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भारतीय फुटबाल : निलंबन की पीड़ा

85 वर्ष के इतिहास में पहली बार फीफा ने भारत को निलंबित किया है।

भारतीय फुटबाल : निलंबन की पीड़ा
अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) के पूर्व प्रमुख प्रफुल्ल पटेल। (सोर्स- फाइल फोटो)

सुरेश कौशिक

71 साल पहले भारत को फुटबाल में एशियाई चैंपियन बनने का गौरव मिला था। 1956 के मेलबर्न ओलंपिक का सेमीफाइनल खेलना और छह साल बाद यानी 1962 के जकार्ता एशियाड में फिर स्वर्णिम प्रदर्शन दोहराना भारतीय फुटबाल के सुखद पल थे। तब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब खेल की संचालन संस्था अखिल भारतीय फुटबाल फेडरेशन को निलंबन का दर्द भी झेलना पड़ेगा। फुटबाल पदाधिकारियों की सत्ता पर काबिज रहने की लालसा ने इस स्थिति को बनाया है।

85 वर्ष के इतिहास में पहली बार फीफा ने भारत को निलंबित किया है। दरअसल 18 मई से ही फीफा के निलंबन की तलवार लटक रही थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2020 से अखिल भारतीय फुटबाल फेडरेशन के चुनाव नहीं करवाने और अवैध तरीके से बने रहने पर प्रफुल्ल पटेल को अध्यक्ष पद से हटा दिया था। उसने तीन सदस्यीय प्रशासकीय समिति गठित कर दी थी जिसके अध्यक्ष जज एआर दवे बनाए गए। इस समिति को एआइएफएफ के संविधान को भी नेशनल स्पोर्ट्स कोड के अनुरूप बनाने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। हालांंकि बुधवार की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि अंडर 17 महिला विश्व कप की मेजबानी बरकरार रखने के लिए वह सक्रिय भूमिका निभाए।

सुप्रीम कोर्ट के दखल के बावजूद भारत पर प्रतिबंध लगाने की बजाय फीफा ने एशियाई फुटबाल कांफेडरेशन के साथ भारतीय फुटबाल की गतिविधियों पर नजर रखी। 16 जुलाई को प्रशासकीय समिति द्बारा ड्राफ्ट किए गए संविधान को सुप्रीम कोर्ट को सौंप दिया गया। कुछ राज्य इकाइयों ने विरोध किया। ये सभी प्रफुल्ल पटेल के समर्थन वाली थीं। इसमें 36 प्रमुख खिलाड़ियों को मत का अधिकार दिए जाने की बात थी। यह तरीका फीफा को भी ठीक नहीं लगा।

फीफा को 25 फीसद खिलाड़ियों को कार्यकारिणी के लिए मतदान करने पर कोई एतराज नहीं था। तीन अगस्त के अंतरिम आदेश के बाद एआइएफएफ के चुनाव 28, 29 अगस्त तक करवाने की बात हुई। अब सवाल यह है कि जब यह प्रक्रिया चल रही थी तो एआइएफएफ के निलंबन की स्थिति क्यों बनी? अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति हो या अंतरराष्ट्रीय खेल महासंघ, सभी अपनी स्वायत्तता चाहते हैं और उनको बाहरी दखल मंजूर नहीं। इसका फायदा उठाने की पूरी कोशिश करते हैं राष्ट्रीय खेल महासंघ और राष्ट्रीय ओलंपिक समितियां। राष्ट्रीय खेल महासंघों में भले ही सब कुछ ठीक नहीं हो, इसकी आड़ लेकर लड़ाई चलती है।

सवाल यह भी है कि राष्ट्रीय खेल महासंघों का देश के प्रति क्या कर्त्तव्य है? किसी भी खेल की टीम राष्ट्र के बैनर तले प्रतिनिधित्व करती है। उसे भारतीय सरकार से वित्तीय मदद भी मिलती है। यहां तक कि राष्ट्रीय चैंपियनशिप के आयोजन को लेकर भी। लेकिन जब बात सरकारी दिशा निर्देशों के पालन की आती है तो पदाधिकारी इससे बचते फिरते हैं। अगर कोई पदाधिकारी सरकारी दिशा निर्देशों की अवहेलना करता है तो राज्य इकाइयां विरोध करने की बजाय समर्थन में खड़ी नजर आती हैं।

अगर मामला अदालत में पहुंच जाए तो यह निलंबन का डर दिखाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का सम्मान करने में ये खेल संघ कतराते हैं। कुछ समय में गड़बड़ियों की वजह से टेबल टेनिस, हाकी, क्रिकेट और अब फुटबाल को चलाने के लिए प्रशासकीय समिति को जिम्मेदारी सौंपी गई। अगर खेल से कोई वास्ता नहीं रखने वाले पदाधिकारियों की जगह इंडियन कलर पाए खिलाड़ियों को सामने लाने की बात उठती है या उन्हें वोट देने का अधिकार दिया जाता है तो इस पर भी इन खेल संघों को आपत्ति है। बाईचुंग भूटिया जैसे कई खिलाड़ी प्रशासन में आने को तैयार हैं।

अखिल भारतीय फुटबाल फेडरेशन पर निलंबन तब तक जारी रहेगा जब तक कि सुप्रीम कोर्ट की बनाई प्रशासकीय समिति सारी शक्तियां एआइएफएफ की कार्यकारिणी को नहीं लौटा देती। इसका मतलब यह हुआ कि 11 अक्तूबर से भारत में होने वाले अंडर-17 महिला विश्व कप की मेजबानी भारत से छिन जाएगी। यह खेल के लिए बड़ा नुकसान होगा। इससे भारतीय महिलाओं के शिरकत करने पर भी सवालिया निशान लग जाएगा। मेजबान होने के नाते भारत को खेलने का सुअवसर मिलना था।

हालांकि फीफा इस मुद्दे पर खेल मंत्रालय के संपर्क में है। यही नहीं भारत की पुरुष टीम भी प्रभावित होगी और सिंगापुर, वियतनाम में होने वाले दोस्ताना मैच नहीं खेल पाएगी। क्लब टीमें भी टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले पाएंगी। इसका मतलब यह हुआ कि एटीके मोहन बागान 7 सितंबर को एएफसी कप मुकाबला नहीं खेल पाएगी। इसी तरह गोकुलम, केरल भी एएफसी महिला क्लब चैंपियनशिप में हिस्सा नहीं ले पाएगी। जब फीफा किसी देश को निलंबित कर देती है तो घरेलू टूर्नामेंट को फीफा की मान्यता नहीं मिलती।

पिछले कुछ वर्षों में प्रदर्शन में थोड़ा सुधार जरूर हुआ है पर अभी भी हम फीफा रैंकिंग में पहली सौ टीमों में नहीं हैं। एशिया में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। ऐसे में जरूरत सही नीतियों, पेशेवर रवैये और प्रशासनिक कुशलता की है। लेकिन जब पदाधिकारी खेल की बजाय अपना फायदा देखने लगे तो यह चिंतनीय है। आइ लीग की महत्ता को आपने खत्म कर आइएसएल को प्राथमिकता दे दी, टूर्नामेंटों और टीमों का अस्तित्व खत्म होना भी हमारी नीतियों पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। और जब हम खुद ही निलंबन का न्योता दें तो यह और भी शर्मनाक है। प्रफुल्ल पटेल को इसका जवाब देना होगा।

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