“मैं शाकाहारी हूं, लेकिन मुझे जिंदा रहने के लिए मछली खानी पड़ी, हमारे पास कोई और रास्ता नहीं था।” 40 साल के गोपाल दास का यह बयान उन 50 भारतीय नाविकों की हैरान कर देने वाले हालत को बताता है, जो करीब तीन महीने तक अरब सागर के बीच फंसे रहे। खाने-पीने की भारी कमी के बीच उन्हें अपनी आदतें बदलने तक पर मजबूर होना पड़ा।

आखिरकार मंगलवार को बॉम्बे हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए इन सभी नाविकों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि इंसान की जिंदगी सबसे ज्यादा जरूरी है और ये नाविक एक बड़े मानवीय संकट का शिकार हुए हैं। सभी नाविक भारतीय थे और उन्होंने साफ कहा कि वे अब उन जहाजों पर वापस नहीं जाना चाहते।

9 फरवरी को कोस्ट गार्ड ने मुंबई तट से करीब 11 नॉटिकल मील दूर रोका था

ये सभी नाविक तीन तेल टैंकर जहाजों एमटी एस्फाल्ट स्टार, एमटी स्टेलर रूबी और एमटी अल जाफजिया पर काम करते थे। 9 फरवरी को भारतीय तटरक्षक बल (कोस्ट गार्ड) ने इन जहाजों को मुंबई तट से करीब 11 नॉटिकल मील दूर रोक लिया था। आरोप था कि ये जहाज समुद्र में अवैध तरीके से ईंधन और बिटुमेन का लेन-देन कर रहे थे और अपनी असली लोकेशन छिपाने के लिए गलत सिग्नल का इस्तेमाल कर रहे थे। इसके बाद येलो गेट पुलिस ने भी जहाजों को अपनी हिरासत में ले लिया।

कुल 50 नाविकों में से सिर्फ एक को ही इस मामले में आरोपी बनाया गया, बाकी सभी सामान्य कर्मचारी थे। लेकिन कार्रवाई के बाद सबसे बड़ी समस्या तब शुरू हुई, जब जहाज मालिकों ने इन नाविकों की जिम्मेदारी लेना लगभग बंद कर दिया। उन्हें समय पर खाना, पानी और जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पाईं, जिससे वे समुद्र के बीच फंसे रह गए और उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई।

करीब तीन महीने तक ये नाविक ऐसे हालात में रहे, जहां न पर्याप्त खाना था, न साफ पानी और न ही बाहर निकलने का कोई रास्ता। कई बार उन्हें सिर्फ चावल और नमक खाकर गुजारा करना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब लगातार तीन दिन तक उनके पास बिल्कुल भी खाना नहीं था। मुख्य अधिकारी विपुल श्रीवास्तव ने बताया कि उसी दौरान एक मछुआरा वहां से गुजर रहा था, जिसने दया करके 5-6 किलो चावल और दाल दी। इतने लोगों के बीच यह बहुत कम था, इसलिए उसे बहुत संभालकर बांटना पड़ा।

रिकॉर्ड के अनुसार, जहाज मालिकों की तरफ से सिर्फ 1.85 लाख रुपये का खाना दो बार भेजा गया, जबकि जरूरत करीब 7.69 लाख रुपये की थी। इससे साफ है कि खाने की सप्लाई बहुत कम थी और नाविकों को भूखे रहने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा।

पानी की हालत और भी खराब थी। नाविकों ने बताया कि उन्हें दिन में सिर्फ करीब 300 मिलीलीटर पानी मिलता था, जो समुद्र की गर्मी में बहुत कम है। 21 साल के हिमांशु सिंह, जो अपनी पहली यात्रा पर थे, ने बताया कि पानी की कमी के कारण उन्हें कई बार समुद्र का पानी या नहाने के टैंकर का पानी इस्तेमाल करना पड़ा।

खाने और पानी की कमी का असर उनकी सेहत पर साफ दिखने लगा। कई लोग बहुत कमजोर हो गए, शरीर में पानी की कमी हो गई, त्वचा पर दाने निकल आए और वजन तेजी से घट गया। 23 साल के अंकित कुमार ने बताया कि उनका वजन 67 किलो से घटकर 50 किलो रह गया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें लगभग कोई मेडिकल सुविधा नहीं मिली।

