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व्यक्तित्व: कमलेंद्र सिंह – खोज निकालीं कोविड19 की चार दवाएं

अमेरिका के मिसौरी विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर कमलेंद्र सिंह और उनके सहकर्मियों ने कोविड-19 के उपचार में ‘रेमडेसिविर’, ‘5-फ्लुओरोउरासिल’, ‘रिबाविरिन’ और ‘फैविपिराविर’ के प्रभाव को परखने के लिए कंप्यूटर आधारित दवा डिजाइन का इस्तेमाल किया।

भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक कमलेंद्र सिंह ने कोरोना वायरस से बचाव की दवाओं की पहचान की है।

अमेरिका में भारतीय मूल के वैज्ञानिक कमलेंद्र सिंह और उनकी टीम ने कोविड-19 के उपचार के लिए ‘रेमडेसिविर’ सहित चार संभावित विषाणु रोधी दवाओं की पहचान की है। ये दवाएं कोरोना विषाणु को मानव शरीर के भीतर अपनी प्रतिकृति बनाने से रोकने में कारगर हो सकती हैं। इन दवाओं में शामिल ‘रेमडेसिविर’ को मूलत: इबोला के उपचार के लिए विकसित किया गया था।

अमेरिका के मिसौरी विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर कमलेंद्र सिंह और उनके सहकर्मियों ने कोविड-19 के उपचार में ‘रेमडेसिविर’, ‘5-फ्लुओरोउरासिल’, ‘रिबाविरिन’ और ‘फैविपिराविर’ के प्रभाव को परखने के लिए कंप्यूटर आधारित दवा डिजाइन का इस्तेमाल किया।
‘पैथोजंस’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट में पाया गया कि सभी चार दवाएं कोरोना विषाणु के आरएनए प्रोटीन को नए कोरोना विषाणु की जीनोम कॉपी बनाने से रोकने में कारगर हैं।

कमलेंद्र सिंह ने कहा, ‘कोविड-19 के उपचार में हमारा उद्देश्य डॉक्टरों को विकल्प उपलब्ध कराने में मदद करने और अंतत: संक्रामक रोग से पीड़ित रोगियों के स्वास्थ्य सुधार में योगदान देने का है।’ अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि प्रयोगशाला में एवं रोगियों पर अभी और प्रयोग की आवश्यकता है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि संभावित उपचार विषाणु के ‘आरएनए पोलीमरेज’ के प्रति किस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। कमलेंद्र सिंह का कहना है, ‘ये सभी विषाणुरोधी दवाएं हैं। ये कारगर हो सकती हैं। कुछ हद तक खामियां भी सामने आ सकती हैं। लेकिन वैश्विक संक्रमण के बीच में, जब कई तरह के शोध चल रहे हैं, तब ये दवाएं प्रभावी तौर पर कोविड 19 के इलाज में तात्कालिक राहत पहुंचा सकती हैं। इसमें दो राय नहीं हैं।’

शोधकर्ताओं ने पाया है कि सार्स-सीओवी-2 विषाणु, जिससे कोविड-19 होता है, अन्य विषाणुओं की तरह जीन परिवर्तन कर सकता है और विषाणुरोधी दवाओं को लेकर प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर सकता है। यही कारण है कि प्रयोगशाला में और रोगियों पर इस्तेमाल करने से ही पता चलेगा कि विषाणु के आरएनए प्रोटीन तंत्र को यह कैसे खत्म करता है। कमलेंद्र सिंह मूल रूप से इलाहाबाद के रहने वाले हैं और शुरू में उन्होंने सरकारी नौकरी की तलाश की। बाद में वे शोध की ओर मुड़ गए।

आगरा विश्वविद्यालय से फीजिक्स (क्वांटम फीजिक्स) में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने के बाद वे अटलांटिक गए और वहां न्यू जर्सी मेडिकल स्कूल में बॉयोकेमिस्ट्री की पढ़ाई की। उन्होंने एचआइवी, सार्स, मर्स समेत कई अन्य विषाणुओं के डीएनए प्रोटीन पर शोध किया है। एचआइवी पर अपने शोध में उन्होंने विषाणु के उस एन्जाइम को खत्म करने वाली दवा की तलाश की, जो उसे अपनी प्रतिकृति तैयार करने में मदद करता है। उनकी प्रयोगशाला में काम करने वाले एक शोध छात्र केली जेम्स का कहना है कि डॉ. सिंह दो स्तरों पर काम करते हैं: एक विषाणु के जीवन वृत्त को लेकर जरूरी जानकारी जमा करना और उसके इलाज के लिए संभावित दवाओं की तलाश करना।

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