ही इस तरह लागू किया जाएगा या इसका कोई अन्य विकल्प नहीं रह जाएगा… परीक्षा लिए बिना विद्यार्थियों को अगली कक्षाओं में प्रोन्नत कर दिया जाएगा… समाज और सरकार गतिहीन होकर रह जाएंगे! ऐसी संकट की घड़ी में जब व्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ा चुकी हो, तब इसे पटरी पर लाने के लिए प्रयोग किए जा रहे हैं। ई-शिक्षा भी प्रयोग के बतौर ही उपयोग में लाई जा रही है। आखिर इस महासंकट की घड़ी में विद्यार्थियों को शिक्षा का का कोई अन्य माध्यम नहीं रह गया है।

मुझे लगता है कि शिक्षा संस्थानों के नियामकों ने बिना अधिक सोच-विचार किए ही ई-शिक्षा के कार्यक्रम जारी कर दिए। अब भी इस मसले पर असमंजस जारी है कि बच्चे कभी स्कूल जाएंगे या नहीं? इस मसले पर एक राय नहीं बन पा रही है, क्योंकि जब कोराना शुरुआती दौर में था, तब पूर्णबंदी रही और जब यह बीमारी विस्फोटक रूप ग्रहण कर चुका है, तब उसमें ढील दी गई। बाजार, संस्थाएं खोल दिए गए। लेकिन कक्षा में एक साथ बीस-पच्चीस विद्यार्थियों को कैसे बिठाया जाए? इस पर घोर असमंजस बना हुआ है। सबके दिमाग पर यही भारी पड़ रहा है- ‘जान है तो जहान है।’

कुछ लोगों का कहना है कि जब पूर्णबंदी में इतनी राहत दे दी गई तो तब नियमित शिक्षा को क्यों रोके रखा जा रहा है? हालांकि इसके विकल्प में ई-शिक्षा कमोबेश चल रही है। यह अलग बात है कि इस क्रम में आने वाली बाधा की कोई सीमा नहीं है। एक तरफ है संसाधनहीनता के शिकार सरकारी स्कूल और कॉलेज। दूसरी तरफ है निजी स्कूल, पर वे बिना फीस के एक कदम भी नहीं बढ़ा सकते हैं। तीसरे हैं ग्रामीण क्षेत्र, जहां ई-शिक्षा आकाश-कुसुम है। गांवों में लैपटॉप, एंड्रॉयड फोन और इंटरनेट डाटा तक कितने परिवारों की पहुंच में है? जहां पेट भरना ही प्राथमिकता में हो, जो बच्चे मिड-डे मील के सहारे अक्षर ज्ञान पाते रहे हैं, वे डाटा खरीद भी सकेंगे? यह सोच से परे है!

मैं अपने राज्य राजस्थान की बात करूं तो महाविद्यालय में ई-शिक्षा पर मशक्कत जारी है। जब इससे संबंधित कोई आदेश आता है, तब इसका विरोध भी होता है, जिसके चलते कुछ आदेश अस्पष्ट या अव्यावहारिक होने पर वापस ले लिए जाते हैं। फिर आदेश संशोधित होकर सामने आता है। कहा जाता है कि वाट्सऐप समूह बना कर विद्यार्थियों को जोड़ा जाए और ई-सामग्री ग्रुप में प्रतिदिन डाली जाए। ऐसे समूहों से विद्यार्थी कितने जुड़ सके हैं, कितने व्याख्यान सुन रहे हैं, इन सबसे अभी नियामकों को कोई मतलब नहीं है। यहां विद्यार्थी हित नदारद है।

इस प्रणाली या व्यवस्था की सीमाएं हैं। व्याख्यान के पारंपरिक रूप में विद्यार्थी आंखों के सामने होते हैं। उस दौरान विचारों का प्रवाह पानी के बहाव-सा बह निकलता है, जो वक्ता को श्रोता से सीधा जोड़ देता है। ई-शिक्षा पूरी तरह से तकनीकी पर आधारित होने से अधिकतर को असहज लगती है। व्याख्यान देना एक कला है, जिसमें मेहनत और भावना जरूरी है।

जबकि दोनों ही तत्त्वों का अभाव होने से ही सरकारी शिक्षा पहले ही अव्यवस्था की शिकार है। अध्ययन, अध्यापन की स्थिति दिनोंदिन रसातल में चली जा रही है। दूसरी तरफ विधार्थियों की रुचि को अगर देखा जाए तो अलग ही तस्वीर सामने आती है। माना कि किसी वर्ष में चार सौ विद्यार्थी हैं तो यह पक्का नहीं हैं कि सभी तक ई-व्याख्यान पहुंच ही जाएंगा!

इस विधि से हर विद्यार्थी तक पहुंचने का दावा पूरा होना संभव नहीं है। हकीकत में महज दस फीसद विद्यार्थी ही वीडियो तक पहुंच पाते हैं। ये दस फीसद भी इसे पूरा देख रहे हैं या उचाट मन से झलक ही देख रहे हैं, पता नहीं। यों झलक देखने वाले को भी इस माध्यम में गिन लिया जाता है। ई-शिक्षा की विफलता के अनेक कारण दर्ज किए जाएंगे।

हर विद्यार्थी की इस व्यवस्था तक पहुंच नहीं है। जिनके पास एंड्रॉयड स्मार्ट मोबाइल है, उनकी संख्या नगण्य है। इसके बावजूद अगर इसी रास्ते बढ़ना है तो ई-शिक्षा से भारतीय विद्यार्थियों को जोड़ने में समय लगेगा। जैसे पढ़ाने वाले असहज हैं, वैसे ही पढ़ने वालों को भी सहज होने में समय लगेगा। इस तरह ऊपर से थोप कर ई-शिक्षा की व्यवस्था थोपना जल्दबाजी होगी। सबसे पहले वातावरण का निर्माण करना होता है।

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