सिर्फ शरीर ही नहीं, मानसिक रूप से भी ये समय बेहद कठिन था। कई नाविकों ने अपने परिवार को सच्चाई नहीं बताई, ताकि वे परेशान न हों। शिव कुमार शर्मा ने कहा, “अगर हम अपने घरवालों को सब बता देते, तो वे टूट जाते, इसलिए हमें खुद को मजबूत रखना पड़ा।”

इस दौरान कई लोग अपने जीवन के अहम पल भी खो बैठे। नासिरुद्दीन मुजीबर रहमान मंडल अपनी बेटी की शादी में शामिल नहीं हो सके, जबकि एक अन्य नाविक अपनी पत्नी की गर्भावस्था के महत्वपूर्ण समय में उसके साथ नहीं रह पाया। धीरे-धीरे जहाजों में डीजल भी खत्म होने लगा, जिससे बिजली की समस्या बढ़ गई और जहाज लगभग अंधेरे में रहने लगे। स्टीफन दिनेश ने बताया कि समय बिताने और हिम्मत बनाए रखने के लिए वे ताश जैसे खेल खेलते थे।

15 फरवरी को इस मामले में नौ लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई, जिसमें जहाज के मालिक UAE के जोगेंद्र सिंह ब्रार भी शामिल हैं। उन पर साजिश, तस्करी और जालसाजी के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि 50 नाविकों में से सिर्फ एक को ही आरोपी बनाया गया था।

आखिरकार नाविकों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की। मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा, जहां जस्टिस रवींद्र वी. घुगे और जस्टिस हितेन एस. वेनेगावकर की बेंच ने सुनवाई की। कोर्ट ने साफ कहा कि उन्हें जहाजों से ज्यादा इंसानों की चिंता है। मंगलवार को कोर्ट ने सभी 50 नाविकों को तुरंत रिहा करने का आदेश दे दिया। जस्टिस घुगे ने कहा, “हम इंसानों की जिंदगी की चिंता करेंगे, आप अपने जहाज संभालिए।” उन्होंने यह भी कहा कि जिंदगी सिर्फ एक बार मिलती है और इन लोगों के परिवार उन पर निर्भर हैं। जब ये नाविक येलो गेट पुलिस स्टेशन से बाहर आए, तो उनके चेहरों पर खुशी से ज्यादा राहत दिख रही थी। कई लोग इतने कमजोर थे कि खड़े भी नहीं हो पा रहे थे। कुछ लोग कई दिनों बाद अपने परिवार से बात कर पाए।

नाविकों ने साफ कहा कि वे अब इन जहाजों पर वापस नहीं जाना चाहते। हालांकि, इतनी बड़ी परेशानी के बाद भी कई लोग उम्मीद नहीं खोए हैं। उनका कहना है कि वे थोड़े आराम के बाद फिर से समुद्र में काम करना चाहते हैं, लेकिन इस बार बेहतर और जिम्मेदार प्रबंधन के साथ। यह कहानी सिर्फ 50 लोगों की नहीं है, बल्कि यह बताती है कि मुश्किल हालात में इंसान किस हद तक मजबूर हो सकता है, यहां तक कि अपनी आदतें और जीवनशैली तक बदलनी पड़ सकती है। और साथ ही यह भी कि आखिर में इंसान की जिंदगी ही सबसे ज्यादा मायने रखती है।

यह भी पढ़ें: Jabalpur Cruise Tragedy: 10 साल के बच्चे के सिर से उठा माता-पिता और भाई का साया, बरगी की लहरों ने उजाड़ा पूरा परिवार

जबलपुर में नर्मदा नदीं में हुए क्रूज हादसे में रविवार सुबह बरगी बांध के पानी में तीन दिन तक चला रेस्क्यू और सर्च ऑपरेशन खत्म हो गया, और दो शव निकाले गए। इसके साथ ही मरने वालों की संख्या 13 तक पहुंच गई। आखिरी में निकाले गए दो शवों में एक 9 वर्षीय बच्चा मयूरम और उसके चाचा कामराज शामिल थे, जो जबलपुर स्थित आयुध कारखाने में कर्मचारी थे। पूरी खबर पड़ने के लिए यहां पर करें क्लिक